सामग्री पर जाएँ

चेम्पकरामन् पिल्लै

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
चेम्पकरामन् पिल्लै
जन्म 15 सितम्बर 1891
तिरुवनन्तपुरम्, त्रावणकोर राज्य, ब्रितानी भारत
(सम्प्रति तिरुवनन्तपुरम् जिला, केरलम्, भारत)
मौत 26 मई 1934(1934-05-26) (उम्र 42 वर्ष)
बर्लिन
उपनाम चम्पक

चेम्पकरामन् पिल्लै (15 सितंबर 1891-26 मई 1934) भारतीय मूल के राजनीतिक कार्यकर्ता और क्रांतिकारी थे।[1][2] उनका जन्म तिरुवनंतपुरम जिले में हुआ था किन्तु युवा अवस्था में ही वे यूरोप चले गए, जहाँ उन्होंने अपना शेष सक्रिय जीवन एक भारतीय राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी के रूप में बिताया।[3]

भारत की स्वतंत्रता से पहले के दिनों में जय हिंद के अभिवादन और नारे के निर्माण का श्रेय चेम्पकरामन् पिल्लै को दिया जाता है।[1][4] भारत में अभी भी इस नारे का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।

उनकी मृत्यु के तुरंत बाद के वर्षों में यूरोप में उनके जीवन के बारे में जानकारी अस्पष्ट थी।[5] हाल के वर्षों में अधिक जानकारी सामने आई है।[1]उनका जीवन एडॉल्फ हिटलर के साथ एक झगड़े सहित कई विवादों में घिर गया था।

उन्होंने 31 जुलाई 1914 को भारतीय राष्ट्रीय स्वैच्छिक कोर (Indian National Voluntary Corps) की शुरुआत की। नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए) शुरू करने के लिए प्रेरित करने में चेम्पकरामन पिल्लै ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।[5]

प्रारंभिक जीवन

[संपादित करें]

चेम्पकरामन का जन्म आधुनिक केरल राज्य में पूर्ववर्ती त्रावणकोर राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम में एक तमिल वेल्लालर परिवार में हुआ था।[6] उनके माता-पिता, चिन्नास्वामी पिल्लै और नागम्मल, नानजीनाड (तब त्रावणकोर, वर्तमान में कन्याकुमारी जिला, तमिलनाडु) के रहने वाले थे।[2] 1908 में 17 साल की उम्र में एक यूरोपीय की मदद से वे भारत छोड़कर यूरोप चले गये।[7]

यूरोप में

[संपादित करें]

चेम्पकरामन ने अक्टूबर 1910 से 1914 तक ईटीएच ज्यूरिख में इंजीनियरिंग में डिप्लोमा प्राप्त किया। प्रथम विश्व युद्ध के शुरू होने के बाद, उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय भारत समर्थक समिति (International Pro-India Committee) की स्थापना की जिसका मुख्यालय ज्यूरिख में था। सितंबर 1914 में स्वयं को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया। उन्होंने 'प्रो इंडिया' नाम से एक पत्रिका भी प्रकाशित की। [7] इसी दौरान जर्मनी में रहने वाले भारतीय प्रवासियों के एक समूह ने बर्लिन में एक भारतीय स्वतंत्रता समिति का गठन किया। इस समूह में वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, भूपेंद्रनाथ दत्त, ए. रमन पिल्लई, तारकनाथ दास, मौलवी बरकतुल्लाह, चंद्रकांत चक्रवर्ती, एम. प्रभाकर, बीरेंद्र सरकार और हेरम्बा लाल गुप्ता शामिल थे।

अक्टूबर 1914 में चेम्पाकरन् बर्लिन चले गए और बर्लिन समिति में शामिल हो गए। इसे यूरोप में सभी भारतीय समर्थक क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए मार्गदर्शक और नियंत्रण संस्थान के रूप में अपनी अंतर्राष्ट्रीय भारत समर्थक समिति के साथ विलय कर दिया। वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय के अलावा, पिल्लै बर्लिन समूह के एकमात्र सदस्य थे जिनको लोग जानते थे। शेष सभी सामान्य छात्र थे जिन्होंने अपने देश की सेवा करने के आह्वान पर इस समिति में शामिल हुए थे।[8] लाला हरदयाल को भी आंदोलन में शामिल होने के लिए राजी किया गया। दोनों ने 'पूर्वी देशों के लिए जर्मन खुफिया ब्यूरो' के साथ सहयोग किया और जर्मन शिविरों, विशेष रूप से हैलबमॉन्डलेगर में भारतीय पीओडब्ल्यू पर निर्देशित जर्मन प्रचार बनाने में मदद की।[9] बर्लिन में, उन्होंने बड़ी संख्या में आये श्रोताओं के सामने ब्रिटिश-विरोधी व्याख्यान दिए, और मेसोपोटामिया, तुर्की और सीरिया में युद्ध के कैदियों और भारतीय निवासियों के बीच एक भारतीय राष्ट्रवादी सेना कोर को बढ़ाने के प्रयासों में बर्लिन-भारत समिति के साथ सहयोग किया।[7] 1916 के मध्य तक, भारतीय समिति के शाखा कार्यालय ज्यूरिख, एम्स्टर्डम और स्टॉकहोम में स्थापित किए गए थे, जिनकी अध्यक्षता क्रमशः दासगुप्त, पिल्लै और चट्टोपाध्याय ने की थी।[10]

चेम्पकरामन पिल्लै ने पूर्वी एशिया में भारतीय क्रांतिकारी गतिविधियों को पुनर्जीवित करने के लिए एक योजना तैयार की। वह निर्वासित इंडोनेशियाई राष्ट्रवादी डॉ. दौस डेक्कर से परिचित थे, जो बराकतुल्ला के अनुरोध पर जनवरी 1915 की शुरुआत में ज्यूरिख से बर्लिन आए थे। पिल्लै ने पहले दौस डेक्कर से हॉलैंड के माध्यम से प्रचार पत्रकों के वितरण की व्यवस्था करने के लिए कहा, फिर जुलाई 1915 में उन्होंने प्रस्ताव दिया कि दौस डेकर भारतीय प्रचार और भारतीय और इंडोनेशियाई राष्ट्रवादियों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के लिए थाईलैंड की यात्रा करें। जर्मन विदेश कार्यालय के वेसेनडॉक के साथ संयुक्त रूप से योजना पर चर्चा करने के बाद, डॉस डेक्कर 8 सितंबर 1915 को रॉटरडैम से संयुक्त राज्य अमेरिका के रास्ते रवाना हुए, जहाँ वे सैन फ्रांसिस्को में रामचंद्र से मिले और फिर टोक्यो और बैंकॉक गए। किन्तु उन्हे हांगकांग में गिरफ्तार कर लिया गया और उनने सब कुछ स्वीकार कर लिया। इस झटके के बाद, इस मिशन की विफलता ने दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय क्रांतिकारी प्रयासों को प्रभावी ढंग से समाप्त कर दिया।[11]

एसएमएस एम्डेन द्वारा ब्रिटिश मद्रास पर बमबारी

[संपादित करें]

22 सितंबर 1914 को, कैप्टन कार्ल वॉन मुलर की कमान में एक जर्मन युद्धपोत, एसएमएस एमडेन, मद्रास के तट के पानी में प्रवेश किया और मद्रास बंदरगाह के पास की अधोसंरचनाओं पर बमबारी की और वापस समुद्र में चला गया। इस अचानक हमले में अंग्रेज चकित रह गए। पिल्लै के परिवार का कहना था कि चेम्पकरामन ने एसएमएस एमडेन में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहते हुए जर्मन हमले का समन्वय किया, हालांकि आधिकारिक विचार ऐसा नहीं है। व्यापक रूप से यह माना जाता है कि चेम्पकरामन पिल्लै और कुछ भारतीय क्रांतिकारियों का मद्रास के एसएमएस एम्डेन बमबारी में हाथ था।[2][1]

युद्ध की गतिविधियाँ

[संपादित करें]

भारतीय स्वतंत्रता समिति अंततः संयुक्त राज्य अमेरिका में ग़दर पार्टी के साथ हिंदू-जर्मन षड्यंत्र में शामिल हो गई। कैसर विल्हेम द्वितीय के नेतृत्व में जर्मन विदेश कार्यालय ने इस समिति की ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों को वित्तपोषित किया। त्रावणकोर के चेम्पकरामन और ए. रामन पिल्लै और जर्मन विश्वविद्यालयों के दोनों छात्रों ने समिति पर एक साथ काम किया। बाद में चेम्पकरामन पिल्लै ने आजाद हिन्द फौज प्रमुख सुभाष चंद्र बोस के साथ गठबंधन किया।

ए. रमन पिल्लई, जो उस समय गोटिंगन विश्वविद्यालय में छात्र थे, को लिखे चेम्पकरामन पिल्लै के कई पत्र रमन पिल्लई के बेटे रॉस्कोटे कृष्ण पिल्लई के पास थे। इन पत्रों में 1914 और 1920 के बीच जर्मनी में चेम्पकरामन पिल्लै के जीवन के कुछ पहलुओं का खुलासा हुआ है। उदाहरण के लिये जुलाई 1914 को उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय सैनिकों को विद्रोह करने और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का आह्वान किया था।

प्रथम विश्वयुद्ध के अन्त होने पर चेम्पकरामन पिल्लै जर्मनी में ही रह गये। वहाँ वे एक कारखाने में तकनीशियन के रूप में कार्य करते रहे। जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने विएना का दौरा किया, तब चेम्पकरामन पिल्लै ने उनसे मुलाकात की और अपने कार्ययोजना के बारे में उन्हें बताया था।

युद्ध के बाद जर्मनी में सक्रियता

[संपादित करें]

1919 में चेम्पकरामन पिल्लै ने भारत की स्वतंत्रता के समर्थन में अपनी राजनीतिक गतिविधियों को जारी रखने के लिए जर्मन-इंडियन लीग का गठन किया।[7] 1924 तक, वह सक्रिय रूप से जर्मन "राष्ट्रवादी पार्टी" का समर्थन कर रहे थे । उन्होंने "भारतीय स्वतंत्रता के अधिकार" और "गांधी आंदोलन" पर लीग ऑफ ऑप्रेस्ड पीपुल्स के तत्वावधान में एक व्याख्यान दिया।[7]

1926 में चेम्पकरामन ने हैदराबाद से प्रकाशित समाचार पत्र नवयुह के संपादक को एक पत्र लिखा। किन्तु अंग्रेज सरकार को इसका पता चल गया। सरकार ने मद्रास सरकार को पत्र लिखकर निर्देश दे दिया गया कि अगर चेम्पकरामन् अपनी राजद्रोही और ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के लिये भारत लौटते हैं तो उससे निपटने के लिए एहतियाती उपाय किए जाएं।[7]

भारत की अस्थायी सरकार के विदेश मंत्री

[संपादित करें]
चेन्नई में चेम्पकरमन् पिल्लै की प्रतिमा

1 दिसंबर 1915 को अफगानिस्तान के काबुल में भारत की अस्थायी सरकार स्थापित की गयी थी। चेम्पकरामन् इस सरकार के विदेश मन्त्री थे। इनके अलावा राजा महेंद्र प्रताप राष्ट्रपति और मौलाना बरकतुल्लाह प्रधानमंत्री थे।

प्रथम महायुद्ध में जर्मनों की हार होने के कारण क्रांतिकारियों की आशाएँ धूमिल हो गयीं। अंग्रेजों ने 1919 में उन्हें अफगानिस्तान से बाहर कर दिया।

इस समय जर्मन अपने उद्देश्यों से प्रेरित होकर भारतीय क्रांतिकारियों की मदद कर रहे थे। हालांकि भारतीयों ने जर्मनों को यह स्पष्ट कर दिया कि वे अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लड़ाई में बराबरी के भागीदार थे, किन्तु क्रांतिकारियों के प्रचार कार्य और सैन्य खुफिया का उपयोग जर्मन अपने उद्देश्यों के लिए करना चाहते थे।[9]

1907 में चेम्पकरामन् पिल्लै ने "जय हिंद" शब्द गढ़ा, जिसे आबिद हसन के सुझाव पर 1940 के दशक में आजाद हिन्द फौज के नारे के रूप में अपनाया गया।[12][13][14][15] भारत की स्वतंत्रता के बाद, यह एक राष्ट्रीय नारे के रूप में उभरा।[16]

विवाह और आगे का जीवन

[संपादित करें]

1931 में चेम्पकरामन् पिल्लै ने लक्ष्मी बाई से विवाह किया जो मणिपुर की रहने वाली थीं। वे उनसे बर्लिन में मिले थे। दुर्भाग्य से उनका वैवाहिक जीवन अधिक समय नहीं रहा। चेम्पकरामन् कुछ दिनों बाद बीमार हो गए। उनके शरीर में धीमे विष के लक्षण थे। चिकित्सा के लिये वे इटली चले गए।

28 मई 1934 को बर्लिन में चेम्पकरामन् की मृत्यु हो गई। 1935 में लक्ष्मीबाई उनकी अस्थियों को भारत लाईं। बाद में उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ कन्याकुमारी में औपचारिक रूप से विसर्जित किया गया।[17] चेम्पकरामन् की अंतिम इच्छा यह थी कि उनकी अस्थियों को नानजीनाड (कन्याकुमारी) में उनके परिवार के पैतृक स्थान पर छिड़का जाए।[2]

सन्दर्भ

[संपादित करें]
  1. 1 2 3 4 Indugopan, G.R. (27 September 2016). "Chempaka Raman Pillai: The freedom fighter who coined 'Jai Hind'". Onmanorama. अभिगमन तिथि: 7 October 2020. उद्धरण त्रुटि: अमान्य <ref> टैग; "OnmanoramaIndugopan20160927" नाम कई बार भिन्न सामग्री के साथ परिभाषित है
  2. 1 2 3 4 Krishnan, Sairam (17 August 2016). "Did a Tamil man from Trivandrum mastermind the bombing of British Madras during World War I?". Scroll.in. अभिगमन तिथि: 7 October 2020. उद्धरण त्रुटि: अमान्य <ref> टैग; "ScrollKrishnan20160817" नाम कई बार भिन्न सामग्री के साथ परिभाषित है
  3. Mathew, K. M.; Mammen, Matthew (2009). Malayala Manorama Yearbook (तमिल भाषा में). Kottayam: Malayala Manorama Co. p. 301. ISBN 978-8-189-00412-5.
  4. Encyclopaedia of South Indian Culture and Heritage. New Bharatiya Book Corporation. 2021. p. 24. ISBN 978-93-5521-768-4. अभिगमन तिथि: 16 December 2024.
  5. 1 2 "Chempaka Raman Pillai: The freedom fighter who coined 'Jai Hind'". उद्धरण त्रुटि: अमान्य <ref> टैग; "onmanorama.com" नाम कई बार भिन्न सामग्री के साथ परिभाषित है
  6. George Abraham Pottamkulam (2020). TAMILNADU: A Journey in Time, Part 1. Notion Press. p. PT145. ISBN 9781649516909.
  7. 1 2 3 4 5 6 Sendurpandian, M. (1999). "Shenbagaraman Pillai – His German Connection and India's Freedom Struggle (1891–1934)". Proceedings of the Indian History Congress. 60: 1169. जेस्टोर 44144227. उद्धरण त्रुटि: अमान्य <ref> टैग; "Sendurpandian1999" नाम कई बार भिन्न सामग्री के साथ परिभाषित है
  8. Bose, Arun Coomer (1971). Indian Revolutionaries Abroad, 1905–1922. Patna: Bharati Bhawan. pp. 92–93.
  9. 1 2 Liebau, Heike (2019). ""Unternehmungen und Aufwiegelungen": Das Berliner Indische Unabhängigkeitskomitee in den Akten des Politischen Archivs des Auswärtigen Amts (1914–1920)". MIDA Archival Reflexicon: 2–4. उद्धरण त्रुटि: अमान्य <ref> टैग; ":0" नाम कई बार भिन्न सामग्री के साथ परिभाषित है
  10. Bose, Arun Coomer (1971). Indian Revolutionaries Abroad, 1905–1922. Patna: Bharati Bhawan. pp. 95–96.
  11. Bose, Arun Coomer (1971). Indian Revolutionaries Abroad, 1905–1922. Patna: Bharati Bhawan. pp. 143–144.
  12. Charles Stephenson (2009). Germany's Asia-Pacific Empire: Colonialism and Naval Policy, 1885-1914. Boydell Press. p. 233. ISBN 978-1-84383-518-9. ...Champakaraman Pillai, a committed anti-imperialist. He is credited with coining the phrase 'Jai Hind' meaning 'Victory for India'...
  13. Saroja Sundararajan (1997). Madras Presidency in pre-Gandhian era: a historical perspective, 1884-1915. Lalitha Publications. p. 535. To Champakaraman Pillai goes the credit of coining the taraka mantra "Jai Hind" in 1907...
  14. Encyclopaedia of South Indian Culture and Heritage. New Bharatiya Book Corporation. 2021. p. 24. ISBN 978-93-5521-768-4. अभिगमन तिथि: 16 December 2024.
  15. Gurbachan Singh Mangat (1986). The Tiger Strikes: An Unwritten Chapter of Netaji's Life History. Gagan Publishers. p. 95.
  16. Sumantra Bose (2018). Secular States, Religious Politics. Cambridge University Press. pp. 49–50. ISBN 978-1-108-47203-6.
  17. Rose, N. Daniel (4 December 2007). "A Forgotten Fighter". The New Indian Express. Chennai. मूल से से 12 March 2017 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 4 September 2018.