इंद्रभूति गौतम

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इंद्रभूति गौतम

इंद्रभूति गौतम (गौतम गणधर) तीर्थंकर महावीर के प्रथम गणधर (मुख्य शिष्य) थे।[1]भगवान महावीर का परिनिर्वाण होने पर गणधर गौतम को केवल ज्ञान हुआ, अतः उन्होंनें संध संचालन का कार्य आर्य सुधर्मा को सौंप दिया। गणधर गौतम घोर तपस्वी और चैदह पूर्वग्रन्थों के ज्ञाता थे। ज्ञातव्य है कि जैन साहित्य का अधिकांश भाग महावीर और गौतम के संवाद के रूप मे ही है। गौतम 12 वर्ष तक जीवन-मुक्त (केवली) अवस्था मे रहकर 92 वर्ष की आयु पूर्ण कर मुक्त हुए थे। दिगम्बर परम्परा के अुनसार भगवान महावीर के निर्वाण के पश्चात 12 वर्ष तक गौतम ने ही संघ का दायित्व संभाला था।

जन्म [संपादित करें]

इनका जन्म मगध राज्य के गोच्चर गाँव में ब्राह्मण वसुभूति और पृथ्वी के घर हुआ था। वह अपने गोत्र 'गौतम' से जाने जाते थे। उनका सामान्य नाम "गौतम स्वामी" था ।

दिगम्बर[संपादित करें]

दिगम्बर परम्परा के अनुसार जब इंद्र ने इंद्रभूति से एक श्लोक का अर्थ पूछा था :

पंचेव अत्थिकाया छज्जीव णिकाया महव्वया पंच।
अट्ठयपवयण-मादा सहेउओ बंध-मोक्खो य॥

जब वह नहीं बता पाए तो इंद्र ने उने उत्तर के लिए भगवान महावीर के समावसरण में जाने को कहा। 

दिगम्बर परम्परा में गौतम गणधर का स्थान बहुत ऊँचा है। उनका नाम भगवान महावीर के तुरंत बाद लिया जाता है -

मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुंदाद्यो, जैन धर्मोऽस्तु मंगलं॥

केवल ज्ञान[संपादित करें]

जिस दिन भगवान महावीर को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी उसी दिन गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।[2] जैन धर्मावलंबियों द्वारा इसी दिन को दिवाली के रूप में मनाया जाता हैं ।

इंद्रभूति गौतम की शंका[संपादित करें]

इंद्रभूति गौतम को आत्मा के विषय में शंका थी ।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. सचित्र श्री कल्पसुत्र. Delhi Padma Prakashan, Agra Shree Diwakar Prakashan,Jaipur Prakrit Bharati Academy. December 2008. पपृ॰ २०६. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788189698478.
  2. Hindī viśvakośa. Nāgarīpracāriṇī Sabhā.
सन्दर्भ त्रुटि: <references> में "Nemi" नाम के साथ परिभाषित <ref> टैग उससे पहले के पाठ में प्रयुक्त नहीं है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]