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जलीय कृषि

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दक्षिण चिली में जलीय कृषि द्वारा मछली पालन
पारंपरिक कृषि का चित्र

जलीय कृषि, जिसे आमतौर पर जलीय खेती कहा जाता है,,[1] पानी में रहने वाले जीवों और पौधों की खेती है। इसमें मछली, झींगा, शैवाल और कमल जैसे जलीय पौधों की पैदावार होती है। जलीय कृषि मीठे पानी, खारे पानी और समुद्री पानी में अर्ध-प्राकृतिक परिस्थितियों में की जाती है। इसे पारंपरिक वाणिज्यिक मछली पालन से अलग समझा जाता है, जिसमें जंगली मछलियों का शिकार किया जाता है। जलीय कृषि न केवल आर्थिक उत्पादन के लिए होती है, बल्कि समुद्री और मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्रों को पुनर्जीवित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। समुद्री जीवों की पैदावार बढ़ाने के तरीके को समुद्री कृषि कहा जाता है। यह न केवल उत्पादन बढ़ाने में सहायक है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने और जल संसाधनों के सतत उपयोग में भी योगदान देती है।

प्रजाति समूह

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मत्स्य पालन

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मछली पालन जलीय कृषि का सबसे सामान्य रूप है। इसमें वाणिज्यिक दृष्टिकोण से तालाबों या समुद्री सतह पर मछलियों का पालन किया जाता है। कुछ केंद्र ऐसे भी होते हैं, जो गैरकानूनी ढंग से किसी प्रजाति की संख्या बढ़ाने के लिए युवा मछलियों को प्राकृतिक जलाशयों में छोड़ते हैं, जिनसे बड़ी मात्रा में व्यापर की जाती है। विश्व स्तर पर मछलीयों विभिन्न प्रजाति कार्प, तिलापिया, टूना मछलियों का भारी मात्रा में उत्पादन किया जाता है। यह न केवल लोगों के लिए भोजन का स्रोत है, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी जलीय कृषि का महत्वपूर्ण हिस्सा है।[2][3]

इन्हें भी देखें

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  1. गारनर, ब्रयान ए॰ (2016), गार्नर के आधुनिक अंग्रेज़ी का प्रयोग (चतुर्थ ed.), ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, ISBN 978-0-19-049148-2
  2. वेल्पे जे॰ (2005). डॉलर का फर्जी खेल: बड़े पैमाने पर टूना पालन का प्रलोभन जीव विज्ञान. Vol. 55. pp. 301–302. डीओआई:10.1641/0006-3568(2005)055[0301:DWSTBF]2.0.CO;2. आईएसएसएन 0006-3568.
  3. 2018 में विश्व मत्स्य पालन और जलीय कृषि की संक्षेप स्थिति, (PDF). FAO. 2018.