गोपालपुरा, माधौगढ़ तहसील

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उरई (जालौन) माधौगढ़ तहसील की गोपालपुरा रियासत का किला स्थापत्य की दृष्टि से बेजोड़ है। आज भी यह किला अपने अतीत के वैभव की याद दिलाता है।

जालौन जिले में कछवाह क्षत्रियों की रामपुरा और गोपालपुरा में 2 रियासतें थीं। 'कछवाहों के इतिहास' पुस्तक के लेखक जगदीश सिंह गहलोत के अनुसार सिंध व पहुज नदी के बीच का भाग कछवाहाघार कहलाता है। कछवाहा अपने को अयोध्या नरेश रामचंद्र के ज्येष्ठ पुत्र कुश के वंशज मानते है। कर्नल टाड ने राजपूतों के इतिहास में लिखा है कि कुश के वंशज होने से इनका नाम पहले कुशवाहा और इसके बाद कछवाहा हो गया। ग्वालियर एवं नरवर के कछवाहा राजाओं के कुछ संस्कृत शिलालेखों में उन्हे कच्छपघात या कच्छपारि लिखा है। जनरल कनिगहम के अनुसार दोनों का अर्थ एक ही है। प्राकृत में कच्छयारि और फिर सामान्य बोल चाल में कछवाहा हो गया। यों किसी प्राचीन लेख में इनको कुशवाहा नहीं लिखा गया। महाभारत के आदि पर्व के श्लोक 71 में नागवंशी कच्छप जाति द्वारा क्षत्रियों से युद्ध का वर्णन मिलता है। नागों का राज्य ग्वालियर के आसपास था, इसकी राजधानी पद्मावती थी जो अब नरवर कहलाती है। ऐसा कहा जाता है कि इन कछवाहों के पूर्वज अयोध्या छोड़ने के बाद रोहतासगढ़ में जा बसे और फिर नरवर चले गये। इतिहासकार देवेंद्र कुमार सिंह के अनुसार संभवत: यहां आकर कच्छपों को युद्ध में हराकर उन्होंने इस क्षेत्र को अपने कब्जे में कर लिया था। इसी कारण यह कच्छयारि, कच्छपघात, कच्छपहा कहलाये जाने लगे। यही शब्द बिगड़कर अब कछवाहा कहलाने लगा है।

बहरहाल कछवाहा वंश की रियासत लहार के राजा रूप पाल सिंह के छोटे पुत्र आलमराव द्वारा 1574 में गोपालपुरा जागीर की स्थापना की गयी थी। अंग्रेजों द्वारा इस रियासत से किसी प्रकार का टैक्स नहीं लिया जाता था। रनपत राव, परशुराम, खड़गराव, चंपतराव, हर¨सह राव, हरवंश राव, त्रिलोक सिंह, जितवार सिंह, लक्ष्मण सिंह, रामचंद्र, लोचन सिंह, सुदर्शन सिंह, उदयवीर सिंह, तथा कृष्णपाल सिंह इस रियासत के प्रमुख राजा थे।

प्रथम स्वाधीनता संग्राम में हालांकि इस रियासत ने अंग्रेजों का साथ दिया था लेकिन इस बात के प्रमाण मिलते है कि महारानी लक्ष्मीबाई ने एक दिन गोपालपुरा में पड़ाव किया था। उस समय गोपालपुरा के राजा अपने किले में मौजूद नहीं थे। रियासत के इतिहास के इस कमजोर पक्ष के बावजूद यहां के किले का कोई सानी नहीं है। भले ही आज किले में किसी के न रहने से इसका रखरखाव नहीं हो पा रहा लेकिन फिर भी इसे देखकर यह कहावत चरितार्थ होती है कि 'खंडहर बताते है कि इमारत कभी बुलंद थी'।