गोरमघाट

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मगरांचल राज्य के मध्य अरावली क्षेत्र की सुरम्यवादियों में स्थित 'गोरमघाट' आस्था व पर्यटन आकर्षण का संगम स्थल है। यह संगम स्थल यहां पहुंचने वाले हरेक पर्यटकों व आस्थावानों को रोमांच से भर देता है।

आवागमन[संपादित करें]

उदयपुर शहर से करीब 136 किलोमीटर दूर गोरमघाट, रावली टॉडगढ़ अभयारण्य की प्राकृतिक छटा और इसके मध्य जोगमंडी वाटर फॉल देखकर हर कोई रोमांचित हो उठता है। यहां मीटर गेज पर धीमी गति से चलने वाली सात डिब्बों वाली मावली-मारवाड़ ट्रेन ही रोमांच का सफर करवाती है। मानसून शुरू होते ही यह ट्रेन गोरमघाट के रेलवे स्टेशन खामली घाट तक जाती है और इसमें रोमांचक सफर करने वाले पर्यटक ही देखने को मिलते हैं। ब्रिटिश काल के समय का ट्रैक और उस पर से होकर गुजरती मीटर गेज ट्रेन मावली रेलवे स्टेशन से रवाना होकर देवगढ़ क्षेत्र के खामली घाट रेलवे स्टेशन पहुंचती है।

गोरमघाट[संपादित करें]

यहां सन् १९३८ ई. में अंगेज प्रशासन के द्वारा घुमावदार घाटी, पहाड़ों, तेज ढलान व गहरी खाईयों में ८० से ३५० फीट ऊंचे पुल बनाकर रेल्वे लाइन का निर्माण किया गया। मावली मारवाड़ जंक्शन रेल्वे खण्ड के मार्ग में कामलीघाट रेल्वे स्टेशन से १४ किलोमीटर दूर गोरमघाट स्टेशन है। इस गोरमघाट स्टेशन के पीछे स्थित पहाड़ पर गोरक्षनाथ (गौरखनाथ) ऋषि ने तपस्या की, बाद में इनकेे शिष्य गौरम राजा के नाम से इस पहाड़ व स्थान का नामकरण हुआ। यह पहाड़ मगरांचल राज्य में सबसे ऊँचा पहाड़ है, जिसकी ऊँचाई समुद्र तल से ३०७५ फीट है। यह सघन वनों से आच्छादित रमणीय व दर्शनीय है। स्टेशन से दो कि.मी. पहले दर्शनीय स्थल जोगमण्डी है जहां बारिश के दिनों में ८० फीट ऊंचा जलप्रपात पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रहता है। शैव साम्प्रदाय के ऋषि गोरखनाथ के शिष्य आयसजी सुन्दरवन जी ने गोरमघाट पहाड़ पर गोरम मन्दिर का निर्माण आषाढ़ सुदी नवमी सम्वत १८५१ (सन् १७९५ ई.) में करवाया था। इस मन्दिर के निर्माण में उदयपुर महाराणा भीमसिंह व देवगढ़ रावजी गोकुलदास ने भी सहयोग दिया था। गोरम पहाड़ के संम्बध में इस प्रकार कहा जाता है :- मारुहर मेवाड़ बीचे, अनड़ पहाड़ आड़ों। गोरम री गाजा सूनी, जिऊ हार गयो हाड़ो।। गगन हिन्डोला घालिया, गगन गुफा री पोल। हिन्दे निरंजन नाथजी, सूरत नूरत री डोल।। गोरमपहाड़ के १० किलोमीटर दायरे की भूमि ऋषियों, मुनियों व साधु-संतों की तपोभूमि रही है, जिसका कण-कण अपनी पवित्रता व अलौकिकता लिए हुए है। मारवाड़मेवाड़ के मध्य मगरांचल राज्य की यह पवित्रतम स्थली पर्यटन व धार्मिक महत्व की है जहां छोटे-बड़े कई उल्लेखनीय महत्व के स्थान है। इस छोटे से क्षेत्र में इतने चमत्कारिक, दर्शनीय एवं धार्मिक महत्व के स्थान है, यह आश्चर्य व गर्व का विषय ही है।

मुख्य आकर्षण[संपादित करें]

वायड़[संपादित करें]

गोरम पहाड़ की तलहटी में स्थित यह धर्म स्थल बड़े-बड़े पेड़ों से आच्छादित है। ऐसे बड़े व भारी पेड़ अन्यत्र देखे नहीं जाते है। गांव सारण (पाली) से ६ किलोमीटर पूर्व में स्थित इस स्थान पर भैरूजी की छत्री है जहां चैत्र सुदी एकम व आखातीज के बाद पहले रविवार को पूजा कर जोत ली जाती है जिससे वर्षा का शगुन लिया जाता है। यहां वन खण्ड ऋषि की तपोभूमि है। ऐसा माना जाता है कि यह स्थान पुष्करराज से भी ज्यादा पुराना है। यहां महादेव का मंदिर है और पानी की बावड़ी है। इस पर्यटन स्थल तक कच्ची सड़क आती है।

गोरक्षनाथ का मंदिर[संपादित करें]

सुरम्य वादियों में स्थित रेलवे स्टेशन गोरम घाट के पास खड़े मध्य अरावली के सर्वाधिक ऊंचे पहाड़ पर गोरक्षनाथ का मंदिर है जहां गोरम घाट, मण्डावर व वायड़ से जाने की पगडण्डी मार्ग है। यह मार्ग अत्यन्त दुर्गम है।

काजलवास[संपादित करें]

यह तपोस्थली सिरयारी से चार किलोमीटर पूर्व में प्राचीन धार्मिक महत्व का स्थान है। यहां गोमुख से निकल रहे जल को पशु व अन्य रोग में प्रायः प्रयोग में लेते हैं। यहां सिरिया देवी व भक्त प्रहलाद सहित ११ जीवित समाधियां है। इनमें धोरमनाथ व गंगानाथ की समाधियों के साथ यह कथन जुड़ा हुआ है कि ये दोनों समाधियां प्रतिदिन नजदीक आ रही है। जिस दिन दोनों समाधियों का मिलन होगा, उस दिन प्रलय हो जाएगा।

गौखर[संपादित करें]

सिरियारी (पाली) से ६ किलोमीटर पूर्व में गौखर है। कहा जाता है कि किसी समय यहां गाय का खुर जमीन में धस गया। वहां से अविकल जलधारा प्रवाहित हुई वह अटूट चल रही है। यही गोरमजी तपस्या के बाद भगवान शिव एवं माता पार्वती के दर्शन पाकर धन्य हुए थे।

शब्द गुरू निर्मलनाथ की धूणी-पांच मथा पहाड़[संपादित करें]

सिरियारी से ४ किलोमीटर पूर्व में बरजालिया का गुड़ा के पास पांच एक जैसे शिखर वाली पहाड़ियां है। इसकी चट्टानों के नीचे गुफाओं में ऋषि-मुनियों की तपस्थली रही है। यहीं निर्मलनाथ की धूणी भी है।

केरूण्डा[संपादित करें]

गोरम पहाड़ के उत्तर की ओर, मण्डार (भीम) के पास घने जंगलों में स्थित यह चमत्कारिक स्थान है। जहां रामदेव बाबा का मंदिर है तथा चार कुण्ड बने है। यहां आखातीज के एक दिन पहले सैंकड़ों श्रद्धालु पूजा करते हैं। इससे इन कुण्डों में जल फूट पड़ता है। इस जल से रोठ बनाते है। इस पर सूत लपेटकर अग्नि में सेका जाता है पर चमत्कार कि सूत नहीं जलता है और रोटी सिक जाती है। यदि जिस तरफ की रोटी का सूत जल जाता है तो मानते हैं कि उस दिशा में अकाल का संकट रहेगा।

धोरों का बड़[संपादित करें]

घने जंगल में स्थित धोरों का बड़ १००० वर्ष पुराना महत्व रखता है जहां चट्टानर के नीचे से अविकल जलधारा प्रवाहित हो रही है।

आशापुरा माता का मंदिर व बरड़ चौहान राजपूतों का गुरूद्वारा[संपादित करें]

सारण गांव में रावले के पास सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक अनहल एवं अनूपवंशी (चीता-बरड़) चौहान राजपूतों की कुलदेवी माँ आशापुरा का प्राचीन मंदिर है। यहां अनूपवंशी चौहानों (बरड़ वंश) का सुप्रसिद्ध गुरुद्वारा है जो कभी अनहलवंशी चौहानों का भी गुरुद्वारा था। यहां निर्मलावन जी की समाधि व शिव मंदिर है। यह स्थान बहुत चमत्कारिक है।

गुरू गौरक्षनाथजी (गौरमनाथजी) का ऐतिहासिक वृतांत[संपादित करें]

श्री गुरु गौरक्षनाथजी महाराज ने श्री गौरमजी भाखर पर तपस्या की। यहां पर वर्तमान में भव्य विशाल मंदिर बना हुआ है। उनके शिष्य श्री गौरम राजा व श्री धोरमनाथ जी महाराज थे। श्री गौरक्षनाथ जी ने गौरम राजा को उसकी आस्था व सेवा के कारण आशीर्वाद दिया और कुछ मांगने को कहा, तब गौरम राजा ने कहा 'आपका आशीर्वाद व नाम ही चाहिए।' गुरु गौरक्षनाथ ने कहा कि 'यह स्थान आपके नाम पर ही चलेगा।' इसलिए उसी दिन से गौरम राजा के नाम से यह स्थान प्रसिद्ध हुआ। गौरम राजा के साथ तीन अवतार रूपी बहिने थी- (१). श्री पूर्णाकर (पुनागर) माताजी, जो कि पाली जिले में भव्य मंदिर बना हुआ है। (२). श्री भारत राखौड़ा माताजी, जिनका मंदिर भीलवाड़ा जिले में स्थित है। (३). श्री सांड़ माताजी, राजसमंद जिले में मन्दिर स्थित है। ये तीनो मंदिर पहाड़ो पर ही है। श्री धोरमनाथ जी महाराज ने धोरावड़ (जो गौरमघाट मंदिर के नीचे, पहाड़ी की तलहटी में स्थित है) में कई वर्षो तक तपस्या की फिर वहां से आपने 'काजलवास' स्थान पर तपस्या की, जो वर्तमान समय में भी यह स्थान मौजूद हैं। यहां प्रतिवर्ष श्रद्धालु आकर प्रसादी, भजन व हवन इत्यादि करते है। जिस समय आप तपस्या करते थे, उस समय बारह कोस पर धारा नगर नामक शहर था। धोरमनाथ जी ने बारह वर्ष तक तपस्या व योग समाधि धारण की। उनके शिष्य धुन्धल नाथ जी महाराज थे। श्री धोरमनाथ जी ने अपने शिष्य धुन्धल महाराज जी को आदेश दिया कि सत् रूपी भिक्षा लाकर धूणी की सेवा करना। गुरूजी की आज्ञा मानते हुए अलख की आवाज देते हुए धारा नगरी शहर में अपनी अलख जगाई। वहां पर श्रीयादेवी के अलावा कोई भी सती नहीं मिली। श्रीयादेवी (सरिया दे) भगवान की भक्त थी इसलिए महात्माजी का आशीर्वाद लेते हुए सत् रूपी भिक्षा प्रतिदिन झोली में डालती थी। उनके पति ने श्रीयादे को कई यातनाएं दी तो भी श्रीयादे ने अपने नित्य पूजा कार्य व भक्ति को नहीं छोड़ा। महाराज बड़े कष्ट से के साथ धूणी की सेवा करते रहे। बारह वर्ष पूर्ण होने पर गुरू श्री धोरमनाथजी ने अपने शिष्य धुन्धलनाथ को बुलाया और आशीर्वाद देते हुए कहा कि इस नगरी में कोई सती नहीं है क्या ? धुन्धलनाथ जी ने कहा कि 'एक ही सती है और वो है - श्रीयादे माता जो बारह वर्षो तक भिक्षा देती रही। श्री धुन्धलनाथ जी ने माता श्रीयादेवी को कहा कि यह शहर पापियों से भरा हुआ है, यहां कोई भी ईश्वर का भक्त नहीं है, तुम सेवा-भिक्षा देती आ रही हो इसलिए बारह वर्ष पूर्ण होते ही तुम यह शहर छोड़ देना।' बारह वर्ष पश्चात् श्रीयादे वह शहर छोड़ कर सिरीयारी गांव (मारवाड़ जंक्शन) में आ गयी। जहां आज भी श्रीयादे का भव्य मंदिर है और इस गांव का नाम श्रीयादे के नाम से ही सिरीयारी रखा गया है। गुरूजी को बहुत क्रोध पैदा हुआ उन्होंने जेरी नालेर (खप्पर) को शिष्य से मंगाते हुए खप्पर को उल्टा डाल दिया और कहा-।। माया सो मटी, पाटण पाटण सब डटण।। धन सारा खत्म हो गया, पाटण शहर उथल-पुथल हो गया यानि खत्म हो गया) श्री धोरमनाथ जी को गुरू गोरखनाथ जी महाराज ने कहा कि 'बारह साल की तुम्हारी भक्ति को तुमने एक ही पल में चौरासी पाटण उलट-पुलट करने में नष्ट कर दी। केवल एक पाटण ने ही तुम्हें भिक्षा नहीं दी तो तुमने चौरासी पाटण को उलट-पुलट कर दिया। उन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था ? तुम्हें तो केवल एक ही पाटण नष्ट करना चाहिए था।' तब धोरमनाथ ने गुरू के चरणों में पड़कर प्रार्थना की कि मुझे क्षमा करें और बताइये कि मैं इस गलती का क्या प्रायश्चित करूं। गुरू श्री गोरखनाथ जी ने कहा कि 'तुम और तपस्या करो', तब श्री धोरमनाथ जी ने कच्छ-भुज (गुजरात) में स्थित धन्याधर (पहाड़) पर पद्म सिला के ऊपर सौपारी आसन (पैर ऊपर व सिर नीचे) धारण कर २४ वर्षो तक तपस्या की। इस तपस्या के कारण उनके शरीर में ज्वाला चेतन हो गई। अधिक ज्वाला चेतन होने के कारण इन्द्र देवता को भय होने लगा क्यों कि मृत्युलोक में अपने पंच भौतिक शरीर के द्वारा तपस्या करता हुआ स्वंशरीर वैंकुट पुरी को प्राप्त हो जाता है, उसे इन्द्र का सुख भोगाया जाता है, यानि जोगेश्वरी से राजेश्वरी हो जाता है। इसलिए हर समय इन्द्र को भय सताने लगा। श्री धोरमनाथ जी की तपस्या से इन्द्र सिंहासन भी कम्पायमान होने लगा। राजा इन्द्र ने अपनी शक्ति से वार किया, तो भी उनकी समाधि नहीं टूटी। उसके उपरान्त इन्द्र ने भगवान शिव को स्मरण करते हुए कैलाश पुरी को प्रस्थान किया। वहां पहुंचने पर राजा इन्द्र ने सारी बाते बताते हुए कहा कि 'श्री धोरमनाथ जी के तप के कारण मैं सिंहासन पर नहीं बैठ पा रहा हूं।' भगवान शिव ने इन्द्र से कहा कि 'आप श्री धोरमनाथ जी की तपस्या नहीं तोड़ सकते, यह कार्य केवल उनके गुरू श्री गौरक्षनाथ ही कर सकते है।' तब राजा इन्द्र ने भगवान शिव को कहा कि 'श्री गौरक्षनाथ जी भी स्वयं तपस्या में लीन है, मैं उनके पास किस रूप में जाऊ? क्योंकि मैं शिष्य की समाधि नहीं तोड़ सका तो गुरू की कैसे तोड़ पाऊंगा ?' तब भगवान शिव ने कहा कि 'एक ही उपाय है कि जहां गुरू गौरक्षनाथ जी तपस्या कर रहे है उस पहाड़ी के नीचे आप सिंह का और रानीजी गौ का माया रूपी शरीर धारण कर लेना। आप गौ पर वार करना। उस समय गौरक्षनाथ जी महाराज अपनी समाधि तोड़ देगें क्योकि वे गौ रक्षक है। वहां उनके प्रकट होते ही अपना शरीर पुनः राजा रानी का करते हुए उनके चरणों में पड़ जाना।' राजा इन्द्र देवता ने ऐसा ही किया। उन दोनों ने सिंह व गौ का माया रूपी शरीर धारण किया। सिंह ने गौ पर वार किया। उस समय गौ रूपी रानी ने तेज आवाज में चिल्लाना शुरू किया, तब श्री गोरक्षनाथ जी की तपस्या टूटी और उन्होंने वहां से एक भभूत का गोला फेंका (वहां आज भी भभूत की पहाड़ी है) तो भी गौ का चिल्लाना बन्द नहीं हुआ तो श्री गोरक्षनाथजी शरीर रूप में वहां प्रकट हुए। जिस चट्टान पर वो प्रकट हुए वहां आज भी उनके चरणों के निशान मौजूद है। राजा-रानी ने अपना वास्तविक रूप धारण किया, उस समय गौ खुर चट्टान पर लगा और चट्टान से जल निकलना शुरू हो गया। फिर गुरू गौरक्षनाथ जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि राज करो और कहा कि धोरमनाथ को मृत्यु लोक में ही रखूंगा। गुरू गौरक्षनाथ महाराज पवन गुटका के द्वारा पल भर में कच्छ-भुज (धोरमनाथजी के पास जहां वो तपस्या करते थे) गए और वहां अलख की आवाज दी। श्री धोरमनाथ जी ने कहा कि 'मेरे शरीर में अग्नि ज्वाला चेतन है, इस कारण मैं अपने नेत्र नहीं खोल पाऊंगा। अगर आंखे खोल दी तो सभी जीव-जन्तु भस्म हो जायेंगे।' तो गुरू श्री गौरक्षनाथ जी ने कहा कि "एक नेत्र समुन्द्र कि ओर खोल दो और दूसरा मेरे चरणों में खोल दो।" दोनों नेत्र खोलते ही बारह कोस में पानी सूख गया। वहां आज भी सूखा हुआ है। श्री गुरू गौरक्षनाथ जी ने आशीर्वाद दिया कि जिस जगह आपने चौरासी पटण डटण की, वह स्थान काजलवास, पाँच मतो (पांच पहाड़ियों) में आई हुई, उस स्थान पर गुरू-शिष्य दोनों समाधि धारण कर लेवे। श्री धोरमनाथजी यहां समाधि धारण की। यहां दोनों गुरू-शिष्य (श्री धोरमनाथ जी व श्री धुन्धलनाथजी) की समाधि शामिल है। उनकी समाधि पर गौमुख से जलधारा बहती है। पशुओं के उपचार हेतु बहुत दूर-दूर से लोग आकर गौमुख का पानी ले जाकर पशुओं पर छिड़काव करते है जिससे पशुओं का उपचार होता है, यहां कई चमत्कारी ऋषि रहे। यह स्थल ऋषि मुनियों की तपोभूमि काजलियावास आज भी श्रद्धालुओं के लिए तीर्थ-स्थली है, जहां मारवाड़मेवाड़ के हजारों लोग दर्शनार्थ आते है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

https://www.jagran.com/rajasthan/jaipur-gorhamghat-very-exciting-journey-19427788.html https://www.patrika.com/udaipur-news/want-to-go-all-around-gormgat-1077489/ https://web.archive.org/web/20191231101202/https://www.patrika.com/jaipur-news/goram-ghat-come-have-a-look-at-mewar-s-kashmir-4932482/ https://web.archive.org/web/20181107052320/http://www.rajsamanddistrict.com/goram-ghat-train-tour/