छत्तीसगढ़ की जातियाँ

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छत्तीसगढ़ मॆं कई जातियां और जनजातियां होतीं हैं। वहां की जातियाँ इस प्रकार से हैं।

छत्तीसगढ राज्य में धनवार(धनुहार)जनजाति बहुतायत में निवास रत है। इस जाति को लोधा एवं बैगा भी कहा जाता है ये लोग प्राय:जंगल,पहाड़ में रहते है और कंदमूल जंगली जानवरों का शिकार करके अपना पेट भरते है। ये लोगों को तो सरकार ने आदिवासी घोसित किया है परंतु आज भी इस जाति पूर्ण रूप से लाभ नहीं मील पा रहा है।

इनके प्रमुख नृत्य-करमा है
इनके प्रमुख देवता-करमकोट देव है
इस जाति में भी अनेकों गोत्र है जैसे-तेलासी,देशराज,पन्देवा,सोनवानी,सोन-सोनवानी,देशवार,सुरुज,रौतिया,धारी रकतबुंद,कोग,पठनाहरदी...ये गोंड नहीं है लेकिन रहन-सहन एक जैसी है इस तरिके से इस जनजाति को प्रकासित करते है लो और गोंड जनजाति से जोड़ते है। जिससे धनवार जनजाति के लोग भी भ्रमित हो जाते है।

गोंड[संपादित करें]

दक्षिण क्षेत्र की प्रमुख जनजाति गोंड है। जनसंख्या की दृष्टि से यह सबसे बड़ा आदिवासी समूह है। ये छत्तीसगढ़ के पूरे अंचल में फैले हुए हैं। पहले महाकौशल में सम्मिलित भूभाग का अधिकांश हिस्सा गोंडवाना कहलाता था। आजादी के पूर्व छत्तीसगढ़ राज्य के अंतर्गत आने वाली 14 रियासतों में 4 रियासत क्रमशः कवर्धा, रायगढ़, सारनगढ एवं शक्ति गोंड रियासत थी। गोंडों ने श्रेष्ठ सौन्दर्यपरक संस्कृति विकसित की है। नृत्य व गायन उनका प्रमुख मनोरंजन है। बस्तर क्षेत्र की गोंड जनजातियां अपने सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण समझी जाती हैं। ये लोग व्यवस्थित रूप से गाँवों में रहते हैं। मुख्य व्यवसाय कृषि कार्य एवं लकड़हारे का कार्य करना है। इनकी कृषि प्रथा डिप्पा कहलाती है। इनमें ईमानदारी बहुत होती है।

बैगा[संपादित करें]

बैगा जनजाति मंडला जिले के चाड़ा के घने जंगलों में निवास करने वाली जनजाति है। इस जनजाति के प्रमुख नृत्यों में बैगानी करमा, दशहरा या बिलमा तथा परधौनी नृत्य है। इसके अलावा विभिन्न अवसरों पर घोड़ा पैठाई, बैगा झरपट तथा रीना और फाग नृत्य भी करते हैं। नृत्यों की विविधता का जहां तक सवाल है तो निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश की बैगा जनजाति जितने नृत्य करती है और उनमें जैसी विविधता है वैसी संभवतः किसी और जनजाति में कठिनाई से मिलेगी। बैगा करधौनी नृत्य विवाह के अवसर पर बारात की अगवानी के समय किया जाता है, इसी अवसर पर लड़के वालों की ओर से आंगन में हाथी बनकर नचाया जाता है, इसमें विवाह के अवसर को समारोहित करने की कलात्मक चेष्टा है। बैगा फाग होली के अवसर पर किया जाता है। इस नृत्य में मुखौटे का प्रयोग भी होता है।

मुरिया[संपादित करें]

बस्तर की मुरिया जनजाति अपने सौन्दर्यबोध, कलात्मक रुझान और कला परम्परा में विविधता के लिए ख्यात है। इस जनजाति के ककसार, मांदरी, गेंड़ी नृत्य अपनी गीतात्मक, अत्यंत कोमल संरचनाओं और सुन्दर कलात्मक विन्यास के लिए प्रख्यात है। मुरिया जनजाति में आओपाटा के रूप में एक आदिम शिकार नृत्य-नाटिका का प्रचल न भी है, जिसमें उल्लेखनीय रूप से नाट्य के आदिम तत्व मौजूद हैं। गेंड़ी नृत्य किया जाता है गीत नहीं गाये जाते। यह अत्यधिक गतिशील नृत्य है। प्रदर्शनकारी नृत्य रूप के दृष्टिकोण से यह मुरिया जनजाति के जातिगत संगठन में युवाओं की गतिविधि के केन्द्र घोटुल का प्रमुख नृत्य है, इसमें स्त्रियां हिस्सा नहीं लेती। ककसार धार्मिक नृत्य-गीत है। नृत्य के समय युवा पुरुष नर्तक अपनी कमर में पीतल अथवा लोहे की घंटियां बांधे रहते है साथ में छतरी और सिर पर आकर्षक सजावट कर वे नृत्य करते है।

हल्बा[संपादित करें]

यह जनजाति रायपुर, दुर्ग तथा बस्तर जिलों में बसी हुई है। बस्तरहा, छत्तीसगढ़ीयां तथा मरेथियां, हल्बाओं की शाखाएँ हैं। मरेथियाँ अर्थात् हल्बाओं की बोली पर मराठी प्रभाव दिखता है। हल्बा कुशल कृषक होते हैं। अधिकांश हल्बा लोग शिक्षित होकर शासन में ऊँचे-ऊँचे पदों पर पहुँच गये हैं, अन्य समाजों के सम्पर्क में आकर इनके रीति-रिवाजों में भी पर्याप्त परिवर्तन हुआ है। कुछ हल्बा कबीर पंथी हो गए हैं।

नगेशिया:---यह जनजाति अम्बिकापुर (उत्तर-पुर्व) के डिपाडीह, लखनपुर, अनुपपुर, राजपुर, प्रतापपुर, सीतापुर क्षेत्र, में बसी हुई है ! नगेशिया जनजाति का मुख्य व्यवसाय कृषि कार्य एवं लकड़हारे का कार्य करना है, यह जनजाति जंगलों में निवास करने वाली जनजाति है।

अन्य जातियाँ[संपादित करें]

 • कोरबा • उराँव • भतरा • कँवर • कमार • माड़िय • मुड़िया • भैना • भारिया • बिंझवार • धनवार • नगेशिया • मंझवार • खैरवार • भुंजिया • पारधी • खरिया • गड़ाबा या गड़वा • महरा,महार,माहरा

कमार दम्पत्ति खेत से लौटते हुए

देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]