चाङ्गुनारायण मन्दिर
| चाङ्गुनारायण मन्दिर | |
|---|---|
| धर्म संबंधी जानकारी | |
| सम्बद्धता | हिन्दू धर्म |
| प्रोविंस | बागमती प्रदेश |
| देवता | विष्णु |
| त्यौहार | तीज, प्रबोधिनी एकादशी, नाग पञ्चमी |
| अवस्थिति जानकारी | |
| अवस्थिति | चाङ्गुनारायण |
| ज़िला | भक्तपुर जनपद |
| देश | नेपाल |
| भौगोलिक निर्देशांक | 27°42′58.6″N 85°25′40.4″E / 27.716278°N 85.427889°E |
| वास्तु विवरण | |
| प्रकार | पगोडा |
| निर्माता | हरिदत्त वर्मा |
| मापदंड: | सांस्कृतिक: (iii)(iv)(vi) |
| अभिहीत: | १९७९ (तृतीय सत्र) |
| भाग: | काठमाण्डु उपत्यका |
| सन्दर्भ क्रमांक | १२१bis-००७ |
चाङ्गुनारायण (नेपाली: चाँगुनारायण मन्दिर, अंग्रेज़ी: Changu Narayan Temple) एक प्राचीन हिन्दू एवं बौद्ध मन्दिर है, जो नेपाल के भक्तपुर जनपद की चाङ्गुनारायण नगरपालिका में स्थित डोलगिरि (प्राचीन नाम) नामक पर्वतशिखर पर अवस्थित है। यह मन्दिर ईसा की चतुर्थ शताब्दी (लगभग विक्रम संवत् ४००; शक संवत् ३२५) में निर्मित माना जाता है और नेपाल के प्राचीनतम हिन्दू मन्दिरों में से एक है। यह मन्दिर भगवान् विष्णु को समर्पित है, जो हिन्दू धर्म के त्रिदेवों में एक हैं।[1][2]
स्थान
[संपादित करें]यह मन्दिर नेपाल की राजधानी काठमाण्डु से लगभग ७ मील (१२ सहस्रमान) पूर्व तथा भक्तपुर से कुछ सहस्रमान उत्तर में स्थित है। मन्दिर के समीप मनोहरा नामक नदी प्रवाहित होती है।[3]
इतिहास
[संपादित करें]प्राचीन काल में यह मन्दिर चम्पक वृक्षों के वन से घिरा हुआ था और उसके समीप चाङ्गु नामक एक लघु ग्राम बसा हुआ था।[4] ऐसा कहा जाता है कि कश्मीर के एक राजा ने अपनी पुत्री चम्पक का विवाह भक्तपुर के राजकुमार से किया था, और सम्भवतः उसी के नाम पर इस स्थान का नामकरण ‘चाङ्गु’ हुआ।[5] निम्नलिखित विवरण ‘भाषा वंशावली’ नामक ग्रन्थ से अनूदित है—[6]
डोलगिरि (चाङ्गुनारायण पर्वत का प्राचीन नाम) क्षेत्र में एक विशाल चम्पक वृक्ष था। उसी स्थान पर सुधर्शन नामक एक ब्राह्मण निवास करता था, जो शुद्धाचारी, संयमी किन्तु क्रोधी स्वभाव का था। उसके पास एक कपिला गौ थी, जो कामधेनु के सदृश दिव्य मानी जाती थी। वह ब्राह्मण उसी गौ के दुग्ध से विविध देवताओं को नैवेद्य अर्पित करता था। वह गौ प्रायः उसी चम्पक वृक्ष के नीचे बैठती थी।
एक दिन, उस चम्पक वृक्ष से एक अत्यन्त सुन्दर पुरुष प्रकट हुआ, जिसने उस गौ का दुग्ध पान किया और पुनः वृक्ष में विलीन हो गया। यह घटना प्रतिदिन घटित होने लगी। सात दिनों तक जब ब्राह्मण को अपनी गौ से दुग्ध प्राप्त नहीं हुआ, तब वह अत्यन्त क्रोधित हो उठा और सोचने लगा- “जो भी यह पवित्र नैवेद्य का दुग्ध चुरा रहा है, मैं उसका शिरोच्छेद किये बिना विश्राम नहीं करूँगा।”
अतः वह ब्राह्मण एक दिन छिपकर गौ के पीछे गया और एक गुप्त स्थान से देखने लगा। जब गौ चम्पक वृक्ष के नीचे पहुँची, तब वही पुरुष पुनः प्रकट हुआ और दुग्ध पान करने लगा। यह देखकर ब्राह्मण ने क्रोधावेश में तलवार खींची और उस पुरुष का शिरच्छेद कर दिया।
तत्क्षण वह पुरुष भगवान् विष्णु के रूप में प्रकट हुए, उनके हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म थे, और वे गरुड़ पर आरूढ़ थे, किन्तु उनका मस्तक कट चुका था। यह दृश्य देखकर ब्राह्मण अत्यन्त पश्चात्ताप से भर गया और विलाप करने लगा- “हे प्रभो! मैंने कौन-सा पाप पूर्व जन्म में किया था, जिसके फलस्वरूप यह अनर्थ मेरे हाथों हुआ?”
जब वह ब्राह्मण आत्महत्या करने को उद्यत हुआ, तब भगवान् नारायण प्रकट हुए और बोले- “हे मुनि! भय मत करो। तुम्हें शोक करने की आवश्यकता नहीं है। अपने भय को त्यागो और मुझसे कोई वर माँगो।”
ब्राह्मण ने उत्तर दिया- “हे नारायण! यदि मैंने आपका शिरोच्छेद कर पाप किया है, तो कृपया अपने चक्र से मुझे दण्ड प्रदान करें।”
तब भगवान् नारायण ने कहा- “हे मुनि! सुनो। प्राचीन काल में चन्द्र नामक दैत्य से युद्ध करते समय, उसके प्रिय मित्र सुमति नामक एक ब्राह्मण मेरे अस्त्र से मारा गया था। उसकी प्रबल भक्ति से प्रसन्न होकर उसके गुरु शुक्राचार्य ने मुझे शाप दिया कि भविष्य में सुमति के वंशज के हाथों मेरा मस्तक कटेगा। यह घटना उसी शाप का फल है, और यह कार्य तुम्हारे द्वारा होना नियत था।”
भगवान् नारायण ने आगे कहा- “अतः यह अनिवार्य था। अब मैं इस स्थान पर मस्तकहीन रूप में निवास करूँगा। तुम मेरी यहाँ पूजा करो और मुझे अर्घ्य अर्पित करो।” इतना कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये।
चित्रशाला
[संपादित करें]- मानदेव का स्तम्भ
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Suwal, Rajan; Joshi, Pukar (2021), Structural Vulnerability of Changu Narayan Temple, 17th World Conference in Earthquake Engineering, Sendai, Japan (PDF), अभिगमन तिथि: 2024-11-08
- ↑ ntb.gov.np
- ↑ Riccardi, Theodore (1989), "The Inscription of King Mānadeva at Changu Narayan", Journal of the American Oriental Society, 109 (4): 611–620, डीओआई:10.2307/604086, आईएसएसएन 0003-0279, जेस्टोर 604086, अभिगमन तिथि: 2024-11-08
- ↑ Riccardi, Theodore (1989), "The Inscription of King Mānadeva at Changu Narayan", Journal of the American Oriental Society, 109 (4): 611–620, डीओआई:10.2307/604086, आईएसएसएन 0003-0279, जेस्टोर 604086, अभिगमन तिथि: 2024-11-08
- ↑ Ravi Shakya, Bhasha Vamshavali 1, अभिगमन तिथि: 2024-11-08
- ↑ Ravi Shakya, Bhasha Vamshavali 1, अभिगमन तिथि: 2024-11-08