जस सैंगुइनिस
जस सैंगुइनिस (लातिन: Jus sanguinis), जिसका शाब्दिक अर्थ 'रक्त का अधिकार' है, राष्ट्रीयता और नागरिकता कानून का एक प्रमुख सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार, किसी बच्चे की नागरिकता का निर्धारण उसके जन्मस्थान के आधार पर नहीं, बल्कि उसके माता-पिता (या दोनों में से किसी एक) की नागरिकता के आधार पर किया जाता है। सरल शब्दों में, यह वंशानुगत या रक्त-संबंध पर आधारित नागरिकता की प्रणाली है। यह अवधारणा आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कानून और दुनिया के अधिकांश देशों की नागरिकता प्रणालियों का एक मूलभूत स्तंभ है।[1]
उत्पत्ति और वैचारिक आधार
[संपादित करें]'जस सैंगुइनिस' की अवधारणा की जड़ें प्राचीन रोमन साम्राज्य के नागरिकता कानूनों में खोजी जा सकती हैं। रोमन व्यवस्था में नागरिकता एक अत्यंत विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति थी, जो मुख्य रूप से एक रोमन नागरिक की संतान होने पर ही प्राप्त होती थी, चाहे बच्चे का जन्म साम्राज्य के किसी भी हिस्से में क्यों न हुआ हो।
यह सिद्धांत इसके ठीक विपरीत सिद्धांत, जस सोली यानी 'भूमि का अधिकार' से बिल्कुल अलग है। 'जस सोली' के तहत, जो व्यक्ति जिस देश की सीमा या भूमि के भीतर जन्म लेता है, उसे स्वतः ही उस देश की नागरिकता मिल जाती है (जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका या कनाडा में)। जबकि 'जस सैंगुइनिस' प्रणाली में जन्म का स्थान गौण होता है और माता-पिता की राष्ट्रीयता सर्वोपरि होती है।[2]
वैश्विक स्तर पर अनुप्रयोग
[संपादित करें]आज दुनिया के अधिकांश देशों-aविशेषकर यूरोप, एशिया और अफ्रीका-में नागरिकता मुख्य रूप से 'जस सैंगुइनिस' के आधार पर ही प्रदान की जाती है।
- यूरोप: जर्मनी, इटली, और स्विट्जरलैंड जैसे देशों का नागरिकता कानून ऐतिहासिक रूप से इसी सिद्धांत पर आधारित रहा है। इन देशों में राष्ट्रीयता को संस्कृति और साझा वंशावली से जोड़कर देखा जाता है। उदाहरण के लिए, इटली में कोई व्यक्ति जिसके पूर्वज इतालवी थे, वह कई पीढ़ियों बाद भी इतालवी नागरिकता का दावा कर सकता है, बशर्ते उसने नागरिकता की निरंतरता खोई न हो।[3]
- एशिया: जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में नागरिकता के नियम बहुत सख्त हैं और वे पूरी तरह से 'जस सैंगुइनिस' पर निर्भर करते हैं। यदि माता-पिता जापानी नहीं हैं, तो जापान में पैदा होने वाले बच्चे को स्वतः नागरिकता नहीं मिलती।
भारतीय नागरिकता के संदर्भ में
[संपादित करें]भारत का नागरिकता कानून (नागरिकता अधिनियम, 1955) भी वर्तमान में मुख्य रूप से 'जस सैंगुइनिस' के सिद्धांत की ओर झुका हुआ है, हालाँकि ऐतिहासिक रूप से यह एक मिश्रित प्रणाली रही है। जब भारत का संविधान लागू हुआ था, तब नागरिकता मुख्य रूप से जन्मस्थान (जस सोली) के आधार पर दी जाती थी। लेकिन 1986 और 2003 के संशोधनों के बाद, भारत ने जन्म आधारित नागरिकता के नियमों को कड़ा कर दिया।
वर्तमान भारतीय कानून के अनुसार, भारत में जन्म लेने वाले बच्चे को तभी भारत का नागरिक माना जाएगा जब उसके माता-पिता में से कम से कम एक भारतीय नागरिक हो, और दूसरा अवैध प्रवासी न हो। इसी प्रकार, भारत के बाहर जन्म लेने वाले बच्चे 'जस सैंगुइनिस' (वंश के आधार पर) के तहत भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं, बशर्ते उनके माता या पिता भारतीय हों और जन्म का पंजीकरण निर्धारित समय के भीतर भारतीय वाणिज्य दूतावास में कराया गया हो।[4]
आलोचना और जटिलताएँ
[संपादित करें]यद्यपि यह प्रणाली राष्ट्रों को अपनी सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय पहचान बनाए रखने में मदद करती है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी आलोचना यह है कि यह राज्यविहीनता की स्थिति पैदा कर सकती है। यदि कोई बच्चा किसी ऐसे देश में पैदा होता है जो 'जस सैंगुइनिस' का पालन करता है (जैसे जापान), लेकिन उसके माता-पिता किसी ऐसे देश के नागरिक हैं जहाँ विदेश में जन्मे बच्चों को नागरिकता नहीं मिलती, तो वह बच्चा जन्म से ही बिना किसी देश की नागरिकता के (राज्यविहीन) रह जाएगा। इसे रोकने के लिए, कई देशों ने अब 'जस सोली' और 'जस सैंगुइनिस' के मिश्रित रूप को अपनाना शुरू कर दिया है।[5]
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Scott, Shirley V. (2010). International Law in World Politics: An Introduction.
- ↑ Vink, Maarten P.; Bauböck, Rainer (2003). Citizenship Policies in the New Europe. Amsterdam University Press. pp. 35-38. ISBN 978-9053569221.
- ↑ Spiro, Peter J. (2010). "Dual Citizenship as Human Right". International Journal of Constitutional Law. 8 (1): 111–130.
- ↑ Jayal, Niraja Gopal (2013). Citizenship and Its Discontents: An Indian History. Harvard University Press. pp. 51–55. ISBN 978-0674066847.
- ↑ "About Statelessness". UNHCR (United Nations High Commissioner for Refugees).