चमनलाल सप्रू

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प्रोफेसर चमनलाल सप्रू (जन्मः- 22 जनवरी 1935 श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर)) निष्ठावान हिन्दीप्रेमी एवं शिक्षक और कश्मीर के सांस्कृतिक इतिहास के अधिकारी विद्वान, लेखक, पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनके प्रयास से हिन्दी को जम्मू-कश्मीर के कॉलेजों में एक ऐच्छिक विषय के रूप में पढ़ाने की विधिवत व्यवस्था हुई।[1]

आजकल वे कश्मीर सांस्कृतिक संपदा पर अनुसंधान करने के साथ-साथ 'कोशुर समाचार पत्रिका' के अवैतनिक संपादक हैं।

संपादन[संपादित करें]

गद्य-प्रवाह, पद्य-प्रवाह, षटदल, प्रतिनिधि पद्य-प्रवाह, गद्य-विभा, नीलजा, दीनानाथ नादिम अभिनंदन ग्रंथ, काशीनाथ दर रचनावली आदि पुस्तकों का संपादन।

पत्रिकाएँ[संपादित करें]

  • कश्यप (मासिक)।
  • सतीसर (त्रैमासिक)।
  • कोशुर समाचार (मासिक बहुभाषी पत्रिका, हिन्दी खंड)
  • श्रीनगर (कश्मीर) के दो विशेषांकों-प्रेमचंद विशेषांक तथा शेर-ए-कश्मीर विशेषांक।

प्रकाशन[संपादित करें]

  • हिन्दी, अंग्रेजी, कश्मीरी और उर्दू में पन्द्रह पुस्तकें।
  • 'केसर और कमल' तथा 'संतूर के स्वर' पुस्तकों पर राज्य एवं केन्द्र सरकार द्वारा पुरस्कार।
  • श्री हरी भगवान दर्शन (यात्रावृत्त)
  • सर्वभाषा कोश (कश्मीरी खंड), वितस्ता की वाणी।
  • प्रतिनिधि कश्मीरी कहानियां
  • कश्मीरी मुहावरे
  • अभिनव हिन्दी व्याकरण तथा रचना
  • कश्मीरी भाषा प्रवेश
  • विस्थापन की कहानियां
  • संघर्षमय
  • आज और कल

अनुवाद[संपादित करें]

भारतीय कविता (भारतीय ज्ञानपीठ के वार्षिक संग्रहों के कश्मीरी खंड)

सम्मान एवं पुरस्कार[संपादित करें]

हिन्दी में पंद्रह, कश्मीरी में दो, उर्दू में एक, अँग्रेज़ी में एक पुस्तक के रचयिता प्रोफ़ेसर सप्रू को अपनी दो महत्वपूर्ण पुस्तकों 'केसर और कमल' तथा 'संतूर के स्वर' पर केंद्रीय तथा राज्य सरकार की ओर से पुरस्का‍र भी प्राप्त हो चुके हैं। वे उत्तर प्रदेश सरकार के 'सौहार्द्र सम्मान', मैसूर हिंदी प्रचार परिषद के 'स्वर्ण जयंती पुरस्कार' तथा हिंदी अकादमी, दिल्ली के 'साहित्यकार सम्मान' से भी सम्मानित किए जा चुके हैं। हिंदी की अप्रतिम सेवा के लिए उनको 'केंद्रीय हिंदी संस्थान' ने 'गंगाशरण सिंह पुरस्कार' से सम्मानित किया है।[2]

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]