जुब्बल उपत्यका

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चित्र १ जुब्बल उपत्यका का पूरबी छोर

जुब्बल उपत्यका भारत में हिमाचल प्रदेश के शिमला जनपद का शांत, एकांत एवं मनमोहक हिमालयी भूदृश्य है। यह देउरा घाटी, जुब्बल घाटी या बिशकल्टी घाटी के नाम से भी जानी जाती है। सेब उत्पादन में लगे स्थानीय निवासियों के मन में बसे देवी-देवताओं के अत्यंत रोचक मिथक, सहज रूप से समाज के ताने-बाने को प्रभावित करते हैं। हिमाचल प्रदेश की अन्य घाटियों की तरह जुब्बल उपत्यका में भी है देवी-देवताओं का राज तो कायम रहा पर रियासतें बदलती रही।

जुब्बल शिमला पहाड़ी की रियासतों में से एक थी। इसका क्षेत्रफल लगभग ३०० वर्ग किमी था। इसमें ८४ गाँव थे। देवढ़ा इस रियासत की राजधानी थी। राठौर राजपूतों का यहाँ राज्य था। अनाज, तंबाकू और अफीम यहाँ के प्रमुख उत्पादन थे।

खड़ापत्थर में लुभावने वन, पर्वत शिखर और गिरीगंगा; पुराना जुब्बल में ग्रामीण परिवेश और स्थानीय काठकूणी शैली के मकान; जुब्बल (देउरा) का पाश्चात्य शैली से निर्मित और स्थानीय काष्ठकला से सुसज्जित राजमहल; तथा हाटकोटी में पब्बर तट पर ८वीं से ११वीं शताब्दी के बीच वास्तुपुरूषमंडल नियोजन से परिचय कराते मंदिर, जुब्बल उपत्यका के महत्वपूर्ण स्थल हैं। जुब्बल उपत्यका हिमालय में मिश्रित वनों के संरक्षण के साथ सेब और आलू की सघन खेती से उत्पन्न टकराव, में प्राकृतिक संसाधनों की सीमित उपलब्धता तथा मानव मन की असीमित इच्छाओं का द्वंद्व है।

चित्र २ जुब्बल उपत्यका का मुख्य भाग

भूगोल[संपादित करें]

जुब्बल उपत्यका के पूरबी छोर पर उत्तराखंड से जुड़ा सोलंग गाँव है, जिसके ऊपर छाजपुर का जंगल और नीचे पब्बर नदी है।[1] इस क्षेत्र की पृष्ठभूमि का चित्रण विद्यासागर नौटियाल के शब्दों में इस प्रकार हैः

सन 1942 ई॰ … कुंवारीधार इस ऊंचे पहाड़ का माथा है। पहाड़ की ऊंची छोटी पर एक लम्बा चौड़ा मैदान। ... पीछे की ओर, घना जंगल ... स्वामिभक्ति से खुश होकर अंग्रेज़ सरकार ने ... वह विशाल वन-क्षेत्र रियासत टिहरी गढ़वाल को लौटा दिया... नीचे ... पब्बर नदी के किनारे ... राणाकोट ... दूर-दूर तक फैले ... शिमला की रियासतों के विस्तृत पर्वत और हरे-भरे ऊंचे शीखर। जुब्बल, क्योंथल और रामपुर-बुशहर।

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राणाकोट, उत्तराखंड का आराकोट, से उत्तर-पूरब का भौगोलिक क्षेत्र ‘बंगाण’, भाषाविदों के लिए महत्वपूर्ण है।[3] आराकोट से पश्चिम में जुब्बल उपत्यका का मुख्य भाग ‘बराड़’ शुरू होता है, और यह पूरा भौगोलिक क्षेत्र शिमला से देहरा दून तक महासू देवता का है। [4]

जुब्बल उपत्यका हिमाचल प्रदेश में मुख्यतः बिशकल्टी नदी का जलागम क्षेत्र है, जो कूपड़ पर्वत (ऊँचाई 3354 मीटर) और तुम्बड़ू के टिब्बे (ऊँचाई 3048 मीटर) की श्रिंखलाओं से निकलकर पूरब में हाटकोटी (ऊँचाई 1370 मीटर) के पास पब्बर नदी में मिलती है।[5] इसके अतिरिक्त इसमें हाटकोटी के पार शराचाली, तथा वार की तरफ छाजपुर, के पनढल भी आते हैं। इस उपत्यका को कुछ अन्य नामों से भी सम्बोधित किया गया है, जैसे, देउरा घाटी[6], जुब्बल घाटी[7], तथा बिशकल्टी घाटी[8]

कूपड़ पर्वत के नीचे वाले कंधे से गिरीगंगा नदी निकलती है।[6] यह स्थान खड़ा पत्थर से लगभग पांच किलोमीटर की दूर है। गिरीगंगा कूपड़ पर्वत से पश्चिम की ओर मुड़कर गिरीगंगा उपत्यका बनाती हुई यमुना में मिलती है। गिरीगंगा के उदगम स्थल पर चार मंदिर हैं जिन्हें जुब्बल के राजा कर्म चन्द्र ने बनवाया था।[9][10] पहला मंदिर पत्थरों की चिनाई से बनाये गए तालाब के बीच में स्थित है (देखें पृष्ठ १२८ के सामने[11]), और इसमें गंगा की मूर्ती स्थापित है। गिरीगंगा का पानी एक तरफ से पत्थर पर उकेरे गए किसी जंतु के सिर से तालाब में गिरता है।[12] इसके ठीक पीछे दो छोटे-छोटे मंदिर हैं, एक शिव का तथा दूसरा विष्णु का। चौथा मंदिर काली का है, जो इन से कुछ दूर टीले पर बना है।

जुब्बल उपत्यका के पुराने मकान काठकूणी शैली में बने हैं, ठक्कर और मॉरिसन ने पुराना जुब्बल के कुछ घरों का विशेष रूप से अध्ययन किया है। [13] उन्होंने हिमाचल प्रदेश में और भी कई जगह इस शैली से बने मकानों का निरिक्षण किया। देउरा घाटी में कई जगह लोहा निकला जाता था, और इस क्षेत्र से लोहा लाहौर भेजा जाता था।[14] पिछले कई दशकों से जुब्बल उपत्यका सेब के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है, हिमाचल प्रदेश में, 2004-05 के दौरान 86202 हेक्टेयर में सेब होता था, 2013-2014 में यह क्षेत्र 107686 हेक्टेयर हो गया।[15]


पूरबी छोर में सोलंग गाँव से पश्चिमी छोर में खड़ापत्थर गाँव तक लगभग 70 किलोमीटर लम्बी जुब्बल उपत्यका का भौगोलिक क्षेत्र लगभग 306 वर्ग किलोमीटर मैं फैला है।[1] जुब्बल तहसील में 2011 की जनगणना के अनुसार 24 (171 गाँव) पंचायतें और एक नगर पंचायत है। इसमें 35,997 व्यक्ति ग्रामीण तथा 1,640 व्यक्ति शहरी क्षेत्र; कुल 37,637 व्यक्तियों मैंसे 27,558 शिक्षित; तथा 951 महिलाएं प्रति 1000 पुरुष हैं। जुब्बल का न्यूनतम तापमान -1° से॰ तथा अधिकतम तापमान 34° से॰, परन्तु खड़ापत्थर और अधिक ठंडा तथा हाटकोटी थोड़ी गर्म जगह है। जुब्बल उपत्यका सर्दियों में बर्फ से ढक जाती है, और कूपड़ पर्वत पर महीनों बर्फ रहती है।


इतिहास[संपादित करें]

इतिहासकार लक्ष्मण सिंह ठाकुर ने हाटकोटी के मंदिरों का विस्तृत अध्ययन करने के बाद निष्कर्ष निकला कि ८वीं से ११वीं शताब्दी के बीच यह क्षेत्र कन्नौज के प्रभाव में रहा होगा। [16] और संभवतः इन मंदिरों का निर्माण भी वहीँ के शासकों द्वारा किया गया होगा।

चित्र 3 जेम्स बैली फ्रेज़र ने 1815 में जुब्बल उपत्यका का दौरा किया

अनेक प्रकार के पौराणिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक, सामाजिक और पारिस्थितिक तत्वों और उनके आपसी संबंधों से मध्यकालीन युग में जुब्बल क्षेत्र एक राज्य के रूप में उभरता है जिसका राजा उग्र चंद्र के वंश के तीन पुत्रों बंटवारा किया गया।[9][17] कर्ण चंद्र को जुब्बल, मूल चंद्र को सारी, तथा दूनी चंद्र को रांवी का क्षेत्र मिला। यह तीनों क्षेत्र अलग-अलग रियासतें विकसित हुई।[4]

मध्यकालीन युग में, इतिहासकार चेतन सिंह के अनुसार, हिमाचल की रियासतें लगभग एक जैसी प्रक्रिया से अपने राज्यों को मज़बूत करती रही है, जिसमें एक ओर, स्थानीय देवताओं से लेकर सर्व-व्यापी ईश्वर, तथा दूसरी ओर, छोटे ठाकुर से लेकर महाराजा तक, समानांतर पदानुक्रमों ने, ऐसे समाज को जन्म दिया, जिसमें देवताओं का राज तो कायम रहा, पर रियासतों का वजूद बदलता गया।[18] जुब्बल के खड़ा पत्थर के पास का इलाका, गिरीगंगा उपत्यका में गिरिगंगा का उदगम स्थल, पुन्दर अंग्रेज़ों ने 1823 में क्योंथल रियासत को सौंपा, और बदले में क्योंथल से शिमला की घने वनों से ढकी पहाड़ियों को ग्रीष्म राजधानी के लिए लिया। जब अंग्रेज़ों को और जगह की ज़रुरत पड़ी तो शिमला के आस-पास के कई गांवों को क्योंथल के राजा से लेकर, बदले में जुब्बल उपत्यका में रांवी रियासत क्योंथल को दी गयी।

जुब्बल, रांवी तथा सारी रियासतों का १९४७ में भारत गणराज्य में विलय हो गया। इस रियासतों का ज़्यादातर हिस्सा वर्तमान शिमला जनपद की जुब्बल तहसीलया जुब्बल उपत्यका है।[1] जुब्बल उपत्यका का पश्चिमी भाग ज्यादा समृद्ध था और अभी भी इस रियासत के योगेन्द्र चन्द्र का सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में अपना स्थान है।[8] जुब्बल उपत्यका के उत्तरी पनढल में, हाटकोटी के ऊपर, सारी रियासत के राजमहल खंडहर हैं, यहाँ केवल नरसिंह देवता का मंदिर बचा है।[19] सारी गाँव अब सारी पंचायत का हिस्सा है। तीसरी रियासत रांवी भी समाप्त हो गयी और इसका अधिकतर हिस्सा पब्बर के पार, तथा कुछ पब्बर के वार जुब्बल उपत्यका के पूरबी छोर में छाजपुर के जंगल का पनढल है।[1][8]

जुब्बल उपत्यका जुब्बल-कोटखाई विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र, हिमाचल प्रदेश के अंतर्गत आता है। इस विधानसभा क्षेत्र ने हिमाचल प्रदेश को दो मुख्यमंत्री दिए, ठाकुर राम लाल तथा वीरभद्र सिंह

महत्वपूर्ण स्थल[संपादित करें]

जुब्बल उपत्यका में कुछ स्थल पौराणिक, ऐतिहासिक तथा प्राकृतिक दृष्टि से विशेष महत्त्व रखते हैं, इनका संक्षिप्त परिचय तालिका में दिया गया है[1] और अन्य विशेषताओं का वर्णन नीचे चार उपअनुभागों में किया मिलेगा।

महत्वपूर्ण स्थल गाँव/शहर पंचायत जनसँख्या स्थान कोड शिमला से दूरी
खड़ा पत्थर गाँव पराली 359 025976 80 कि॰ मी॰
पुराना जुब्बल गाँव जय पीड़ी माता 490 025969 93 कि॰ मी॰
जुब्बल (देउरा) नगर पंचायत न॰ प॰ 1640 --00140 90 कि॰ मी॰
हाटकोटी गाँव सावड़ा 285 026011 100 कि॰ मी॰

खड़ापत्थर (ओड़ी)[संपादित करें]

जेम्स बैली फ्रेज़र ने 1815 में एक सेना की टुकड़ी के साथ देउरा घाटी (जुब्बल उपत्यका) का दौरा किया।[6] फ्रेज़र ने लिखा है कि उर्रेता (कूपड़) पर्वत और तुम्बड़ू के टिब्बे के बीच की तंग घाटी ‘ओड़ी’ (खड़ापत्थर) है। उन्होंने यहाँ खड़े बालुई, धूसर रंग के पत्थर का विशेष रूप से वर्णन किया है। खड़ापत्थर, जुब्बल उपत्यका का पश्चिमी छोर, शिमला से 80 कि॰ मी॰ दूर, राष्ट्रीय उच्चमार्ग पर है।

अशोक चोपड़ा ने अपनी पुस्तक में लिखा कि जुब्बल के रास्ते में हम खड़ापत्थर (ओड़ी) रुके, जहाँ एक स्याह-सफ़ेद, दस फूट ऊंची आकृति है जो प्रदेश की सबसे खूबसूरत घाटी को सतत निहारती होगी।[7] स्थानीय लोगों द्वारा पूजित, यह बालूई पत्थर रक्त-रंजित अतीत की याद दिलाता है, जब योद्धा इसके सामने नतमस्तक हो, अपनी तलवारों की धार की परीक्षा इस पत्थर पर वार कर करते होंगे। वह आगे लिखते हैं कि आज यह पत्थर मंदिर में कैद, अँधेरे में साँस भी नहीं ले पा रहा है। इस परिवर्तन को अशोक चोपड़ा ने स्थानीय लोगों की नासमझी कहा, क्योंकि एक तेजस्वी आकृति जिस पर ऐतिहासिक इबारत अंकित थी, उसका प्राकृतिक सौंदर्य ओझल हो गया।

ललित ने लिखा है कि कूपड़ पर्वत का नाम संभवतः सफ़ेद रंग की बूटी ‘कुपड़ा’ से पड़ा, जिससे यह पर्वत ढका रहता होगा।[20] उन्होंने कहा कि कूपड़ पर्वत से गिरीगंगा, जिसे स्थानीय लोग गिरा भी कहते हैं, निकलती है, और शायद यह वैदिक ग्रंथों की सरस्वती नदी हो।

पुराना जुब्बल[संपादित करें]

चित्र 4, जूब या दूब घास

जुब्बल के राजाओं की वंशावली[9] के अनुसार जुब्बल का नाम ‘जूब’ बूटी से पड़ा, जो दूर्वा या दूब घास है। [21] इस जनश्रुति में जुब्बल उपत्यका के ‘चूंहटा’ ग्राम में एक काला नाम का ज़मींदार था। वह अपना मकान बनाने के लिए खाई खोद रहा था। उस खाई में दूब घास उग आया, बार-बार निकालने के बाद भी वह घास उगता गया। काला ज़मींदार के मन में ख्याल आया कि शायद यह मकान की जगह किसी राजा के योग्य है। राजा कर्ण चन्द्र ने इस जगह अपना राजमहल बनाया, और जूब की विचित्र शक्ति के कारण इसका नाम जुब्बल पड़ा। यह जगह वर्तमान जुब्बल से तीन किलोमीटर दूर है। इस राजमहल में जुब्बल के राजा की कुल देवी पीड़ी का मंदिर है।[10]


ब्रेंतनल्ल लिखते हैं कि सिरमौर के राजा विराट चंद ने 1028 से 1051 तक राज किया, उनके पुत्र उगर चंद जिन्होंने 1073 तक शासन किया, से जुब्बल के राजवंश की शुरुआत हुई।[8] इससे जुड़ी एक विचित्र पौराणिक कथा है, जिसका अध्ययन कई लोगों ने किया।[22][23] इस वंश के कर्ण चंद्र ने जुब्बल रियासत, मूल चंद्र ने सारी रियासत, तथा दूनी चंद्र ने रांवी रियासत का विस्तार किया। जुब्बल रियासत के राजाओं के नाम वंशावली में उपलब्ध हैं।[17]

यहाँ एक खूबसूरत गाँव भी है, और इस क्षेत्र की पंचायत का नाम ‘जय पीड़ी माता’ है।[1]

जुब्बल (देहरा या देउरा)[संपादित करें]

चित्र 5 जुब्बल का आधुनिक महल जिसे राजा दिग्विजय चंद्र ने बनाया

जुब्बल रियासत के दसवें राजा गौर चंद्र ने नवीन राजमंदिर पुराने राजमहल से कुछ दूर बनाया और इसका नाम देहरा रखा।[9] यहाँ कारखाना, छावनी, ठाकुरद्वारा आदि भी बनाए। बाद में देहरा को भी जुब्बल नाम दिया गया, जो वर्तमान में नगर पंचायत है।[1] राजा भगत चंद ने 1910 से 1946 के बीच अपने शासन काल में जुब्बल रियासत की आर्थिक दशा को मज़बूत किया, और शिमला में भी कई कोठियां खरीदी।[24] उनके पुत्र दिग्विजय चंद्र अंतिम राजा, तथा भारतीय प्रशासनिक सेवा में कुशल प्रशासक रहे।[8] उन्होंने जुब्बल में एक पाश्चात्य शैली का राज महल बनाया। यह स्थानीय काष्ठकला का खूबसूरत नमूना है।

जुब्बल उपत्यका में महासू देवता का राज है, और देउरा में मुख्य मंदिर महासू देवता का है। इस पूरे क्षेत्र में महासू देवता की पूजा होती है। महासू की पौराणिक कथा हिमाचल प्रदेश के शिमला, सोलन तथा सिरमौर जनपदों, और उत्तराखंड की तौंस और यमुना घाटियों में अनेक रूपों में प्रचलित है।[22][25] महासू चार देवता हैं, बोठा, बाशिक, पवासी और चाल्दा। सबसे बड़ा बोठा महासू हनोल में तौंस नदी के बाँये तट पर रहता है और सब देवताओं को निर्देश देता है। पवासी के पास हनोल से पार देवबन का क्षेत्र, तथा बाशिक के पास हनोल के पास का क्षेत्र, और चाल्दा इस पूरे क्षेत्र में घूमता है, जिसमें जुब्बल उपत्यका भी आती है। बनाड़ देवता और शाड़ी के देवता भी इनसे जुड़े हैं।


चित्र 6 बनाड़ देवता का जागरा


देव-दर्शन के अंकों में, जो शाड़ी के देवता की राम्परी की जातर के अवसर पर निकाले गए, ऐसे संकेत हैं जो मौखिक और श्रुत शब्द के माध्यम से जुब्बल उपत्यका में विचारों के आदान-प्रदान तथा समाज की व्यवस्था में देवता की भूमिका दर्शाते हैं।[26][27] बनाड़ देवता की पूरी जुब्बल उपत्यका में मान्यता है, उनका मुख्य स्थान मांदल, तथा शराचाली क्षेत्र के अन्य गांवों में पब्बर नदी के पार है। जनश्रुति के अनुसार जुब्बल का काला नामक व्यक्ति बनाड़ की मूर्ती शाड़ी गाँव लाया, और शाड़ी-रे-दैओ के नाम से जुब्बल उपत्यका के पश्चिमी भाग में इसकी पूजा होने लगी। शाड़ी के देवता के संस्थान का विस्तार से अध्ययन हुआ है।[28][29] देवता शाड़ी, चमारू, डकैहड़, पुराना जुब्बल, तथा क्यारी गाँवों में क्रमवार एक-एक साल पूजा जाता है। शाड़ी के देवता का संस्थान लोगों की आस्था का प्रतीक है, इसका व्यक्तिगत और सामाजिक, तथा मानसिक एवं भौतिक समस्याओं के सुलझाने में योगदान देखा गया।


चित्र 7, 2012 में निर्माणाधीन बनाड़ देवता का मंदिर

इस क्षेत्र में लोगों की महासू देवता में इतनी आस्था है कि 2007 में चाल्दा महासू जब जुब्बल उपत्यका में भ्रमण पर थे तो उन्होंने जुब्बल तहसील की दो पंचायतों धार और बढ़ाल, के बीच 100 साल से चली आ रही दुश्मनी को समाप्त करने में मध्यस्थता की। इस समस्या के निवारण में उनके साथ कठासू गाँव के रेठड़ू, कोट मगावटा के कुलथू, तथा उत्तराखंड के शेड़ाकलिया भी थे।[30]

कई विशयों के शोधकर्ता देवी-देवताओं के पौराणिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक तथा सामाजिक पहलुओं पर कार्य कर रहे हैं, और इसे एक नए परिपेक्ष में देखने का प्रयास है।[17][31][17][32] शोधकर्ताओं का मानना है कि देवता से जुड़े संस्थान तथा उनसे सम्बंधित जटिल अनुष्ठान, जैसे जागरा, लोगों में आपसी सहायता बढ़ाते हैं।[33] इससे जुडी और जानकारी पराप्राकृतिक विश्वास का वैज्ञानिक अध्ययन तथा पराप्राकृतिक संवाद में मिलेगी।

इस क्षेत्र में मनाये जाने वाले त्योहारों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का वर्णन गोवर्धन सिंह[11] तथा एम॰ आर॰ ठाकुर[25] ने विस्तार में किया है। जागरा तथा जातर प्रमुख हैं।

हाटकोटी[संपादित करें]

हाटकोटी जुब्बल उपत्यका का एक पौराणिक और रमणीक स्थान है, जो पब्बर नदी के दाँये तट पर बसा है। 17 मई 1815, जब फ्रेज़र इस क्षेत्र में पहुंचे तो उन्होंने अपना तम्बू मंदिर के परिसर में अखरोट के पेड़ के नीचे गाड़ा, किन्तु इस बात का ध्यान रखा कि मंदिर की पवित्रता को कोई ठेस न पहुंचे।[6] उन्होंने लिखा है की पूरा क्षेत्र छोटे-बड़े मंदिरों से भरा है, दो मंदिर मुख्य हैं, जिनमें एक लोगों की उपासना का केंद्र है, अराध्य देव का नाम गोबेसेरी (हाटेश्वरी या महिषासुरमर्दिनी) है। फ्रेज़र ने आगे लिखा कि इस मंदिर की पवित्रता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि, गोरखों ने जिनका इस क्षेत्र पर उस समय अधिकार था, इस मंदिर को कोई क्षति नहीं पहुंचाई।


चित्र 8 हाटकोटी क़स्बा बीच में मंदिर तथा एक ओर बराज

शिमला की पहाड़ी रियासतों के गज़ेतियर में लिखा है कि हाटकोटी सिरमौर रियासत की ग्रीष्म राजधानी थी, जो शौणपुर के टिब्बे के ऊपर, पब्बर के दाँये तट पर थी।[4] इस टिब्बे के नीचे मुख्य मंदिर देवी का है, तथा दूसरा शिव का। यही नहीं यह पूरा स्थान पुरानी इमारतों और मंदिरों से अटा पड़ा था, जिन्हें शंकर चारज ने बनाया था। और इस देवी की काफी बड़ी जागीर थी, और उसमें सारी रियासत (बाद में बुशहर रियासत का पन्द्रहसौ परगना); जुब्बल रियासत के धार, बढ़ाल और पंजगांव; तथा रांवी, बटाड़, कठासू आदि, आते थे। किन्तु राजा की किसी दुर्घटना में (पौराणिक कथा [9]) मृत्य के बाद, हाट कोटी के मंदिर के मुख्य ब्राह्मण बीर भाट ने राजा की रानी और ग्रीष्म राजधानी को अपने अधिकार में ले लिया, और बाद में मंदिर की इस जागीर को अपने पुत्रों में बाँट दिया।

एक दूसरी पौराणिक कथा, जो महासू देवता से जुड़ी है और हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड में प्रचलित है, में हाटकोटी से ऐसा दिशा निर्देश मिला कि कश्मीर में चार देवता हैं जो इस क्षेत्र की समस्याओं का समाधान कर सकते हैं।[22] हाटकोटी के मंदिरों का संक्षिप्त वर्णन विश्व चन्द्र ओहरी ने 1975 में किया, [34] और यह मंदिर समूह सुदर्शन वशिष्ठ के अनुसार एक समृद्ध मंदिर संस्कृति की ओर इंगित करते हैं।[35] हाट कोटी से थोड़ा पहले, बिशकल्टी नदी के पब्बर से मिलन स्थल पर परहाट, तथा हाट कोटी से थोड़ा नीचे पब्बर के दाँये तट पर सवड़ा है, इन दोनों स्थानों पर भी मंदिर हैं। इतिहासकार लक्ष्मण सिंह ठाकुर ने इन तीनों स्थानों के मंदिरों का विस्तार से अध्ययन किया। नागर शैली में बने इन मंदिरों के निर्माण में पत्थरों का प्रयोग हुआ है। महिषासुरमर्दिनी की दो मूर्तियाँ, अष्टभुजा (कांसे) और दस भुजा (पत्थर), विशेष हैं।[36] मुख्य मंदिरों का नियोजन वास्तुपुरुशमंडल के अनुरूप हुआ।[37]

पारिस्थितिकी[संपादित करें]

भारत रत्न भगवन दास ने मनुष्य की दो इच्छाओं को उसके संवेग, संज्ञान, और क्रियाओं का मूल आधार माना।[38] व्यक्ति उन वस्तुओं की ओर आकर्षित होता है जो सुख दे, तथा उन वस्तुओं या परिस्थितियों से दूर भागता है जो दुःख दे। मानव मन का यह द्वंद्व पारिस्थितिकी के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण है। फ्रेज़र जुब्बल उपत्यका में उस परिस्थिति से छुटकारे का सन्देश लेकर आया था जिससे पहाड़ी दुखी थे, गोरखों का राज, दूसरे, पहाड़ी लोग सम्पन्नता चाहते थे जिसका भौतिक साधन थे सघन वन। [6] लगभग २०० साल बाद एक शोधकर्ता ने लिखा है कि जुब्बल उपत्यका में 19वीं और 20वीं शताब्दी के बीच हुए बदलव, भौतिक और जैविक आयामों के अतिरिक्त पौराणिक (सांस्कृतिक), ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक आयामों से जुड़े हैं।[39]

मानव मन के इस द्वंद्व को ध्यान में रखते हुए, पहले उपनुभाग में जुब्बल उपत्यका के जीव-जंतुओं तथा जंगलों के बारे में परिचय है, तथा दूसरे अनुभाग में मानवजात समस्याओं का विवरण तथा उनका विश्लेण।

जीव-जंतु[संपादित करें]

चित्र 9 भारतीय काला पक्षी

सिंह, कोठारी और पाण्डे ने जुब्बल उपत्यका के सुदूर पूरब में तालरा अभयारण्य की पारिस्थितिकी का वर्णन किया है।[40] यह क्षेत्र वनों से आच्छादित है, और इसमें कई चारागाह हैं। अनेक प्रकार के जंतु जैसे काला भालू, तेंदुआ, लंगूर, काकड़, और कस्तूरी मृग पाए जाते हैं। अनिल महाबल ने तालरा अभयारण्य के पक्षियों का विशेष रूप से अध्ययन किया है।[41] इन पक्षियों में काली बुलबुल, भारतीय काला पक्षी, बाज, तोता, गिद्ध, मोनाल, रतनाल, आदि हैं। छाजपुर का वनविश्राम गृह (ऊँचाई 2400 मीटर) इस अभयारण्य में भ्रमण के लिए सुविधाजनक है। हालाँकि सिंह और उनके साथियों ने लिखा है की वेस्टर्न त्रेगोपान या रतनाल तालारा अभयारण्य में पाया जाता है, अनिल महाबल ने इसकी उपस्थिति दर्ज नहीं की है।[42] फ्रेज़र को इस क्षेत्र के दौरे में जुब्बल ओर बलसन के राजाओं ने रतनाल विशेष भेंट के रूप में दिया।[6]

चित्र 10 काली बुलबुल

फ्रेज़र १८१५ में जब कूपड़ पर्वत से होकर गुज़र रहे थे तो इतने प्रभावित हुए की उस क्षेत्र की तुलना स्वर्ग से की। वृक्ष विशाल थे, एक वृक्ष के तने की गोलाई लगभग २५ फूट थी। इन वृक्षों में भोजपत्र भी थे। और खुली जगह कई प्रकार की बूटियों से ढकी थी जिसमें कुमुदनी तथा निर्विषी भी थी। इस क्षेत्र की वनस्पति की पहचान कौलेत की पुस्तक से की जा सकती है।[43] कुछ मुख्य वृक्षों के नाम संलग्न तालिका में दिए गए हैं।

मुख्य पेड़ों के नाम
लेतिन नाम अंग्रेज़ी नाम हिंदी नाम
Abies pindrow silver fir रजत तालिश पत्र
Aesculus indica wild chestnut कनहोर
Betula utilis paper birch भोजपत्र
Cedrus deodara devdar देवदार
Juglans regia walnut अखरोट
Picea smithiana spruce प्रसरल
Pinus roxburghii chir pine चीड़
Pinus wallichiana blue pine कैल
Prunus armenica wild apricot चुल्ली
Quercus dialatata quercus मौरू
Quercus leucotrichophora ban oak बान
Quercus semecarpipholia kharshu oak खरशु

वैज्ञानिकों की खोज बताती है कि गिरीगंगा के उदगम स्थल के मिश्रित वनों में देवदारू, कैल, रजत तालीशपत्र, प्रसरल, मौरू और खरशु के वृक्ष हैं। यह वन मृदा जैव कार्बन संचयन के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।[44] अर्थात यह मिश्रित वन, अन्य वनों की अपेक्षा, कार्बन को वायुमंडल में जाने से रोकने में सबसे अधिक योगदान देते हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए ज़रूरी है।

मानवजात परिवर्तन[संपादित करें]

हाटकोटी के मंदिरों के पास सावड़ा-कुडडू जल विद्युत् परियोजना का निर्माण कार्य चल रहा है, जिसमें 15.50 मीटर ऊंचे बराज से पब्बर नदी का पानी रोक कर, 11 किलोमीटर लम्बी सुरंग से सनैल गाँव के पास बहार छोड़ा जायेगा जिससे 111 मेगावाट बिजली बनेगी।[45] इस परियोजना के लिए कई पंचायतों की कृषियोग्य भूमि अधिग्रहण की गई, तथा पब्बर नदी की संरचना में भी परिवर्तन हुआ।

चित्र 11 पब्बर नदी के क्षेत्र में जंगली चूहा

गोयल और उनके साथियों ने एक निरिक्षण में पाया कि 2002 में पब्बर नदी के क्षेत्र में प्लेग की बिमारी फैली थी।[46] इस बिमारी का संक्रमण शायद शिकार करते समय हुआ। एक व्यक्ति ने जुब्बल के केल्वि गाँव के पास मुड़ल के जंगल में किसी जंतु का शिकार किया। जिससे उसे प्लेग का संक्रमण हुआ जो परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों में फ़ैल गया। इन शोधकर्ताओं का कहना है कि इस क्षेत्र के अन्य भागों में पहले भी लोगों को प्लेग का संक्रमण हुआ है और अनुमान है की इसका कारण जंगली चूहे थे।

उपरोक्त दो उदाहरण पारिस्थितिकीय तंत्र में सामूहिक तथा व्यक्तिगत परिवर्तनों और उनके दुष्परिणामों के संकेत हैं। किन्तु ऐसे परिवर्तन कई बार लोगों की अवश्य्कातों को ध्यान में रखकर किये जाते है या अन्यास व्यक्ति की नासमझी का कारण हैं। परन्तु यहाँ ऐसे पारिस्थितिकीय परिवर्तनों को प्रस्तुत किया गया है जो एक विकसित मानव समूह की सोच, वैज्ञानिक सूझ-बूझ, तथा मानव मन की भोगवादी इच्छाओं से जुड़े हैं।

इस सन्दर्भ में अंग्रेजी शासकों की शिमला की रियासतों के पहाड़ी निवासियों के व्यवहार के बारे में दो टिप्पणियां महत्वपूर्ण हैं। जुब्बल उपत्यका के वनों को देखकर फ्रेज़र के ये उदगार

कीमती इमारती लकड़ी का क्या दुरूपयोग था! और एसा लगता है यह विशाल वृक्ष बेकार ही फलते-फूलते हैं और सड़ जाते हैं!” (पृष्ठ 139) ... “अगर इस कीमती लकड़ी को नीचे मैदानों में पहुँचाया जा सकता, तो यह सबसे महत्वपूर्ण अर्जन होगा।(पृष्ठ 140) ... अगर इस कीमती लकड़ी को नीचे मैदानों में पहुँचाया जा सकता, तो यह सबसे महत्वपूर्ण अर्जन होगा”।(पृष्ठ 140)

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एक गज़ेतियर में छपा यह वाक्य

शिमला की पहाड़ियों का निवासी एक कामयाब फल उत्पादक नहीं है।(पृष्ठ 2)

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अंग्रेज़ों ने पहाड़ के लोगों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए वनों का व्यापारिक दोहन तथा आलू की खेती का प्रसार शुरू किया।[24] एक और रास्ता अमेरीकी मूल के सत्यानंद स्टोक्स ने सुझाया, कूपड़ पर्वत श्रंखला में खड़ा पत्थर से उत्तर की ओर, कोटगढ़ (कोटगूरू) में सेब का बाग लगाया।[47] अगले दो उपअनुभागों में अंग्रेज़ी वननीति, तथा आलू और सेब की खेती के प्रसार का लोगों के जीवन, तथा पर्यावरण के सन्दर्भ में कुछ विचारों तथा निरीक्षणों का हाल की घटनाओं के सन्दर्भ प्रस्तुतीकरण है।

अंग्रेज़ी वननीति[संपादित करें]

अंग्रेज़ी सरकार द्वारा सत्ता संभालते ही, 19वीं शताब्दी के अंत में इन पहाड़ी रियासतों ने वनों के दोहन की शुरुआत की।[4] जुब्बल उपत्यका से पूरब में गंगोत्री के पास हर्सिल से गंगा में फौज से भागे विल्सन ने वनों का दोहन जोर-शोर से चलाया, और इतनी दौलत कमाई कि गढ़वाल के लोग उसे हर्सिल का राजा कहते।[48] एडवर्ड बक लिखते हैं कि जुब्बल के राजा भगत चन्द इमारती लकड़ी को बेचकर सालाना काफी पैसा कमाते हैं, और पहाड़ी सामंतों में सबसे अमीर हैं।[24] यही नहीं लकड़ी के ठेकेदारों, जैसे जोधा मल, ने भी खूब पैसा कमाया, और एक साधारण आदमी से राय बहादुर बन गए।[49]

राजा भगत चंद के समय, जुब्बल रियासत में अंग्रेजी वन प्रणाली शुरू हुई थी, जिसमें गाँव के लिए वन की सीमा का निर्धारण हुआ।[50] रियासत में कहीं-कहीं इसका विरोध हुआ, किन्तु लोगों ने अपने अधिकारों पर हुए इस अतिक्रमण को चुप-चाप डर के मारे सहन किया। रियासत के बढ़ाल गाँव के लोगों ने जंगलात की बुर्जियां उखाड़ फेंकी, उन्हें जेल हुई। इस सर्वेक्षण में आगे बताया गया है कि नए जंगल भी लगने शुरू हुए जिनमें चीड़ और देवदार मिख्य थे, किन्तु अधिकतर जंगलों का कटान हुआ। जुब्बल से घाल के द्वारा लकड़ी यमुना नगर के आस-पास पहुंचाई जाती, जहाँ उसे व्यापारियों को बेचा जाता।

जुब्बल से जुड़े रंवाई-जौनसार क्षेत्र में, रामचंद्र गुहा और माधव गाडगिल लिखते हैं, लोगों ने अंग्रेज़ों की नई वन नीति का विरोध किया।[51] हनोल में महासू देवता के मुख्य पुजारी रामसिंह के नेत्रित्व में 13 जुलाई 1915 गाँव वालों ने, विरोध जताने के लिए, चीड़ के जंगल में आग लगाई, जिसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा। रवांई में जंगलात बंदोबस्त का विरोध कर रहे लोगों की सभा पर 30 मई 1930 को तिलाड़ी के मैदान में सेना ने गोली चलाई, लगभग २०० लोग मरे।[52]


चित्र 12 जुब्बल के डकैहड़ गाँव में वैश्विक पारिस्थितिकी के छात्र



आलू और सेब की खेती[संपादित करें]

हिमालय में कश्मीर से कोहिमा पदयात्रा के दौरान, सुन्दरलाल बहुगुणा और उनके साथियों ने आलू और सेब की खेती के लिए वनों के काटन को हिमाचल प्रदेश के जुब्बल और अन्य क्षेत्रों (अक्टूबर १९८१) में देखा था।[53] एक तो खड़े पनढलों पर भूमि के आभाव में वनों का कटान हो रहा था, दूसरे सेब को मंडी तक पहुँचाने के लिए लकड़ी की पेटियों की लगातार ज़रुरत बढ़ रही थी। हिमाचल प्रदेश सरकार ने इन समस्याओं को सुलझाने के लिए कदम भी उठाये।[54]

धूम सिंह नेगी 1988 में एक सर्वेक्षण के बाद लिखते हैं कि जुब्बल और आस-पास के क्षेत्रों में आलू और सेब की खेती का जैसे-जैसे विस्तार हुआ, जंगल सिमटते गए।[55] नकटाड़ा गाँव के ऊपर डीम चक में सरहाल का सौर (कुदरती तालाब) सूख चूका था, और नेपाली परिवार आलू की खेती कर रहे थे। यही हाल खड़ा पत्थर से चुन्जर, गणासिधार होते ननखड़ी तक था, जहाँ कभी फ्रेज़ेर ने अपनी यात्रा के दौरान 1815 में घने वनों का वर्णन किया है,[6] उसमें अब आलू और सेब की खेती थी।

माधव गाडगिल के अनुसार हिमालय के वनों के दोहन की शुरुआत जो अंग्रेजों के शासन काल में शुरू हुई, भारत की स्वतंत्रता के बाद सघन होती चली गयी, जो पर्यावरण और विकास के टकराव के रूप में उभरी है।[56] यह टकराव जुब्बल उपत्यका में मुखरित हुआ है, जहाँ वनों का काफी हिस्सा सेब के बागों में बदल दिया गया, और इस मुद्दे को सुन्दरलाल बहुगुणा ने जनता के सामने रखा था।[57] अंग्रेज़ों की वन नीति में पारिस्थिकिय दृष्टि का आभाव था, इसके विपरीत भारत में गाँव के लोग वनों के रख-रखाव सामूहिक रूप से करते थे।[56][58]

गिरीगंगा उपत्यका में गिरिगंगा के उदगम स्थल के आस-पास के मीश्रित वनों में सेब के बाग फ़ैल गए हैं।[59][60] एक तरफ, न्यायविदों की राय में इस क्षेत्र में, ग्रामीण लोगों द्वारा वन क्षेत्र में अतिक्रमण सही नहीं है, और उन्होंने नाजायज़ कब्जों को हटाने के आदेश दिए हैं।[61][62] दूसरी ओर, कुछ लोग हिमाचल में वनभूमि पर अतिक्रमण के प्रति संवेदनशील रुख अपनाने के पक्षधर हैं।[63] इस संदभ में किसान नेता राकेश सिंघा ने छोटे और गरीब बागवानों के हितों की अनदेखी की बात रखी।[64]

जुब्बल उपत्यका में एक ओर जहाँ लोगों की ज़रूरतें और इच्छाएं हैं, वहीँ दूसरी ओर प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर का क्षरण। इस सन्दर्भ में गंगा नदी की पौराणिक कथा की भूमिका भी है।[65] यह कथा जल संकट का द्योतक तो है ही, इसके साथ-साथ जब राजा भगीरथ की तपस्या से गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ, तीव्र वेग से आती गंगा को ‘शिव की जटाओं’ ने अर्थात हिमालय के सघन वनों ने रोका। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि से हिमालय के मिश्रित वनों का जल संरक्षण में योगदान है, बल्कि अब इसमें कार्बन भंडारण भी जुड़ गया है।

पूरी दुनिया तापक्रम में वृद्धि और मौसम में बदलाव की समस्याओं से चिंतित है। इसे ध्यान में रखकर विश्व के सभी देश २०१५ में पेरिस में मिले और कई समझौतों पर हस्ताक्षर किये, एक सामूहिक उद्देश्य रखा कि पृथ्वी के तापक्रम को औद्योगिकरण से पहले के स्तर पर लाना है।[66] वायुमंडल में बढ़ती कार्बन की मात्रा इसमें एक बड़ा घटक है, क्योंकि यह पृथ्वी के चारों ओर तापक्रम को बढ़ाती है।[44] इसे कम करने के लिए ज़रूरी है कि कार्बन को जमीन में भंडार करके रखा जाये। कुछ विशेष पारिस्थितिकीय तंत्र ही इसमें योगदान देते हैं, जैसे गिरीगंगा के उदगम स्थल का मिश्रित वन।

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