घण्टा

घण्टा (संस्कृत: घण्टा, IAST: ghaṇṭā; तिब्बती: drilbu) एक संस्कृत शब्द है जो हिन्दू धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयुक्त होने वाली पूजा-घण्टी को दर्शाता है। घण्टी का निनाद शुभ माना जाता है। हिन्दू मन्दिरों में प्रायः एक धातु की घण्टी प्रवेश-द्वार पर लटकी होती है, जिसे भक्त मन्दिर में प्रवेश करते समय बजाते हैं, यह दर्शन की तैयारी का एक अनिवार्य अंग है। पूजारी भी पूजन अथवा यज्ञ के समय, दीपार्चन, धूपार्पण, अभिषेक तथा नैवेद्य या पुष्प अर्पण के समय, घण्टी बजाते हैं। कुछ विशेष घण्टियाँ ओम् ध्वनि की दीर्घ तरंग उत्पन्न करने हेतु निर्मित की जाती हैं।[1]
विशेषताएँ
[संपादित करें]घण्टी प्रायः पाँच से सात मूल्यवान धातुओं से निर्मित होती है, जो नवग्रहों से सम्बद्ध मानी जाती हैं, सीसा (शनि), राँगा (बृहस्पति), लोहा (मंगल), ताम्रा (शुक्र), पारा (बुध), चाँदी (चन्द्र) तथा स्वर्ण (सूर्य)। इसके भीतर एक टक्करने वाला भाग (घण्टानादक) जुड़ा होता है, जिससे उच्च स्वर उत्पन्न होता है। घण्टी के शीर्ष पर प्रायः पीतल की मूर्ति होती है, यदि वह शिव-पूजन हेतु हो तो नन्दि की आकृति, यदि विष्णु अथवा उनके अवतार जैसे राम, नरसिंह या कृष्ण की पूजा हेतु हो तो गरुड़, पाञ्चजन्य शङ्ख या सुदर्शन चक्र की आकृति होती है।[2]
प्रयोग
[संपादित करें]हिन्दू धर्म में घण्टियाँ प्रायः मन्दिर के शिखर अथवा गर्भगृह के सम्मुख लटकाई जाती हैं। भक्तजन मन्दिर में प्रवेश करते समय घण्टी बजाते हैं, जिससे वे देवता को अपने आगमन की सूचना देते हैं। घण्टी की ध्वनि शुभ मानी जाती है, यह दिव्यता का स्वागत करती है तथा अपवित्रता का निवारण करती है। यह ध्वनि मन को वर्तमान विचारों से विमुक्त करती है, जिससे मन अधिक ग्रहणशील बनता है। प्रार्थना के समय घण्टी बजाना चित्त की चञ्चलता को नियन्त्रित करने तथा ध्यान को देवता पर केन्द्रित करने में सहायक माना गया है।[3][4][5]
मन्त्र
[संपादित करें]हिन्दू परम्परा में घण्टी बजाते समय निम्न मन्त्र उच्चारित किया जाता है —
आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु रक्षसाम् ।
घण्टारवं करोम्यादौ देवताह्वान लाञ्छनम् ॥
मैं यह घण्टी बजाकर दिव्यता का आह्वान करता हूँ, जिससे पुण्य एवं शुभ शक्तियाँ प्रवेश करें; तथा असुर एवं अपवित्र शक्तियाँ, अन्तः एवं बाह्य दोनों स्तरों पर, दूर हो जाएँ।
योगदृष्टि
[संपादित करें]कुण्डलिनी योग के अनुसार, घण्टी की ध्वनि चक्रों को ऊर्जित करती है तथा शरीर में ऊर्जा के वितरण को संतुलित करती है। मन्त्र में जितने अक्षर होते हैं, उतनी बार घण्टी बजाना उचित माना गया है, अतः घण्टी को ८, १६, २४ या ३२ बार बजाना चाहिए। शिल्पशास्त्रों में उल्लिखित है कि घण्टी पञ्चधातु से निर्मित होनी चाहिए, ताम्र, चाँदी, स्वर्ण, जस्ता तथा अयस्। ये पाँच धातुएँ पञ्चभूतों का प्रतिनिधित्व करती हैं।[6]
प्रतीकात्मकता
[संपादित करें]हिन्दू धर्म में घण्टी का प्रतीकात्मक महत्त्व भी है। घण्टी का वक्राकार शरीर अनन्त का प्रतीक है। इसके भीतर का टक्करने वाला भाग सरस्वती का प्रतीक है, जो ज्ञान एवं विद्या की देवी हैं। घण्टी का हस्तग्रहण भाग प्राणशक्ति का प्रतीक है, जो हनुमान्, गरुड़, नन्दि अथवा सुदर्शन चक्र से सम्बद्ध होता है।[7]
चित्रशाला
[संपादित करें]- एक मन्दिर में लटका हुआ घण्टा
- दक्षिण भारत का हस्तधारित नन्दि-घण्टा, जिसके हस्तग्रहण भाग पर भगवान् नन्दि की आकृति अंकित है
- श्रीविजय शैली का हस्तधारित वज्र-घण्टा जिसमें वज्र हस्तग्रहण भाग के रूप में निर्मित है
सम्बन्धित विषय
[संपादित करें]सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ "Why Do We Ring Bells or Ghanta in Hindu Temples?". TemplePurohit.com. 12 February 2016. अभिगमन तिथि: 22 April 2021.
- ↑ "Why Do We Ring Bells or Ghanta in Hindu Temples?". TemplePurohit.com. 12 February 2016. अभिगमन तिथि: 22 April 2021.
- ↑ "Hindu Scriptures | Vedic lifestyle, Scriptures, Vedas, Upanishads, Smrutis". Hinduscriptures.com. अभिगमन तिथि: 22 April 2021.
- ↑ "Peal of bells". Timesofindia.com, Retrieved on 4 March 2015
- ↑ "Why Do We Ring Bells or Ghanta in Hindu Temples?". TemplePurohit.com. 12 February 2016. अभिगमन तिथि: 22 April 2021.
- ↑ "Why to ring the bell while coming to Temple or starting any pooja?". Vishnushivamandir.org.au, Retrieved on 9 March 2015
- ↑ "Why do Hindus ring the bell in temple". Sanskritimagazine.com, Retrieved on 3 March 2015
आगे पढ़ें
[संपादित करें]- Beck, Guy L. (1993). Sonic Theology: Hinduism and Sacred Sound. University of South Carolina Press. ISBN 978-1611171082.
- Buhnemann, Gudrun (2007). Puja: A Study in Smarta Ritual. E. J. Brill.
- Crossley-Holland, Peter (1976). "The Ritual Music of Tibet". The Tibet Journal. 1 (3–4): 45–54. जेस्टोर 43299823.
- Gonda, Jan (1975). Mantra Interpretation in the Śrauta and Grhya Sutras. Brill.
- Scheidegger, Daniel A. (1988). Tibetan Ritual Music: A General Survey with Special Reference to the Mindroling Tradition. Tibet-Institut. ISBN 978-3720600163.
- Wayman, Alex (1971). The Buddhist Tantras: Light on Indo-Tibetan Esotericism. Routledge.
- Wade, Bonnie C. (1979). Music in India: The Classical Traditions. Prentice-Hall. ISBN 978-0136070283.