भारत-चीन सम्बन्ध

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भारत (हरा) तथा चीन (केसरिया)
अहमदाबाद में नरेन्द्र मोदी के साथ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, 2014
भारतीय नौसेना ने चीनी व्यवसायिक पोत को दस्युओं से बचाया
विशाखापटनम में संयुक्त अभ्यास के दौरान आईएनएस कोरा तथा पीएलए नेवी शिप वेईफाँग, मई 2014
पोलैण्डबॉल में प्रकाशित भारत चीन संबंधों पर एक कार्टून

भारत-चीन दोनों पड़ोसी एवं विश्व के दो बड़े विकासशील देश हैं। भारत चीन का सबसे बड़ा देश है। दोनों के बीच लम्बी सीमा-रेखा है। इन दोनों में प्रचीन काल से ही सांस्कृतिक तथा आर्थिक सम्बन्ध रहे हैं। भारत से बौद्ध धर्म का प्रचार चीन की भूमि पर हुआ है। चीन के लोगों ने प्राचीन काल से ही बौद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण करने के लिए भारत के विश्वविद्यालयों अर्थात् नालन्दा विश्वविद्यालय एवं तक्षशिला विश्वविद्यालय को चुना था क्योंकि उस समय संसार में अपने तरह के यही दो विश्वविद्यालय शिक्षा के महत्वपूर्ण केन्द्र थे। उस काल में यूरोप के लोग जंगली अवस्था में थे।

यद्यपि १९४६ में चीन के साम्यवादी शासन की स्थापना हुई तदपि दोनों देशों के बीच मैत्री सम्बन्ध बराबर बने रहे। जापानी साम्राज्यवाद के विरूद्ध चीन के संघर्ष के प्रति भारत द्वारा सहानभूति प्रकट की गई एवं पंचशील पर आस्था भी प्रकट की गई। वर्ष 1949 में नये चीन की स्थापना के बाद के अगले वर्ष, भारत ने चीन के साथ राजनयिक सम्बन्ध स्थापित किये। इस तरह भारत, चीन लोक गणराज्य को मान्यता देने वाला प्रथम गैर-समाजवादी देश बना।

वर्ष 1954 के जून माह में चीन, भारत व म्यान्मार द्वारा शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पांच सिद्धान्त यानी पंचशील प्रवर्तित किये गये। पंचशील चीन व भारत द्वारा दुनिया की शांति व सुरक्षा में किया गया एक महत्वपूर्ण योगदान था, और आज तक दोनों देशों की जनता की जबान पर है। देशों के संबंधों को लेकर स्थापित इन सिद्धांतों की मुख्य विषयवस्तु है- एक-दूसरे की प्रभुसत्ता व प्रादेशिक अखण्डता का सम्मान किया जाये, एक-दूसरे पर आक्रमण न किया जाये, एक-दूसरे के अंदरूनी मामलों में दखल न दी जाये और समानता व आपसी लाभ के आधार पर शांतिपूर्ण सहअस्तित्व बरकारार रखा जाये।

परन्तु चीन नें मैत्री सम्बन्धों को ताख पर रख कर १९६२ में भारत पर आक्रमण कर दिया और भारत की बहुत सारी जमीन पर कब्जा करते हुए २१ नवम्बर १९६२ को एकपक्षीय युद्धविराम की घोषणा कर दी। उस समय से दोनों देशों के सम्बन्ध आज-तक सामान्य नहीं हो पाये हैं।

जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने चीन से दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाया, परन्तु भारत को सफलता नहीं मिली, क्योंकि चीन ने १६६५ के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अन्यायपूर्ण ढंग से पाकिस्तान का एकतरफा सर्मथन किया था। २३ सितम्बर १९६५ को भारत-पाकिस्तान युद्धविराम का समझौता हो गया। अतः चीन के सारे मन्सूबों पर पानी फिर गया।

पाकिस्तान ने भारत के शत्रु की हैसियत से चीन को काराकोरम क्षेत्र में बसा दिया एवं पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का २६०० वर्ग मील भू–भाग चीन को सौप दिया। जिससें चीन के साम्यवादी दल के सर्वाधिक शक्तिशाली नेता एवं चीन के राष्ट्रपति जियांग जोमीन ने नवम्बर १९६६ में तीन दिन की भारत यात्रा की थी। यह चीन के राष्ट्रपति द्वारा की गई पहली यात्रा थी। इस यात्रा के दौरान एक एतिहासिक समझौता किया गया, जिसके अर्न्तगत वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर एक दूसरे द्वारा आक्रमण नही करने का वचन दिया गया। दोनों देशों ने अपने सैनिक बल का प्रयोग न करने का एवं हिमालय की झगड़े वाली सीमा पर शान्ति व्यवस्था बनायें रखने का समझौता किया। इस यात्रा के समय ११ सूत्रीय समझौता किया गया। अक्टूबर १६६७ में भारत और चीन के मध्य तेल एवं गैस को प्राप्ति करने की भागीदारी के लिए एक समझौता किया गया था।

70 के दशक के मध्य तक भारत और चीन के सम्बन्ध शीत काल से निकल कर फिर एक बार घनिष्ठ हुए। जनवरी १९८० से चीन ने कुछ नरमी प्रदर्शित की जिसके फलस्वरूप भारत-चीन सम्बन्धों में सुधार की आशा व्यक्त की गई।

सन् १९९८ में दोनों देशों के मध्य पुनः तनाव पैदा हो गया। भारत ने ११ से १३ मई १९९८ के मध्य पाँच परमाणु परीक्षण कर अपने आप को शस्त्र धारक देश घोषित किया था। इसी दौरान भारत के रक्षामन्त्री रहें श्री जार्ज फर्नाण्डीस ने चीन को भारत का सबसे बड़ा शत्रु (एन्मी नम्बर वन) की संज्ञा दे डाली थी जिसने चीन की मानसिकता अचानक परिवर्तित हो गयी। चीन ने अमेरिका एवं अन्य देशों के साथ मिलकर एन०पी०टी० एवं सी०टी०बी०टी० पर हस्ताक्षर करने के लिए भारत को बाध्य करना प्रारम्भ कर दिया। ५ जून १९९८ को चीन के द्वारा दबाव बनाकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा परीक्षण बन्द करने, शस्त्र विकास कार्यक्रम बन्द करने एवं सी०टी०बी०टी० पर तथा एन०पी०टी० पर हस्ताक्षर करने का प्रस्ताव पास करा दिया। जुलाई १९९८ में एशियान रीजनल फोरम की बैठक में विदेश मंत्री जसवंत सिंह एवं चीन के विदेश मंत्री तांग जियाशं के मध्य वार्ता हुई। दोनों ने उच्च सरकारी विचार-विर्मश को जारी रखने का निर्णय लिया। अक्टूबर १९९८ में चीन ने अटल बिहारी वाजपेयी को दलाई लामा के साथ मुलाकात की आलोचना की और इसे 'चीन के विरूद्ध तिब्बत-कार्ड का प्रयोग' कहा। फरवरी १९९६ को भारत ने सम्बन्धों में मिठास लाने की पहल करते हुए एक मंत्रालय-स्तरीय प्रतिनिधि मण्डल वार्षिक विचार विर्मश के लिए भेजा। चीन के रूख को भारतीय मंत्रालय ने अपने हित में नहीं पाया। चीन ने इसे अवश्य सकरात्मक एवं प्रगतिवादी दृष्टिकोण का नाम दिया।

अप्रैल १९९६ में साझे कार्यसमूह की बीजिंग में ११वी बैठक हुई जिसमें दोनों देशों में विकास के नये पहलुओं पर जोरदार चर्चा हुई। एक बार पुनः दोनो देशों के मध्य सम्बन्धों में सुधार के आसार दिखने लगे। जून १६६६ में भारतीय विदेश मंत्री जसवन्त सिहं ने चीन की यात्रा पर वहाँ के नेताओं से उच्चस्तरीय वार्तालाप की दोनो देशों के मध्य परस्पर आर्थिक, सामाजिक एवं सास्कृतिक सहयोग विकसित करने की दिशा में आगे कदम उठाने का निर्णय लिया गया, भारत-चीन के व्यापार को २ बिलियन डॉलर से अधिक बढ़ाने व साझे कार्यसमूह की गतिविधियों में वृद्धि के लिए भी निर्णय लिया गया। कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान को दोषी ठहराते हुए फरवरी २००० में भारत ने चीन की डब्लू टी०ओ० सदस्यता प्राप्त करने के लिए सर्मथन किया था। मार्च २००० में भारत एवं चीन के मध्य वीजिंग में सुरक्षा वार्तालाप का पहला दौर प्रारम्भ हुआ जो सचिव-स्तरीय था। सुरक्षा वार्तालाप दो दिनों तक चला। इस कार्यक्रम में चीन ने भारत को सी०टी०बी०टी० पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा। मई २००० में भारत के राष्ट्रपति के० आर० नारायणन ने चीन की यात्रा कर दोनों देशों के सभी हितकर मुद्दे पर वार्तालाप की भारत व चीन नें द्विपक्षीय आर्थिक एवं व्यापार सम्बन्धों में वृद्धि करने के लिए प्रयास करने की प्रतिबद्धता पकट की, लेकिन सीमा विवाद पर कोई निष्कर्षजन्य बात नहीं हो पायी।

वर्ष 2001 में पूर्व चीनी नेता ली फंग ने भारत की यात्रा की। वर्ष 2002 में पूर्व चीनी प्रधानमंत्री जू रोंग जी ने भारत की यात्रा की। इस के बाद, वर्ष 2003 में भारतीय प्रधानमंत्री वाजपेयी ने चीन की यात्रा की। उन्होंने चीनी प्रधानमंत्री वन चा पाओ के साथ चीन-भारत सम्बन्धों के सिद्धान्त और चतुर्मुखी सहयोग के घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किये। इस घोषणापत्र ने जाहिर किया कि चीन व भारत के द्विपक्षीय सम्बन्ध अपेक्षाकृत परिपक्व काल में प्रवेश कर चुके हैं। इस घोषणापत्र ने अनेक महत्वपूर्ण द्विपक्षीय समस्याओं व क्षेत्रीय समस्याओं पर दोनों के समान रुख भी स्पष्ट किये। इसे भावी द्विपक्षीय सम्बंधों के विकास का निर्देशन करने वाला मील के पत्थर की हैसियत वाला दस्तावेज भी माना गया।

चीन के प्रधानमन्त्री वेन जियाबाओ ने 2005 और 2010 में भारत की यात्रा की। चीनी राष्‍ट्रपति हू जिन्‍ताओ 2006 में भारत आये थे। भारतीय प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने सन 2008 में चीन की यात्रा की। चीन के प्रधानमंत्री ली ख छ्यांग 2013 में भारत आये। इसके अलावा ब्रिक्‍स शिखर बैठक से जुड़ी दो बैठकें भी हुईं : डा. मनमोहन सिंह ने 2011 में सान्‍या, चीन का दौरा किया तथा राष्‍ट्रपति हू जिन्‍ताओ ने 2012 में नई दिल्‍ली का दौरा किया तथा एक यात्रा अक्‍टूबर, 2008 में असेम शिखर बैठक के सिलसिले में बीजिंग की हुई।

उपरोक्त से स्पष्ट है कि भारत एवं चीन के मध्य प्राचीन काल से चली आ रही मैत्री आधुनिक काल में कई अस्थिर दौरों से गुजरती रही है। भारत और चीन का सीमा विवाद आज तक बना हुआ है। हालांकि इधर चीन व भारत के संबंधों में भारी सुधार हुआ है, तो भी दोनों के संबंधों में कुछ अनसुलझी समस्याएं रही हैं। चीन व भारत के बीच सब से बड़ी समस्याएं सीमा विवाद और तिब्बत की हैं। चीन सरकार हमेशा से तिब्बत की समस्या को बड़ा महत्व देती आई है।

इस समय चीन व भारत अपने-अपने शांतिपूर्ण विकास में लगे हैं। 21वीं शताब्दी के चीन व भारत प्रतिद्वंदी हैं और मित्र भी।

मोदी सरकार के बाद भारत-चीन सम्बन्ध[संपादित करें]

2014 में नरेन्द्र मोदी जब भारत के प्रधानमन्त्री बने तो पूरा देश उनमें भारत के लिए कई संभावनाएं देख रहा था। चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध को लेकर भी देश के लोगों को काफी उम्मीद थी। नरेन्द्र मोदी ने शुरुआत में अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंध बेहतर करने की दिशा में काफी प्रयास भी किए। इसी कड़ी में सितम्बर 2014 को चीन के राष्ट्रपति मोदी के निमंत्रण पर अहमदाबाद पहुंचे।

जिस तरह से मोदी ने उनकी आगवानी की, उससे लगा कि दोनों देशों के बीच सम्बन्ध सुधरेगा। इस यात्रा के दौरान कैलाश मानसरोवर यात्रा के नए मार्ग और रेलवे में सहयोग समेत 12 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इसके अलावा दोनों देशों ने क्षेत्रीय मुद्दों और चीन के औद्योगिक पार्क से संबंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। हालांकि उसी दौरान चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के करीब 1000 जवान पहाड़ी से जम्मू कश्मीर के चुमार क्षेत्र में घुस आए थे। भारत ने चीनी राष्ट्रपति के सामने यह मुद्दा उठाया लेकिन अपनी तरफ से वार्ता में कोई खलल नहीं पड़ने दिया।

18 जून साल 2017 को डोकलाम पर सीमा विवाद को लेकर एक बार पिर से दोनों देशों के बीच तनाव शुरू हुआ और यह लगभग 73 दिनों तक चला। ध्यातव्य है कि भारत-भूटान और चीन को मिलाने वाला बिन्दु को भारत में डोकलाम, भूटान में 'डोक ला' और चीन में 'डोकलांक' कहा जाता है। डोकलाम एक पठार है जो भूटान के हा घाटी, भारत के पूर्व सिक्किम जिला, और चीन के यदोंग काउंटी के बीच में है।

डोकलाम विवाद[संपादित करें]

डोकलाम का कुछ हिस्सा सिक्किम में भारतीय सीमा से सटी हुई है, जहां चीन सड़क बनाना चाहता है। भारतीय सेना ने सड़क बनाए जाने का विरोध किया। भारत की चिन्ता यह है कि अगर यह सड़क बनी तो हमारे देश के उत्तर पूर्वी राज्यों को देश से जोड़ने वाली 20 किलोमीटर चौड़ी कड़ी यानी 'मुर्गी की गरदन' जैसे इस इलाके पर चीन की पहुंच बढ़ जाएगी। वहीं चीन ने अपनी सम्प्रभुता की बात दोहराते हुए कहा कि उन्होंने सड़क अपने इलाके में बनाई है। इसके साथ ही उन्होंने भारत भारतीय सेना पर "अतिक्रमण" का आरोप लगाया।

चीन का कहना था कि भारत 1962 में हुई हार को याद रखे। चीन ने भारत को चेतावनी भी दी कि चीन पहले भी अधिक शक्तिशाली था और अब भी है। जिसके बाद भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि चीन समझे की अब समय बदल गया है, यह 2017 है। इस विवाद का असर यह हुआ कि चीन ने भारत से कैलाश के लिए जाने वाले हिंदू तीर्थयात्रियों को मानसरोवर यात्रा पर जाने से रोक दिया। हालांकि बाद में चीन ने हिमाचल प्रदेश के रास्ते 56 हिंदू तीर्थयात्रियों को मनसरोवर यात्रा के लिए आगे जाने की अनुमति दे दी। डोकलाम पर भारत-चीन के बीच लगभग दो महीने तक काफी तनातनी होने के बाद अन्ततः विवाद समाप्त हुआ।

भारत और चीन के बीच व्यापारिक सम्बन्ध[संपादित करें]

चीन और भारत के बीच अरबों डॉलर का व्यापार है। 2008 में चीन भारत का सबसे बड़ा बिज़नेस पार्टनर बन गया था। 2014 में चीन ने भारत में 116 बिलियन डॉलर का निवेश किया जो २०१७ में 160 बिलियन डॉलर हो गया। 2018-19 में भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 88 अरब डॉलर रहा। यह बात महत्वपूर्ण है कि पहली बार भारत, चीन के साथ व्यापार घाटा 10 अरब डॉलर तक कम करने में सफल रहा।

चीन वर्तमान में भारतीय उत्पादों का तीसरी बड़ा निर्यात बाजार है। वहीं चीन से भारत सबसे ज्यादा आयात करता है और भारत, चीन के लिए उभरता हुआ बाज़ार है। चीन से भारत मुख्यतः इलेक्ट्रिक उपकरण, मेकेनिकल सामान, कार्बनिक रसायनों आदि का आयात करता है। वहीं भारत से चीन को मुख्य रूप से, खनिज ईंधन और कपास आदि का निर्यात किया जाता है। भारत में चीनी टेलिकॉम कंपनियाँ 1999 से ही हैं और वे काफी पैसा कमा रही हैं। इनसे भारत को भी लाभ हुआ है। भारत में चीनी मोबाइल का मार्केट भी बहुत बड़ा है। चीन दिल्ली मेट्रो में भी लगा हुआ है। दिल्ली मेट्रो में एसयूजीसी (शंघाई अर्बन ग्रुप कॉर्पोरेशन) नाम की कंपनी काम कर रही है। भारतीय सोलर मार्केट चीनी उत्पाद पर निर्भर है। इसका दो बिलियन डॉलर का व्यापार है। भारत का थर्मल पावर भी चीनियों पर ही निर्भर है। पावर सेक्टर के 70 से 80 फीसदी उत्पाद चीन से आते हैं। दवाओं के लिए कच्चे माल का आयात भी भारत चीन से ही करता है। इस मामले में भी भारत पूरी तरह से चीन पर निर्भर है।

2018-19 में भारत का व्यापार घाटा करीब 52 अरब डॉलर रहा। पिछले कई वर्षों से चीन के साथ लगातार छलांगे लगाकर बढ़ता हुआ व्यापार घाटा भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था। चीन के बाजार तक भारत की अधिक पहुंच और अमेरिका व चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध के कारण पिछले वर्ष भारत से चीन को निर्यात बढ़कर 18 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो वर्ष 2017-18 में 13 अरब डॉलर था। चीन से भारत का आयात भी 76 अरब डॉलर से कम होकर 70 अरब डॉलर रह गया।

27 मई, 2018 को भारत ने चीन के सॉफ्टवेयर बाजार का लाभ उठाने के लिए वहां दूसरे सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) गालियारे की शुरुआत की। आईटी कंपनियों के संगठन नैसकॉम ने कहा कि चीन में दूसरे डिजिटल सहयोगपूर्ण सुयोग प्लाजा की स्थापना से चीन के बाजार में घरेलू आईटी कंपनियों की पहुंच बढ़ गयी।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]