जसनाथ

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श्री गुरु जसनाथ जी
Jasnath ji.jpg
श्री गुरु जसनाथ जी महाराज
संबंध जसनाथी संप्रदाय
प्रमुख पंथ केंद्र कतरियासर,बम्बलू,लिखमादेसर, पुनरासर, पांचला सिद्धा, लीलसर,आदि।
मंत्र "फते फते"
पशु सभी तरह के वन्यजीव जंतु पशु पक्षी
प्रतीक [हरी जाळ]
माता-पिता

हमीर जी जाणी और

माता रूपादे
क्षेत्र राजस्थान , भारत
समुदाय हिन्दू
त्यौहार जसनाथी महाराज का मेला आश्विन शुक्ल सप्तमी और चैत्र सुदी सप्तमी को भरता है

[1]

[2]जसनाथी सम्प्रदाय जसनाथ जी महाराज जसनाथी संप्रदाय के संस्थापक थे। ये जसनाथ जी के नाम से भी जाने जाते है। इन्होंने विक्रम संवत 1551 में जसनाथी पंथ की स्थापना की। जसनाथजी महाराज ने समाधि लेते समय हरोजी को धर्म (सम्प्रदाय) के प्रचार, धर्मपीठ की स्थापना करने की आज्ञा दी. सती कालो की बहन प्यारल देवी को मालासर भेजा विक्रम संवत 1551 में जसनाथजी ने चुरू में [3]सनाथी संप्रदाय की स्थापना कर दी थी दस वर्ष पश्चात विक्रम संवत 1561 में लालदेसर गाँव (बीकानेर) के चौधरी रामू सारण ने प्रथम उपदेश लिया. उन्हें 36 धर्मों की आंकड़ी नियमावली सुनाई, चुलू दी और उनके धागा बांधा. यहीं से विधिवत शुरूआत मानी जाती है।

इनका जन्म राजस्थान के बीकानेर परगने के कतरियासर गांव में सन् 1482 में (विक्रम संवत 1539 कार्तिक सुदी एकादशी शनिवार) हुआ था।

जसनाथ जी का अवतार[संपादित करें]

सिद्घाचार्य जसनाथजी का आविर्भाव पावन पर्व काती सुदी एकादशी देवउठणी ग्यारस वार शनिवार को ब्रह्मा मुहूर्त में हुआ। ईश्वर किसी न किसी निमित्त को दृष्टिगत रखकर ही अवतार लेते हैं। सिद्घाचार्य जसनाथजी के रूप में उनके अवतार लेने का एक निमित्त यह बताया जाता है कि कतरियासर गांव के आधिपति हमीरजी जाणी ने सत्ययुगादि में तपस्या की थी। उसी के वरदान की अनुपालना में भगवान कतरियासर गांव से उत्तर दिशा में स्थित डाभला तालाब के पास बालक के रूप में प्रकट हुए। भगवान ने जसनाथजी के रूप में अवतार लेने के उपरान्त हमीरजी जाणी के घर पुत्र के रूप में निवास किया। ये बाल्यकाल से ही चमत्कारी थे। जब वे छोटे थे तो अंगारों से भरी अंगीठी में बैठ गए। माता रूपांदे ने घबराकर जब उन्हें बाहर निकाला तो वे यह देखकर दंग रह गई कि बालक के शरीर में जलने का कोई निशान तक नहीं है। मानो वे स्वयं वैश्वानर हों। अग्नि का उन पर कोई असर नहीं हुआ। धधकते अंगारों पर अग्नि नृत्य करना आज भी जसनाथी सम्प्रदाय के सिद्घों की आश्चर्यजनक क्रिया है, जो देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है। जसनाथजी का दूसरा चमत्कार दो वर्ष की अवस्था में माना जाता है जब इन्होंने एक ही जगह बैठकर डेढ़ मण दूध पी लिया। एक अन्य चमत्कार के अनुसार बालक जसवंत ने नमक को मिट्टी में परिवर्तित किया। कतरियासर गांव में नमक के बोरे लेकर आए व्यापारियों ने विनोद में बालक जसवंत से कहा देखो जसवन्त इन बोरों में मिट्टी भरी है। यदि चखने की इच्छा हो तो एक डली तुम्हें दें। तब इन्होंने प्रसाद के रूप में उसे ग्रहण करते हुए कहा मिट्टी तो बड़ी स्वादिष्ट और मीठी है। इस प्रकार सारा नमक मिट्टी में परिवर्तित हो गया। इस प्रकार के अनेक चमत्कार जसनाथजी के बाल्य जीवन से जुडे़ हुए हैं।

जसनाथ जी के चमत्कारों की ख्याति[संपादित करें]

जसनाथ जी के चमत्कारों को सुनकर ही इनके समकालीन विश्नोई सम्प्रदाय के प्रवर्तक गुरू जंभेश्वर महाराज, बीकानेर राज्य के लूणकरण और घड़सीजी, दिल्ली का शाह सिकंदर लोदी इत्यादि इनसे मिलने कतरियासर धाम आए थे। सिकंदर लोदी ने जसनाथ जी के चमत्कारों से प्रभावित होकर कही एकड़ जमीन भेंट की थी।

जसनाथ जी की सगाई[संपादित करें]

सिद्घाचार्य जसनाथजी छोटे थे तब उनकी सगाई हरियाणा राज्य के चूड़ीखेडा़ गांव के निवासी नेपालजी बेनीवाल की कन्या काळलदेजी के साथ हुई। काळलदेजी सती और भगवती का अवतार मानी जाती है।

जसनाथजी की जीवित समाधि[संपादित करें]

जसनाथजी ने 24 वर्ष की अल्पायु में जीवित समाधि ले ली। इससे पहले उन्होंने अपने प्रमुख शिष्य बम्बलू गांव के हरोजी को चूड़ीखेड़ा (हरियाणा) जाकर सती काळलदे को समाधि एवं महानिर्वाण की निर्धारित तिथि की सूचना देकर कतरियासर लाने का आदेश दिया। हरोजी के अनुनय-विनय और निशानी के रूप में जसनाथजी की माला देने पर सती काळलदे के साथ प्यारलदे और उनका अपाहिज भाई बोयतजी रथारूढ़ होकर कतरियासर के लिए रवाना हो गए। कहते हैं तब वहां के बेनीवाल परिवार के 140 सदस्य भी सती के साथ कतरियासर पहुंच गए। जब हरोजी ने गोरखमाळिया जाकर जसनाथजी को सती काळलदेजी के आगमन की सूचना दी तो इन्होंने कहा कि उन्हें यहीं लिवा लाओ। लेकिन सती काळलदेजी के कहने पर जब हरोजी उन्हें सामने पधारने का आग्रह करने दुबारा गए तो वे अपने आसन पर नहीं मिले। बाद में बेनीवाल परिवार और अन्य श्रद्घालु भक्तों की कारूणिक-दशा को देखकर सिद्घाचार्य श्रीदेव जसनाथजी उन्हें दर्शन देने के लिए अपने आदि आसन गोरखमाळिया पर पुन: प्रकट हुए और अपने दिव्य दर्शन से श्रद्घालु भक्तों को निहाल कर दिया। बाद में इनहोंने अपने शिष्यों और अनुयायियों को समाधि खोदने की आज्ञा दी। अपने प्रिय शिष्य हरोजी की ज्ञान-प्रार्थना सुनकर जसनाथजी ने उन्हें और अपने अन्य अनन्य श्रद्घालु भक्तों से कहा कि जब मैं भू-खनन समाधि में बैठकर स्थिर हो जाऊं तो तुम मेरी परिक्रमा देना। इससे तुम्हें अपूर्व ज्ञान की प्राप्ति होगी। इस प्रकार आसोज सुदी , विक्रम संवत् क्भ्म्फ् के दिन सिद्घाचार्य श्रीदेव जसनाथजी जीवित समाधि लेकर अंतर्धान हो गए। उसी समय सती शिरोमणि काळलदेजी ने भी कतरियासर की पावन धरा पर ही समाधिस्थ होकर महानिर्वाण का परमपद प्राप्त किया। आज भी प्रतिवर्ष हजारों श्रद्घालु कतरियासर धाम पहुंचकर सिद्घाचार्य श्रीदेव जसनाथजी एवं सती शिरोमण काळलदेजी के सम्मुख दर्शनार्थ धोक लगाकर धन्य-धन्य होते हैं।


इस संप्रदाय में तीन वर्ग हैं - १. सिद्ध २. सेवक ३. साधू

संप्रदाय का एक कुलगुरु होता है. सिद्धों की दीक्षा सिद्ध गुरु द्वारा दी जाती है. कुलगुरु का कार्य संप्रदाय को व्यवस्थित रखना है.

जसनाथ संप्रदाय में पाँच महंतों की परम्परा है. कतरियासर, बंगालू (चुरू) लिखमादेसर, पुनरासर एवं पांचला (मारवाड़) और लीलसर गाँव (बाड़मेर) यानि बीकानेर में चार और बाड़मेर में एक गद्दी है. इन पाँच गद्दियों के बाद 5 धाम, फ़िर 12 धाम, और 84 बाड़ी, 1o8 स्थापनाएँ और शेष भावनाएँ. इस प्रकार इस संप्रदाय का संगठन गाँवों तक फैला है. [3]

जसनाथ सिद्धों का प्रारम्भ वाम मार्गी एवं भ्रष्ट तांत्रिकों के विरोध में हुआ था. सामान्य जनता शराब, मांस एवं उन्मुक्त वातावरण की और तेजी से बढ़ रही थी उस समय राजस्थान में जसनाथ संप्रदाय ने इस आंधी को रोका. भोगवादी प्रवृति को रोकने एवं चरित्र निर्माण के उद्देश्य से लोगों को आकर्षित किया और अग्नि नृत्य का प्रचलन कराया. इससे लोग एकत्रित होते थे, प्रभावित होते थे, जसनाथ जी उनको उपदेश देते थे. इस प्रकार उनके सद्विचारों का जनता पर काफ़ी प्रभाव पड़ा. बाद में अग्नि नृत्य इस संप्रदाय का प्रचार मध्यम बन गया. इस संप्रदाय के लोग पुरूष पगड़ी (भगवां रंग) बांधते हैं और स्त्रियाँ छींट का घाघरा पहनती हैं. देवी देवताओं की उपासना वर्जित है. मुर्दा को जमीन में गाड़ते हैं. बाड़ी में स्थित कब्रिस्थान में ही मुर्दे गाडे़ जाते हैं और समाधि बनादी जाती है.


इनके तीन मुख्य पर्व हैं-

१. जसनाथ जी द्वारा समाधि लेने के दिन यानि जसनाथ जी का निर्वाण पर्व आश्विन शुक्ला सप्तमी को मनाया जाता है. २. माघ शुक्ला सप्तमी को जसनाथ जी के शिष्य हांसूजी में जसनाथ जी को ज्योति प्रकट होने की स्मृति में मनाते हैं. ३. चैत में दो पर्व - चैत्र सुदी चौथ को सती जी का और तीन दिन बाद सप्तमी को जसनाथ जी का पर्व मनाया जाता है.

सिद्ध लोग कतरियासर में सती के दर्शन करने छठ को आते हैं और रात को जागरण के पश्चात सप्तमी को वापिस चले जाते हैं. मलानी की और से आने वाले जाट सिद्ध एवं अन्य सेवक ठहर जाते हैं. और सप्तमी का पर्व वहीं मानते हैं. अन्य पर्व सभी अपने-अपन्व गावों में एक दिन पूर्व जागरण करते है. यह अग्नि नृत्य के समय नगाड़ों एवं मजिरों की ध्वनि के सात भजन गाते हैं. एक प्रकार से यह सम्प्रदाय मुख्यतः जाटों का ही है.



जसनाथ जी के 36 नियम[संपादित करें]

जसनाथजी ने लालमदेसर के रामू सारण को समाज के मार्गदर्शन हेतु 36 धर्म नियम बताए। ये नियम आगे चलकर नवीन सिद्ध धर्म की आधारशिला बने। इनके बारे में कहा जाता है कि –

“नेम छत्तीस ही धर्म के कहे गुरु जसनाथ, या विध धर्म सुधारसी, भव सागर तिर जात।”

इन नियमों के जरिए जसनाथजी महाराज थोड़े शब्दों में ही वेदों और शास्त्रों का सार कह गए। सबसे अच्छी बात यह थी कि ये नियम जनसाधारण की मायड़ भाषा में थे। ये ३६ नियम निम्नलिखित हैं-

1. जो कोई सिद्ध धर्म धरासी

2. उत्तम करणी राखो आछी

3. राह चलो, धर्म अपना रखो

4. भूख मरो पण जीव ना भखो

5. शील स्नान सांवरी सूरत

6. जोत पाठ परमेश्वर मूरत

7. होम जाप अग्नीश्वर पूजा

8. अन्य देव मत मानो दूजा

9. ऐंठे मुख पर फूंक ना दीजो

10. निकम्मी बात काल मत कीजो

11. मुख से राम नाम गुण लीजो

12. शिव शंकर को ध्यान धरीजो

13. कन्या दाम कदै नहीं लीजो

14. ब्याज बसेवो दूर करीजो

15. गुरु की आज्ञा विश्वंत बांटो

16. काया लगे नहीं अग्नि कांटो

17. हुक्को, तमाखू पीजे नाहीं

18. लसन अर भांग दूर हटाई

19. साटियो सौदा वर्जित ताई

20. बैल बढ़ावन पावे नाहीं

21. मृगां बन में रखत कराई

22. घेटा बकरा थाट सवाई

23. दया धर्म सदा ही मन भाई

24. घर आयां सत्कार सदा ही

25. भूरी जटा सिर पर रखीजे

26. गुरु मंत्र हृदय में धरीजे

27. देही भोम समाधि लीजे

28. दूध नीर नित्य छान रखीजे

29. निंद्या, कूड़, कपट नहीं कीजे

30. चोरी जारी पर हर ना दीजे

31. राजश्वला नारी दूर करीजे

32. हाथ उसी का जल नहीं लीजे

33. काला पानी पीजे नाहीं

34. नाम उसी का लीजे नाहीं

35. दस दिन सूतक पालो भाई

36. कुल की काट करीजे नाहीं

यहाँ देखा जाए तो ‘जो कोई सिद्ध धर्म धरासी’ से वस्तुतः एक ही नियम ‘जो भी सिद्ध धर्म का पालन करेगा, वह सदैव उत्तम कार्य करेगा’ बनता है। नियमों की संख्या में इस कमी का कारण लगातार मौखिक परम्परा के रूप में प्रचलित होने से कुछ नियमों यथा ‘पिंडा दान कदै ना कीजे’ (श्राद्ध तर्पण का निषेध) जैसे नियमों का जन स्मृति से लोप है। पहले ही नियम से स्पष्ट है की जसनाथ जी ने कर्मवाद को महत्त्व दिया है। ‘राह चलो, धर्म अपना रखो’ के माध्यम से जसनाथजी ने पथभ्रष्ट होने से बचने एवं स्वधर्म पालन का निर्देश दिया है जो तत्कालीन मुस्लिम शासन में लम्पट धर्मांतरण के विरोध में था, आज के भौतिकता वादी युग में पश्चात्यीकरण के सम्बन्ध में प्रासंगिक है। ‘गुरु मंत्र हृदय में धरीजे’ के जरिए भी जसनाथजी ने इसी बात की चेतावनी दी है। ‘भूख मरो पण जीव ना भखो’ जसनाथजी ने अहिंसा पर बल देते हुए कहा है की किसी जीव की हत्या करने से अच्छा है भूख मरना, इससे सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि जसनाथजी प्राणियों के प्रति कितने संवेदनशील थे। इस बात का एक सबूत यह भी है कि जसनाथजी द्वारा सर्वाधिक नियम इसी विषय पर है। प्राणिमात्र के प्रति दया भाव के अनुरूप ‘दया धर्म सदा ही मन भाई’ उस भाव को यथार्थ से जोड़ने हेतु पशुओं को साटियों/कसाइयों को बेचने की बजाय साथी पशुपालकों को बेचने का निर्देश ‘साटियो सौदा वर्जित ताई’, पशु क्रूरता को रोकने हेतु बछड़ों के बधियाकरण रोकना ‘बैल बढ़ावन पावे नाहीं’, वन्य जीवों विशेषतः स्थानीय छोटे हिरणों (चिंकारा) के संरक्षण का निर्देश ‘मृगां वन में रखत कराई’ और इसी क्रम में घेटों और अमर बकरों के लिए थाट की व्यवस्था का निर्देश ‘घेटा बकरा थाट सवाई’ दिया है। ‘शील स्नान सांवरी सूरत’ में जसनाथ जी ने शारीरिक स्वच्छता के महत्व को समझते हुए नित्य प्रतिदिन स्नान का निर्देश दिया। उल्लेखनीय है कि जब पड़ौसी गांव मौलानिया के चौधरी ने जसनाथजी से अपने ऊँट के बारे में पूछा तो जसनाथजी ने उससे नित्य स्नान का वचन लिए। शरीर के अलावा व्यक्ति का मन भी शुद्ध होना चाहिए इसी विश्वास के साथ जसनाथ जी ने लोगों को ‘निंद्या, कूड़, कपट नहीं कीजे’ निर्देश दिया है। लोगों की संपत्ति पर कुदृष्टि ना डालने का कहते हुए ‘चोरी जारी पर हर ना दीजे’ का निर्देश। ‘जोत पाठ परमेश्वर मूरत’ तथा ‘होम-जाप अग्नीश्वर पूजा’ सिद्ध धर्म की पूजा पद्धति का आधार बने। ‘अन्य देव मत मानो दूजा’ के जरिए जसनाथजी ने एक ही नियम से सिद्धों को एकेश्वरवाद को अपनाने को कह दिया। अग्नि मानव के प्रथम आविष्कारों में से एक है, यह प्रागैतिहासिक काल से हमारे काम आ रही है, गंगा की तरह सब अशुद्धियों को नष्ट करके भी स्वयं अपवित्र नहीं होती, अतः उच्छिष्ट मुख से इसमें फूंक देकर इसके अपमान को ‘ऐंठे मुख पर फूंक ना दीजो’ के जरिए निषेध किया। जो मनुष्य निर्जीव वस्तुओं, पशु-पक्षियों के प्रति भी कृतज्ञता रखेगा वह मानव समाज के लायक बनेगा। प्रकृतिपूजक समाजों का मर्म यही है। ‘निकम्मी बात काल मत कीजो’ में समय के मूल्य और शब्दों के महत्त्व को समझते हुए गुरु महाराज ने व्यक्ति को मितभाषी बनने और व्यर्थ प्रलाप से बचने की सलाह दी है। ‘मुख से राम नाम गुण लीजो’ तथा ‘शिवशंकर को ध्यान धरीजो’ में जसनाथजी ने ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का निर्देश देते हुए उसके यशोगान तथा ध्यान का निर्देश दिया। तत्कालीन समाज में जब कन्या दान का वैदिक संस्कार पतित होकर विक्रय का रूप ले चुका था, लोग रीत के पैसे के लिए अपनी बेटियों का बेमेल विवाह कर रहे थे, जसनाथ जी ने मुक्तिदाता के रूप में ‘कन्या दाम कदै नहीं लीजो’ कहा। उस समय जब सूदखोर अनाप-शनाप ब्याज लेकर किसानों के खेत हड़प रहे थे, जसनाथजी ने ब्याज से दूर रहने का निर्देश ‘ब्याज बसेवो दूर करीजे’ दिया। जसनाथजी ने सिद्ध धर्म के अबाध प्रचार-प्रसार का निर्देश देते हुए कहा कि ‘गुरु की आज्ञा विश्वंत बांटो, काया लगे नहीं अग्नि कांटो’। ‘हुक्को, तमाखू पीजे नाहीं’ के जरिए जसनाथजी ने तम्बाकू सेवन एवं धुम्रपान के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभावों को देखते हुए इसका निषेध कर दिया, ‘लसन अर भांग दूर हटाई’ में तामसिक पदार्थों पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया। इतना ही नहीं ‘काला पानी पीजे नाहीं, नाम उसी का लीजे नाहीं’ में मद्यपान का निषेध करते हुए जसनाथ जी ने इसका नामोच्चारण तक उचित नहीं समझा। नशा मुक्ति पर इतना जोर समाज को पतन से बचाकर उसके बहुमुखी विकास के लिए ही था। ‘अतिथि देवो भवः’ की भारतीय परम्परा को जसनाथजी ने ‘घर आयां सत्कार सदा ही’ जरिए पुनर्स्थापित किया। ‘भूरी जटा सिर पर रखीजे’ झड़ूला संस्कार से सम्बन्धित है। पर्यावरण में वृक्षों के महत्त्व को देखते हुए, उन्हें बचाने हेतु जसनाथजी ने दाह संस्कार की जगह ‘देही भोम समाधि लीजे’ में समाधि के प्रचलन को प्रोत्साहित किया। स्वच्छ भोजन के महत्त्व को जानते हुए जसनाथ जी ने नियम ‘दूध नीर नित्य छान रखीजे’ का निर्देश दिया। मासिक धर्म के दौरान स्त्रियों की परेशानियों को समझते हुए तथा सैनिटरी नैपकिंस के अभाव के उस युग में शुचिता का ध्यान रखते हुए जसनाथ जी ने ‘रजश्वला नारी दूर करीजे, हाथ उसी का जल नहीं लीजे’। ‘दस दिन सूतक पालो भाई’ संभवतः प्रसूता के कक्ष की स्वच्छता बनाए रखने (जन्म सूतक) के लिए तथा मृत्यु सूतक संभवतः उस समय संक्रामक बीमारी अथवा महामारी से होने वाली मृत्य के फैलने से बचाने के लिए था। समाज में केकड़े के स्वभाव वाले लोग जो स्वजाति बंधुओं की टांग खींचते हैं को चेताते हुए जसनाथ जी ने ‘कुल की काट करीजे नाहीं’ कहा।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

  1. "हिंदी खबर, Latest News in Hindi, हिंदी समाचार, ताजा खबर". Patrika News (hindi में). अभिगमन तिथि 2021-03-08.सीएस1 रखरखाव: नामालूम भाषा (link)
  2. "Jasnath Ji Maharaj - Jatland Wiki". www.jatland.com. अभिगमन तिथि 2021-03-08.
  3. "जसनाथ जी महाराज का अवतार दिवस 31 को". Dainik Bhaskar. 2017-10-29. अभिगमन तिथि 2021-03-08.