जनमेजय नागयज्ञ स्थल, हिण्डौन

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जनमेजय का नाग यज्ञ स्थल भारत देश के राजस्थान राज्य में स्थित करौली जिले के सबसे बडे नगर व औद्योगिक नगरी हिण्डौन सिटी से 15 किलोमीटर दूर पूर्व में हिण्डौन तहसील के ग्राम जगर में स्थित जगर नदी के समीप जगर बांध मे स्थित है जिसे आज कुण्डेवा के नाम से जानते है

इतिहास व कथा[संपादित करें]

पौराणिक कथा के अनुसार एक दिन राजा परीक्षित जंगल में शिकार करने गए। जहां जानवरों का पीछा करते-करते परीक्षित काफी थक गए। भूख और प्यास से उन्हें काफी परेशान कर दिया था और राजा परीक्षित अपनी प्यास बुझाने के लिये इधर उधर भटकने लगे। अंततः उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया आश्रम देखकर राजा को यह विश्वास हुआ कि आश्रम में अवश्य ही जलपान उपलब्ध हो सकेगा इसी विश्वास के साथ राजा परीक्षित ने आश्रम में प्रवेश किया। आश्रम के चारों ओर घूम कर देखने के उपरांत भी कोई भी व्यक्ति नहीं दिखाई दिया शिवाय एक ऋषि के जोकि अपने आश्रम पर बैठे आंख मूंदकर साधना में लीन थे। राजा ने ना चाहते हुए भी साधु को अनेकों बार पानी और भोजन के लिए इच्छा प्रकट करते हुए पुकारा किंतु ध्यान में मग्न ऋषि ने राजा के कोई प्रतिउत्तर नहीं दिया। उत्तर ना पाकर राजा अति क्रोधित हुआ और राजा ने पास में पड़े एक म्रत सांप को धनुष्य उठाकर राशि ऋषि के गले में डाल दिया

ऋषि समीक के पुत्र श्रृंगी को जब यह बात पता चली की राजा परीक्षित ने ध्यानावस्थित उनके पिता के गले में मरे सांप को डालकर उनके पिता का घोर अपमान किया है तो वह क्रोधित हो उठे। राजा परीक्षित द्वारा अपने पिता के अपमान से दुखी होकर श्रंगी ऋषि ने राजा को श्राप दिया कि 7 दिन के अंदर नागराज तक्षक अपने विष से परीक्षित को जला देगा।

ऋषि-मुनियों द्वारा नागराज तक्षक द्वारा अपने पिता परीक्षित को भस्म करने का वृतांत को सुनकर परीक्षित के पुत्र जनमेजय बड़े दुखी हो गए और उन्होंने ऋषि मुनियों की सलाह पर नागयज्ञ का निश्चय किया जिसे जनमेजय नागयज्ञ के नाम से जाना गया।

जनमेजय नागयज्ञ हिण्डौन शहर से 15 किलोमीटर दूर पूर्व में ग्राम जगह के पास जगर नदी के समीप संपन्न हुआ जो आज भी कुण्डेवा के नाम से प्रसिद्ध है

वर्तमान स्थिति एवं शिल्पकला[संपादित करें]

जगर बांध

जहाँ जनमेजय नागयज्ञ हुआ उनके विशेष चिन्ह आज वहाँ मौजूद हैं जिस स्थान पर यह यज्ञ हुआ वह काफी लंबाई चौड़ाई के पत्थरों में दीवार बिना चूने की दिखाई देती है पूर्व में यह एक विशाल चबूतरे के आकार कर रहा होगा किंतु अब उसका उपरी भाग ही दिखाई देता है अधिकांश भाग मिट्टी में दवा है अब तो यह स्थान बांध बनने के कारण अधिकांश समय जलमग्न रहता है किंतु बांध का बनने से पूर्व यह पूरा चबूतरा स्पष्ट दिखाई देता था।

यज्ञ वेदी के स्थान पर एक छतरी बनी हुई है छतरी के नीचे एक पत्थर पर आठ सांपों की आकृति उभरी हुई है जो आपस में लिपटे हुए हैं छतरी के समीप एक छत विछत भवन में भगवान शिव की 4 फीट ऊंची 3 प्रतिमाएं स्थित हैं

शिव मन्दिर[संपादित करें]

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यहां स्थल के समीप एक मन्दिर भवन स्थित है मन्दिर में भगवान शिव की 3-4 फीट ऊंची 3 प्रतिमाएं स्थित हैं शिवलिंग सपाट होते है किंतु इन शिवलिंगों की विशेषता है कि तीनों शिवलिंग पर चौखाने उत्कीर्ण है जो कहीं की भी शिवलिंगों पर दिखाई नहीं देते हैं


पूर्व में जगर ग्राम यहीं बसा था किंतु जगर बांध बनने पर गाँव को अन्यत्र में जगह पर बसाया गया। जगर के लोगों से शिवलिंगों के बारे में जो जानकारी प्राप्त हुई वह एक विस्मयकारी है। जब जगर ग्राम दूसरी जगह बसाया गया तो ग्रामीणों ने शिवलिंग की स्थापना भी नई ग्राम में करनी चाही किंतु लोगों का कहना है कि खोदने पर शिव लोगों की गहराई का कोई अंत नहीं मिला। अन्तत हारकर शिवलिगों को उसी स्थान पर छोड़ना पड़ा। ग्रामीण लोग बड़े चाव से इस बात को कहते हैं कि जन्मेजय नागयज्ञ यहीं संपन्न हुआ था। वैशाख में यहां पर एक विशाल मेला भी लगता है

प्रमाण[संपादित करें]

टोडारायसिंह नगरपालिका द्वारा प्रकाशित गजेटियर में भी इस बात का सप्रमाण विवरण है कि टोडारायसिंह नागराज तक्षक की राजधानी है और उनके राज्य की सीमा हिंडौन तक थी अतःजनमेजय नाग यज्ञ तक्षक राज्य की सीमा से बाहर किया गया

पांडवों से जुडी धरोहर[संपादित करें]

पांडवों की कचहरी[संपादित करें]

जन्मेजय का नाग यज्ञ स्थल के स्थान से कुछ ही दूरी पर कोर्टवास गांव बसा है जो ग्राम के तीनों ओर प्रवाहित नदियों के बीच ऊंचे टीले पर एक कमल के फूल के समान स्थित है लोगों की ऐसी मान्यता है कि अज्ञातवास में पांडवों ने यहां पर वास किया था जनश्रुति के आधार पर और लोगों के बात करने पर भी पांडवों के यहां पर रहने की धारणा प्रबल होती है पूर्व में इस स्थान पर पांडव कालीन अवशेष शेष थे किंतु अब केवल एक जर्जर भवन है जिसकी अब ग्रामीणों ने मरम्मत कराई है शेष है जिसके जिसे लोग पांडवों की कचहरी कहते हैं कचहरी में एक पत्थर पर लिखा एक बीजक भी उपलब्ध है किंतु भाषा की कठिनाई पर स्पष्ट अक्षरों से पढ़ने में नहीं आता

पांडवों का महल[संपादित करें]

कोटवास ग्राम के पास ही एक पहाड़ी पर एक विशाल भवन बना हुआ है जिसे पांडवों का महल कहा जाता है किंतु अभी जर्जर हालत में है

दानघाटी[संपादित करें]

यहीं पास ही में दानघाटी नामक एक स्थान है जहां पांडु की धर्मपत्नि(पांडवों की माता) कुन्ती ने ब्राह्मणों को राक्षसों से छुटकारा पाने हेतु अभय दान दिया था वैसे पूर्व में यह हिंडवन था जहां हिडिंवा रहती थी यही पर हिडिंवा और भीम का विवाह संपन्न हुआ था और घटोत्कच का जन्म भी यहीं हुआ था