जहाँज़ेब बानो बेगम

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जहाँज़ेब बानो बेगम
मुगल शहजादी
Jahanzeb Banu Begum.jpg
निधनमार्च 1705
गुजरात, भारत
समाधि
जीवनसंगीमोहम्मद आज़म शाह (वि॰ 1669)
संतानबीदर बख्त
जवां बख्त बहादुर
सिकन्दर शान बहादुर
नजीब-उन-निशा बेगम
पूरा नाम
जहाँज़ेब बानो
घरानातैमूरी राजवंश (जन्म से)
पितादारा शिकोह
मातानादिरा बानू बेगम
धर्मसुन्नी इस्लाम

जहाँज़ेब बानो बेगम (मृत्यु 1705) जानी बेगम के नाम से लोकप्रिय थी। [1] वह एक मुगल शहजादी और आज़म शाह की मुख्य पत्नी थी,[2] जो सम्राट औरंगजेब के उत्तराधिकारी, और 1707 में संक्षेप में मुगल सम्राट बने।

उनके पिता के अधीन काम करने वाली इतालवी लेखिका और यात्री, निकोलाओ मनुची ने उन्हें सुंदर और साहसी बताया।[3]

परिवार और प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

जहाँज़ेब युवराज दारा शिकोह की बेटी थी, जो सम्राट शाहजहाँ के सबसे बड़े बेटे और सिंहसान के उत्तराधिकारी थे। [4] उनकी मां, नादिरा बानो बेगम, एक मुगल शहजादी थीं और सम्राट जहांगीर के दूसरे बेटे और शाहजहां के बड़े सौतेले भाई युवराज मुहम्मद परविज़ की बेटी थीं। [5] दारा शिकोह को शाहजहाँ के साथ-साथ उनकी बड़ी बहन, शहजादी जहाँआरा बेगम ने शाहजहाँ के उत्तराधिकारी के रूप में पसंद किया था। जहाँआरा हमेशा अपने छोटे भाई की प्रबल पक्षधर रही थी और उसका बहुत समर्थन करती थी।

नादिरा बेगम की मृत्यु 1659 में पेचिश से हुई थी [6] और उनकी मृत्यु के कुछ दिनों बाद, दारा शिकोह को उनके छोटे भाई, औरंगज़ेब के आदेश के अनुसार मार डाला गया था। दारा शिकोह की मृत्यु के बाद, जो शाहजहाँ का उत्तराधिकारी था, औरंगजेब छठे मुगल सम्राट बने। अपने माता-पिता की लगातार मृत्यु के बाद जहाँज़ेब अनाथ हो गई। [7] अब उनकी नई शक्तिशाली चाची, शहजादी रोशनआरा बेगम को उनकी देखभाल के लिए सौंप दिया गया था, रोशनआरा ने तुरंत जहांजेब के साथ दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया। [8]

इसलिए, उसे औरंगजेब द्वारा आगरा के किले में भेज दिया गया, जहाँ उसके दादा, शाहजहाँ को कैद किया गया था। वहाँ जहाँज़ेब को उसकी सबसे बड़ी चाची जहाँआरा बेगम ने पाला था, मानो वह उसकी अपनी बेटी हो। उनके संरक्षण में, जहाँज़ेब बड़ी होकर एक सुंदर और संस्कारी शहजादी बनी। [9] जब 1681 में जहांआरा की मृत्यु हुई, तो उसने अपनी पसंदीदा भतीजी जहाँज़ेब को अपने बेहतरीन रत्न और गहने दिए। [10]

शादी[संपादित करें]

3 जनवरी 1669 को, जहाँज़ेब ने अपने पहले चचेरे भाई, शहजादे मुहम्मद आज़म, जो उनके चाचा औरंगजेब के सबसे बड़े बेटे और उनकी मुख्य पत्नी, दिलरस बानो बेगम के बेटे से शादी की। [11] एक भव्य समारोहों के बीच, जहांआरा बेगम द्वारा इस विवाह समारोह की व्यवस्था की गई थी और यह उनके महल में हुआ था। [12]उनकी शादी बेहद खुशहाल साबित हुई। जानी बेगम, मुहम्मद आजम के भरोसेमंद साथी और विश्वासपात्र होने के साथ-साथ उनकी पसंदीदा पत्नी भी थीं, जिन्हें वे बहुत प्यार करते थे।[13] वह औरंगजेब की सबसे प्यारी बहू भी थी।[14]

उन्होंने 4 अगस्त 1670 को मुहम्मद आजम के सबसे बड़े बेटे को जन्म दिया। उनके दादा ने उनका नाम 'बीदर बख्त' रखा था।[15] औरंगजेब ने अपने पूरे जीवन में इन दोनों और उनके सबसे बड़े बेटे, राजकुमार बीदर बख्त, जो एक वीर, बुद्धिमान और हमेशा सफल सेनापति के प्रति हमेशा प्यार जताया, और इन तीनों को लगातार उपहार भेंट किया करते थे।[13] बीदर बख्त अपने दादा के बुढ़ापे में उनके पसंदीदा पोते थे। [16]

अपनी शादी के बाद, जहाँज़ेब ने अपने पति के घर में कई भूमिकाएँ निभाईं। उनमें से दो विशेष रूप से मुख्य हैं। पहले को मोटे तौरपर सैन्य के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, दूसरा, उतना ही महत्वपूर्ण। जहाँज़ेब ने सौहार्द की मजबूत भावना पैदा करके, रियासतों के प्रमुख सदस्यों के बीच संघर्ष को सुलझाया और सामंजस्यपूर्ण घरेलू संबंध बनाए रखा। जेसा की 1702 की सर्दियों में सामने आया, जब आज़म और उसके मुख्य शिकारी कोका मीर हेदयातुल्लाह के बीच एक झगड़ा हुआ, जब वह शिकार पर थे। आजम आगबबूला हो गया और उसने तुरंत कोका को अपने घर से निकाल दिया। अपने पति को मीर हेदयातुल्लाह को माफ़ करने का जिम्मा जहाँज़ेब पर आ गया, जिस वह करने में सक्षम थी। कुछ दिनों के बाद, मीर हेदयातुल्लाह अपने पुराने पद पर आज़म के घर में शामिल हो गए। [17]

राजकुमारी, आजम और उनके बेटे, प्रिंस बीदर बख्त के बीच संबंधों के प्रबंधन के लिए भी जिम्मेदार थी। दुर्भाग्य से शाही पक्ष ने बीदर बख्त और उनके पिता के बीच संबंधों में जहर घोल दिया। जब 1700 के दशक की शुरुआत में बीदर को मालवा का वायसराय नियुक्त किया गया (गुजरात से सटा हुआ जहां आजम सेवा कर रहा था), जहाँज़ेब ने अपने चाचा औरंगजेब से बीदर को आने और उससे मिलने की अनुमति देने के लिए याचिका दायर की, क्योंकि उसने उसे लंबे समय से नहीं देखा था। युवा राजकुमार को अपनी मां से मिलने के लिए सात दिनों का समय दिया गया था। [17]

सैन्य कार्रवाई[संपादित करें]

अपने पति के घर में जहाँज़ेब की पहली भूमिका को मोटे तौर पर एक सैन्य के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। 1679 में, राजकुमारी ने तीन सप्ताह से अधिक समय तक अपने पति की सैन्य टुकड़ियों का नेतृत्व किया, जब राजकुमार को अपने पिता औरंगजेब के तत्काल सम्मन पर आगे बढ़ने के लिए मजबूर किया गया था। तीन साल बाद, 1682 में, जहाँज़ेब ने मराठा सेना पर एक पिछड़े मुगल सेना को पलटवार को प्रोत्साहित करने के लिए खुद हाथी पर चढ़ाई की। कहा जाता है कि उसने व्यक्तिगत रूप से भाले और पान सौंपे थे और मुगल सेना के खत्म होने पर आत्महत्या करने का वादा किया था। वह 1685-6 में फिर से युद्ध में उतरी जब बीजापुर पर आक्रमण के दौरान आजम की सेना ने सभी आशा खो दी थी और उस समय उसे मनोबल बढ़ाने का श्रेय दिया जाता है।[17]

मृत्यु[संपादित करें]

1860 के दशक में औरंगाबाद के पास जहाँज़ेब का मकबरा

1705 में दाहिने स्तन में फोड़ा होने से जहाँज़ेब की मृत्यु हो गई। फ्रांसीसी डॉक्टर मॉन्स मार्टिन ने प्रस्ताव दिया था कि राजकुमारी की उस समय दिल्ली में रहने वाली उसकी एक महिला रिश्तेदार (जाहिर तौर पर एक इंडो-पुर्तगाली ईसाई महिला) द्वारा जांच की जानी चाहिए, जो सर्जरी (हजीका) में कुशल थी ताकि वह उसकी रिपोर्ट के अनुसार दवाएं लिख सके। लेकिन राजकुमारी ने शराब पीने वाली एक महिला द्वारा जांच करने से इनकार कर दिया, ऐसा न हो कि उसका शरीर उसके स्पर्श से दूषित हो जाए। यह बीमारी दो साल तक चली और अंत में वह बहुत दर्द में मर गई। उसकी मृत्यु के बाद, आजम बहुत दुःख और निराशा से भर गया जिसने उसके शेष जीवन को अंधकारमय कर दिया। [13]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Sarkar, Sir Jadunath (1972). Southern India, 1645-1669 (अंग्रेज़ी में). Orient Longman. पृ॰ 215.
  2. Sarkar, Sir Jadunath (1933). Studies in Aurangzib's reign: (being Studies in Mughal India, first series) (अंग्रेज़ी में). Orient Longman. पृ॰ 44.
  3. Annie Krieger-Krynicki (2005). Captive princess: Zebunissa, daughter of Emperor Aurangzeb. Oxford University Press. पृ॰ 190.
  4. Vogel, J. Hutchison, J. Ph (1994). History of the Panjab hill states. New Delhi, India: Asian Educational Services. पृ॰ 257. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788120609426.
  5. Robinson, Annemarie Schimmel ; translated by Corinne Attwood ; edited by Burzine K. Waghmar ; with a foreword by Francis (2004). The empire of the Great Mughals : history, art and culture (Revised संस्करण). Lahore: Reaktion Books. पृ॰ 201. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9781861891853.
  6. Hansen, Waldemar (1972). The peacock throne : the drama of Mogul India (1. Indian ed., repr. संस्करण). Delhi: Motilal Banarsidass. पृ॰ 359. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 812080225X.
  7. Sarker, Kobita (2007). Shah Jahan and his paradise on earth : the story of Shah Jahan's creations in Agra and Shahjahanabad in the golden days of the Mughals (1. publ. संस्करण). Kolkata: K.P. Bagchi & Co. पृ॰ 194. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-8170743002.
  8. Annie Krieger-Krynicki (2005). Captive princess: Zebunissa, daughter of Emperor Aurangzeb. Oxford University Press. पपृ॰ 104, 206.
  9. Hansen, Waldemar (1972). The Peacock Throne : the drama of Mogul India. Delhi: Motilal Banarsidass. पृ॰ 394. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788120802254.
  10. Lasky, Kathryn (2002). Jahanara, Princess of Princesses. New York: Scholastic. पृ॰ 148. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9780439223508.
  11. Chandra, Satish (2005). Medieval India: From Sultanate To The Mughals: Part I: Delhi Sultanate (1206-1526). Har-Anand Publications. पृ॰ 273.
  12. Sir Jadunath Sarkar (1920). History of Aurangzib: Northern India, 1658-1681. M.C. Sarkar & sons. पृ॰ 64.
  13. Sir Jadunath Sarkar (1933). Studies in Aurangzib's reign: (being Studies in Mughal India, first series). Orient Longman. पपृ॰ 43, 53, 56.
  14. Sir Jadunath Sarkar (1979). A Short History of Aurangzib, 1618-1707. Orient Longman. पृ॰ 318.
  15. Commissariat, Mānekshāh Sorābshāh (1957). A History of Gujarat: Mughal period, from 1573 to 1758. Longmans, Green & Company. पृ॰ 214.
  16. Sir Jadunath Sarkar. History of Aurangzib: mainly based on Persian sources, Volume 3. Orient Longman. पृ॰ 31.
  17. Faruqui, Munis D. (2012). Princes of the Mughal Empire, 1504-1719. Cambridge University Press. पपृ॰ 110–111. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1107022171.