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चुम्बकीय विरूपण

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चुम्बकीय विरूपण (Magnetostriction), लौहचुम्बकीय पदार्थों का एक गुण है कि जब उनको किसी चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो उनके आकार (या लम्बाई-चौड़ाई) में परिवर्तन हो जाता है। इस प्रभाव को सबसे पहले १८४२ में अंग्रेज भौतिकशास्त्री जेम्स जूल ने देखा था। वे लोहे के एक नमूने पर परीक्षण कर रहे थे।[1]

चुम्बकीय विरूपण चुम्बकीय क्षेत्र में लागू होता है जबकि वैद्युत विरूपण (इलेट्रस्ट्रिक्सन) विद्युत क्षेत्र में लागू होता है।

चुम्बकीय विरूपण के कारण पारगम्य लौहचुम्बकीय पदार्थों में घर्षण उष्मा के कारण ऊर्जा ह्रास होता है। इसी कारण ट्रांसफार्मरों से धीमी ध्वनि आती है क्योंकि उनमें प्रत्यावर्ती विद्युत धाराओं के कारण प्रत्यावर्ती चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करती हैं।[2]

सन्दर्भ

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  1. Joule, J.P. (1847). "On the Effects of Magnetism upon the Dimensions of Iron and Steel Bars". The London, Edinburgh, and Dublin Philosophical Magazine and Journal of Science. 30, Third Series: 76–87, 225–241. अभिगमन तिथि: 2009-07-19. Joule observed in this paper that he first reported the measurements in a "conversazione" in Manchester, England, in Joule, James (1842). "On a new class of magnetic forces". Annals of Electricity, Magnetism, and Chemistry. 8: 219–224.
  2. Questions & answers on everyday scientific phenomena[usurped]. Sctritonscience.com. Retrieved on 2012-08-11.

बाहरी कड़ियाँ

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