जीनगर

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जीनगर जाति का इतिहास एक विशाल एवं वैभवशाली जाति का रहा है। जीनगर जाति मूलतः क्षत्रिय जाति ही थी मगर कालान्तर मे देश काल व परिस्थति वश उन्हे विभिन्न शिल्प कार्य, वाणिज्य एवं कारीगरी के धन्धो को अपनाना पडा। जीनगर क्षत्रिय से कब व कैसे जीनगर हो गये ये एक खोज परक विषय था। समाज इस विषय पर काफ़ी खोज करता रहा मगर इस कार्य को सर-अन्जाम दिया डॉ. शैलेन्द्र डाबी, निवासी लूनकरनसर, बीकानेर ने जिन्होने बडी मेहनत और अथक प्रयास कर इतिहास व राजा महाराजाओ के गजट व विभीन्न वन्शावलि व लेखो द्वारा यह सिद्ध किया कि जीनगर जाति वास्तव मे एक क्षत्रिय जाति है। उन्के अनुसार भगवान परशुराम ने धरती से क्षत्रियो का समूल नाश करने की प्रतिज्ञा की तथा धरती से समस्त क्षत्रियो का विनाश करने लगे। जब परशुरामजी ने "नगर-स्थान" के राज वन्शियो का सर्व नाश कर दिया तो वहा से केवल रतन सेन महाराज ही बच कर दधीचि ऋषि के आश्रम केगी मे गुप्त रुप से पहुँच गये। मगर वहा भी उन्हे मार डाला गया। तब रतन सेन के बडे पुत्र ज़य सेन जो बच कर भाग गये थे, के द्वारा पुन: "नगर-स्थान" का राज्य स्थापित करने से इस वन्श का नाम जयनगर क्षत्रिय कहलाया जो कि कालान्तर मे जीनगर क्षत्रिय हो गया जो आज तक प्रचलित है।

अतः यह स्वमेव सिध्द हो जाता है कि जीनगर जाति के लोग उन्ही सुर्यवन्शी "नगर-स्थान" के राज्य के ज्येष्ठ पुत्र जयसेन के वन्शज है। जयसेन एक बहुत ही नेक दिल, दिलेर, बहादुर व न्याय प्रिय कुशल शासक थे। इनकी यश व कीर्ति सर्वत्र फ़ैल चूकी थी जिससे भारतवर्ष के पडोसी मुल्को - अरबो, अफ़गानो, तुर्को तथा मन्गोलो को ललचाया तथा उन्होने "नगर-स्थान" पर फ़ोजी हमले करने शुरु कर दिये। बार बार हमले से अर्थव्यवस्था टूटने लगी तथा एक बार मलेच्छो ने नौ मास तक "नगर-स्थान" को घेरे रखा एवं युद्ध चलता रहा। जय नगर के क्षत्रियो ने डटकर मुक़ाबला किया और अन्त मे लाखो सैनिक वीर-गति को प्राप्त हुए तथा सभी बडे़ बडे़ योधा युद्ध में मारे गये, जिससे इस वन्श के बचेहुए सभी लोगो के पाव उखड़ गये और वे वहा से जान बचा कर भाग निकले। विस्थापितो की तरह भटकते हुए राजपुताना (राजस्थान) की और प्रस्थान कर गये तथा राजपुताना को अपना सुरक्षित स्थान बनाया एवं राजपुताना के विभिन्न नगरो मे बस गये जिनमे मुख्यतः मारवाड़ (जोधपुर), मेवाड़ (उदयपुर), आमेर, नागौर, अजमेर, जयपुर, सिरोही एवं जालौर मुख्य है।

यही से जीनगर जाति के लोग देश के विभिन्न शहरो मे जाकर बस गये। राजपुताना मे बसने के बाद सबसे बडी समस्या आजीविका की थी, अतः क्षत्रिय गुण धर्म होने से राजघराने के विभिन्न कार्य जेसे तलवार बनाना, म्यान बनाना, घोड़ो की जीन बनाना, राजसी कपड़ो पर छ्पाई आदि कार्य प्रारम्भ कर दिया।

इस प्रकार क्षत्रिय संरक्षण मे इनका क्षत्रिय धर्म भी नष्ट नही हुआ तथा आजीविका भी चलती रही, तथा ये लोग राजघरानो के सम्पर्क मे ही रहे और ये जीनगर क्षत्रिय ही कहलाये। इनके विभीन्न कार्य अनुसार इनकी नौ न्याति कहलायी जो निम्नानुसार है:

(अ) ज़ीनगर (ब) पनीगर (स) सिफलीगर (द) म्यानगर (ए) धइग़र (फ़) छिपलीगर (ग) नेत्रगर (ह) ढालगर (इ) चित्रकार |

समाज मे पंच पंचायत अवसरो पर सभी नौ न्यात को बुलाया जाता था तथा आपस मे शादी ब्याह व सम्बन्ध होते थे।

ज़ीनगर जाति क्षत्रिय कुल (वन्श) से ही है, इसका उल्लेख एक प्राचीन ग्रन्थ जो संवत् 1860-1900 विक्रम मे जोधपुर नरेश श्रीमान महाराजा मानसिंहजी के समय मे राजकवि कविराज श्री बाकीदासजी चारण का लिखा हुआ "एतिहासिक बाते" से होता है। इस ग्रन्थ की हस्त लिखित प्रति जोधपुर राज्य के महकमे मे सुरक्षित है। उक्त ग्रन्थ मे पृष्ठ संख्या 2466 मे लिखा है कि "ज़ीनगर जाति की खास उत्पति क्षत्रिय कुल से ही है। परन्तु ये लोग भगवान परशुरामजी के डर से दूसरी जाति मे गिनाने लगे। इनके गोत्र तथा प्राचीन क्षत्रियो के गोत्र एक ही है। इतना ही नही, मारवाड़ राज्य के जोधपुर मे करीब शताब्दी पूर्व बने मकानो के सरकारी पट्टो मे जीनगर राजपुत नाम मिलता है। इससे ये सिद्ध होता है कि जीनगर जाति क्षत्रिय कुल से ही है| जैसा कि ऊपर वर्णित है जीनगर जाति के लोग शिल्पकारी व कारीगरी वाणिज्य का कार्य करके ही अपना जीवन यापन कारते थे जो कि राजा महाराजाओ के आश्रित काम पर ही निर्भर था।

सन्दर्भ[संपादित करें]