चारण और भाट

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

चारण

उद्भव[संपादित करें]

चारणों का उद्भवन कैसे और कब हुआ, वे इस देश में कैसे फैले और उनका मूल रूप क्या था, आदि प्रश्नों के संबंध में प्रामाणिक सामग्री का अभाव है; परंतु जो कुछ भी सामग्री है, उसके अनुसार विचार करने पर उस संबंध में अनेक तथ्य उपलब्ध होते हैं।

चारणों की उत्पत्ति दैवी कही गई है। ये पहले मृत्युलोक के पुरुष न होकर स्वर्ग के देवताओं में से थे (श्रीमद्भाग्वद्गीता 3.10. 27-28)। सृष्टिनिर्माण के विभिन्न सृजनों से चारण भी एक उत्पाद्य तत्व रहे हैं। भागवत के टीकाकार श्रीधर ने इनका विभाजन विबुधा, पितृ, असुर, गंधर्व, भूत-प्रेत-पिशाच, सिद्धचारण, विद्याधर और किंनर किंपुरुष आदि आठ सृष्टियां के अंतर्गत किया है। ब्रह्मा ने चारणों का कार्य देवताओं की स्तुति करना निर्धारित किया। मत्स्य पुराण (249.35) में चारणों का उल्लेख स्तुतिवाचकों के रूप में है। चारणों ने सुमेर छोड़कर आर्यावर्त के हिमालय प्रदेश को अपना तपक्षेत्र बनाया, इस प्रसंग में उनकी भेंट अनेक देवताओं और महापुरुषां से हुई। इसके कई प्रसंग प्राप्त होते हैं। वाल्मीकि रामायण- (बाल. 17.9, 75.18; अरण्य. 54.10; सुंदर. 55.29; उत्तर. 4.4) महाभारत - (आदिपर्व 1202.1, 126.111; वन 82.5; उद्योग. 123.4.5; भीष्म. 20। 16; द्रोण. 124.10; शांति. 192.7-8) तथा ब्रह्मपुराण-(36.66) में तपस्वी चारणों के प्रसंग मिल जाते हैं। ब्रह्मपुराण का प्रसंग तो स्पष्ट करता है कि चारणों को भूमि पर बसानेवाले महाराज पृथु थे। उन्होंने चारणों को तैलंग देश में स्थापित किया। यहीं से चारण सब जगह फैले। महाभारत के बाद भारत में कई स्थानों पर चारण वंश नष्ट हो गया। केवल राजस्थान, गुजरात, कच्छ तथा मालवे में बच रहे। इस प्रकार महाराज पृथु ने देवता चारणों को "मानुष चारण" बना दिया। यही नहीं जैन धर्म सूत्रग्रंथ (महावीर स्वामी कृत पन्नवणा सूत्र) में मनुष्य चारण का प्रसंग मिलता है। कल्हण ने अपनी राजतरंगिणी में चारण कवियों के हँसने का उल्लेख किया है। (रा. त. 7.1122)।

चारणों का निवास क्षेत्र एवं सामाजिकता[संपादित करें]

इन प्रसंगों द्वारा चारणों की प्राचीनता उनका कार्य स्पष्ट होता है। कर्नल टाड ने लिखा है : इन क्षेत्रों में चारण मान्य जाति के रूप में प्रतिष्ठित हैं। 1901 के जनगणना विवरण में कैप्टन बेनरमेन ने चारणों के लिये लिखा है : चारण बहुत पुरानी जाति मानी जाती है। इसका वर्णन रामायण और महाभारत में है। ये राजपरिवार के कवि हैं। ये अपनी उत्पत्ति देवताओं से होने का दावा करते हैं।

उपर्युक्त उद्धरणों के अनुसार चारण जाति देवता जाति थी, पवित्र थी, जिसको सुमेर से हिमालय पर और हिमालय से भारत में लाने का श्रेय महाराज पृथु को है। यहीं से ये सब राजाओं के यहाँ फैल गए। चारण भारत में पृथु के समय से ही प्रतिष्ठित रहे हैं।

चारणों की आराध्य देवियाँ[संपादित करें]

राजस्थान ही नहीं, समस्त भारत में चारण जाती है ! विशेषत: हिंगलाज माता (सिंध,पाकिस्तान) में है, वे चारणों की सर्वप्रथम आराध्य देवी है! उन्हीं के अनेकों अनेक रूप समय समय पर चारण जाती में अवतरित हुए हैं, जिनमें करणी माता (देशनोक, बीकानेर), तनोट माता (जैसलमेर), तेम्डाराय (बाड़मेर) , भादरिया राय , आवड माता, सुंधा माता (जालोर), , लूँग माता , इन्द्र बाईसा महाराज (खुडद , नागोर), राजल बाईसा, सायर बाई (सीकर) बहुचर माॅ , बिरवडी माॅ ,खोडीयार माॅ , मोगल माॅ , और ऐसे ही सेंकडों देवियों नें शक्ति और माँ दुर्गा के आंशिक और पूर्ण अवतार में जन्म लिए है ! चिरजा और लोक गीतों में , नवरात्रि के दिनों में और सामाजिक कार्यकर्मों में आज भी बड़े उच्छाह के साथ इन देवियों की पूजा की जाती है ! चारणों के घरों में बने पूजाघरों इन्हीं देवियों की प्रतिमायें जरूर मिलती है ! करणी माता चारणों के साथ साथ राजपूत वंश के राठोड कुल की भी कुलदेवी मानी जाती है ! ठीक वेसे ही इन्द्र बाईसा भी राजपूत , बढई , ब्राह्मण जातियों की आराध्य देवी है। मा सोनल (मढड़ा जुनागढ गुजरात) सबसे बडे समाजसुधारक और ऊद्धधारक बने जिन्होने गाँँवो और शहरो मे प्रवास करके कुरितीयाँ एवं कुप्रथाओ को छोडने का आह्वान किया. शिक्षा का प्रचार कियाा आज भी गुजरात या विदेेेश (लंडन अमेरिका ओस्ट्रेलियाा दुुुबई ) मे रहने वाले चारण हर साल पोष सुद बीज को आई मा का जन्मोत्सव दोसो से ज्यादा जगहो पर मनाते है .

==!! चारण मॉ शक्ति उपासक जय मॉ आवड़ करणी!!

चारण जाति पर कटाक्ष करने वाले उनके लिए भाई  चारण की इस पोस्ट को ध्यान पूर्वक पढ़े नीचे विडियो देखे और कुछ विचार जरूर करे चारण कुल मे जन्म लेना मतलब देवी देवताऔ के घर मे जन्म लेना मै धन्य हू कि मैने ऐक चारण कुल मे जन्म पाया और मॉ से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे हर बार चारण कुल मे ही जन्म देवे मॉ आवड़ करणी इन्द्रेश सैंणल सुवा माँ के चरणो मे कोटी कोटी प्रणाम करता हूँ 🚩🚩🙏

चारण शब्द किसी सामान्य बुद्धि वाले व्यक्ति और समाज के लिए जाति का बोध करवाने वाला एक शब्द हो सकता है, जबकि ये सनातन सत्य है कि चारण शब्द की अपनी एक ताकत है। धरती पर जन्म लेने वाले सभी नरो में श्रेष्ठ चारण , साहित्य की विरासत का वह अप्रतिम खजाना है, जो बिना किसी सुरक्षा कवच के इसे निरन्तर सदियो के सहेजता आ रहा है। पीढ़ी दर पीढ़ी , ऐसी साहित्यिक परम्परा जिसमे कभी उतार चढ़ाव नही आया, नवाचार के सभी पैमानों पर हमेसा खरा उतरा हो, यह ताकत सिर्फ चारण में ही हो सकती है।

इस शब्द का बखान करना सायद किसी जिह्वा और किसी भी कलम के दायरे में नही हो सकता। क्योंकि  चारण सदियो पुरानी एक ऐसी थाती है, जिसने खुद की परंपरा को किसी दुसरे के भरोसे जिंदा रखने का विचार नही किया, ये विरासत का संचरण अपने खून के माध्यम से ही किया। अतः यह अक्षुण्ण होने के साथ ही, सही अर्थों में सनातन का आईना है। जिसने चारण को अपनाया वह उस समय मे कालश्रेष्ठ बना। ऐसे अनेको उदाहरण लिखित और अलिखित इतिहास में मिलते है। चारण ने जिसको दुत्कारा वह नीच होकर नारकीय गति को प्राप्त हुआ। ये चारण ही है जिन्होंने अपनी कलम से सत्ता को ललकारा, ये चारण ही है जिन्होंने सत्ता के  होते नैतिक पतन को सन्मार्ग हेतु अग्रसर किया।

कलम की ऐसी धार किसी भी साहित्यिक युग मे नही मिलती , ऐसा कोई विषय नहीं जिसको चारण की कलम ने तराशा न हो। ऐसी कोई साहित्यिक विधा नही जिसको चारण ने लिखा न हो। और तो और छंद जाती में इतने प्रयोगात्मक लेखन हुए की जब छंद चारण की कलम के नीचे आया तो छन्दों की जाती ही बढ़ गयी। वर्णो का ऐसा मेल जो वेणसगाई की नई शब्दावली गढ़ देता है, और इसके तहत जब कोई रचना लिखी जाती है तो वाह जैसे शब्द छोटे लगने लगते है। चारण जब लिखता है तो शब्द उनकी कलम के वश होकर नाचने लगते है।

वैसे तो संसार की ऐसी कोई भाषा शैली नही होगी जिसको चारण की लेखनी ने सम्मान न दिया हो, किन्तु विशेष तौर पर चुना तो वो भी संसार की सबसे क्लिष्ट भाषा(साहित्यिक) शैली डिंगळ को।

डिंगळ में लिखने का जो तरीका चारण के पास है सायद किसी अन्य के पास हो ऐसा दिखाई नही देता। यही कारण है कि इस साहित्यिक शैली का आम भाषा मे नाम ही चारण शैली हो गया।

कहते है सोरठ ,कच्छ, मरु भूमि पर देवताओ ने सबसे ज्यादा अवतार लिए। सत्य है किंतु यह बड़ी ही विशेष बात है कि जितने अवतार आदिशक्ति माँ भगवती के चारण वर्ण में हुए, सायद उतने किसी अन्य विषय मे देखने को नही मिलते।

देवियों की विशेष कृपा चारण कुळ पर है, इसीलिय चारण वर्ण चारो वर्णो से श्रेष्ठ और पूजनीय है।

बिना कर्मकांड के कट्टर शाक्त होने का जैसा उदाहरण चारण ने दिया, वैसा कर्मकांडी शक्ति उपासक भी न दे सके । भगवती की ऐसी पूजा परम्परा जिसमे न कोई तन्त्र न कोई मन्त्र सिर्फ चिरजा गाकर भगवती को रिझाना। वाह, अद्भुत।

हिंगलाज देवी से आवड़, बिरवड, करणी ,राजल, मोगल, सोनल, इन्द्र, सायर देवी की कृपा से अभिभूत ये वर्ण इतना सौभाग्यशाली है कि देवियो की गिनती करना भी सम्भव नही है। इतनी अगाध आस्था देवी में कि अन्य किसी के अस्तित्त्व के भरोसे कुछ कर्म ही न करे ।

शायद इस वर्ण का जितना महत्व क्षत्रिय कुल ने समझा, अन्य समाज समझ ही नही पाए। और जिस जिस समय चारण  जिसके  साथ रहे, वह सत्ता के चरम शिखर तक पहुंचे और उन्हें समय समय प्रत्यक्ष देवी सहायता भी मिलती रही। ऐसे हजारो उदाहरण सामन्य ज्ञान रखने वाले व्यक्तियों से छुपे नही है। राजाओ का राज गया, समय बदल गया है, किन्तु सिर्फ यही ऐसा वर्ण समस्त संसार मे दिखाई देता है, जिसने अपनी परम्परा को बचाकर रखा है। साहित्य की सेवा अनवरत चल रही है, साहित्य में प्रयोग अनवरत हो रहे है, चिरजा गाकर भगवती को रिझाने का वह रिवाज आज भी उस समाज के युवाओ में इतना प्रबल है कि अन्य किसी समाज के युवा में आस्था का ऐसा उदाहरण दिखाई नही देता,शक्ति उपासना का तरीका आज भी नही बदला। यही कारण है कि भगवती हिंगलाज आज भी इनके आंगन में सशरीर चहलकदमी करती है ।

लोग कहते है कि आजकल देवी देवता अवतार नही लेते, विषय केवल आस्था का है। चारण वर्ण ने यह उदाहरण से सबको चकित कर दिया और भगवती ने अपनी असीम कृपा से इनको आज तक अभिभूत कर रखा है, भगवती आज भी चारण वर्ण में विभिन्न स्वरूपों से इस समाज को सन्मार्ग के लिए प्रेरित करती है। 20वी शताब्दी में भगवती इन्द्र कुंवर महाराज का अवतार और आई सोनल का अवतार अविस्मरणीय है। भगवती सुवा बाईसा, लक्ष्मी बाईसा, कंकु माँ, प्रकाश माँ, जान बाई, देवल आई, बेला आई, केलाश बाईसा कितने नाम लिखूं जो आज भी इस समाज के लोगो को अपने आशीर्वचन और साथ से उन्नति के उन तमाम शिखर तक पहुंचा रही है।

अभागा तो वह राजपूत समाज है जो इन भगवती की उपासना और आदेशो को भूल गया है। अपने पुरखों की तलवारो की धार और सिर पर साफे की कलँगी को देखकर मूंछो के ताव देने वाले  राजपूत युवा भूल चुके है की बिना चारण देवियो की सहायता के हमारे पुरखे कुछ नही थे। जो आज भी भगवती के इन स्वरूपों में आस्था रखते है, वह सन्मार्ग हेतु प्रसतुत  होंगे ऐसा मेरा विश्वास है।

भगवती चारण समाज पर ऐसी असीम कृपा बनाये रखे।

श्री हिंगलाज सुथान, आवड़ बणकर आविया,

ममतामयी महान,   चावी 'चारण'जातड़ी ।।

देवीपुत्रो के चरणो Chandan Singh palawat sikar