गोंड (लोककला)

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  • "गोंड"शब्द की उत्पत्ति तथा संरचना* :

रसायनशास्त्र में सांकेतिक भाषाका अधिकतर उपयोग किया जाता है। जैसे:-H2O= पाणी,निर,येर अर्थ-Hydrogen का 'H'दो-तत्व Oxygen के 'O'एक तत्व के साथ मिलकर पाणी के कारण निर्माण करते है। उसी प्रकार 'गोंड'शब्द का यौगिक अर्थ है। इस शब्द का विच्छेद करने पर कारक तत्वोंका जो स्वरूप मिलता है,वह इस प्रकार है : गोंड=ग+अ+उ+न+ड,यह पञ्चतत्व ! 'ग'=गगन-आकाश(Open Space), 'अ'=आँधी/तूफानी हवा(Air,Wind), 'उ'=ऊष्मा/तापशक्ति(Energy,Heat), 'न'=नीर/ जल(water,Liquid), 'डी'=डीह/थाना/दाई -माई की धरती माता (Earth,Surface,Solid) संरचना देखिये। ऊपरी तत्व क्रमवार बदलते है। 'ग',खुला आकाश-कोई भी तत्व खुली जगह के बिना रह नहीं सकता ! किसी भी कण के न्यूनतम अंश हो या पृष्टभाग,खुली जगह आवश्यक होती ही है ! 'अ',आँधी -जब तक श्वसन क्रिया सक्रीय है प्राणी का जीवन सक्रीय है !बिना हवा के कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता ! 'उ',सूर्य,चन्द्र के ताप से जो ऊर्जा प्राप्त होती है उससे जीवित प्राणी का जीवन संचालित होता है। वीना ऊष्मा कोई प्राणी जीवित नहीं रह सकता ! उपरोक्त तीनो शक्तियां अदॄश्य,निराकार है और सभी को जीवन प्रेरणा देती रहती है ! 'न',नीर/पाणी-जो हमें धरती के निचे,सतह पर तथा ऊपर बाष्प रूप में सदैव मिलता रहता है। वह तीनो रूप में मिलता है !इसलिए पाणी को जीवन कहते है ! 'डी',स्थान-स्थान,पृथ्वी सर्वव्यापी है,यह ठोस पदार्थ,तत्व गतिमान है। इसके संवाहक उपरोक्त चार तत्व है। गतिमान होने के लिये चारों तत्वोंको लेकर चलता है। अर्थात यह विश्र्व पंच महाभूतोंसे (१.भूमी/पृथ्वी Earth,२.जल/Water,३.अग्नि Fire,४.वायु Air आणि ५.आकाश Ether)निर्मित है,इन तत्वोंके संयुक्तिकरणसे गण्डजीवोंका निर्माण हुआ है और जब विघटन होता है तब जीवतत्वसे जल,अग्नि,वायु और आकाश तत्व प्रकृतिमे विलिन हो जाते है। शेष रहता है केवल पृथ्वी तत्व-माटी जिसे समाधिस्थ कर पृथ्वी/धरतीमे दफण किया जाता है। कोया पूनम में आत्म्याको (Soul)कोई स्थान नही!(जीवातुन तोडी सियाना)." मेरे विचार से इसी आधार को प्रमाण मान कर "कोयावंशियों ' ने बड़ा/फड़ापेन/परसा पेन/सजोर पेन ऐसी कल्पना अपनायी हो ! हमारा 'पुनेम' TRIDENT-Three Fold Path i.e.'मूंदशूल(तीन)सरी(मार्ग) True Path -सत्य का मार्ग पर आधारित है। पूनेमनुसार प्रकृति में सल्ला और गांगरा यह दो पूना ऊना (+/-),परस्पर विरोधी तत्व है,जिनकी आपसी क्रिया प्रक्रियासे प्रकृति का कालचक्र चलित है !इस प्रकृति को किसीने बनाया नहीं ! पंञ्च महातत्वोंके संयुक्तिकरण कर जीव तत्व का निर्माण दाऊ दाई रुपि परसापेन शक्ति करती है ! तात्पर्य-+/- के संयोग बिना जीव तत्वों का निर्माण संभव नहीं है। इसलिए कोयतूर को कोख से पैदा समझते है,


भाषासंपादित करें

गोंडी भाषा गोंडवाना साम्राज्य की मातृभाषा है। गोंडी भाषा अति पाचं भाषा होने के कारण अनेक देशी -विदशी भाषाओं की जननी रही है। गोंडी धर्मं दर्शन के अनुसार गोंडी भाषा का निर्माण आराध्य देव शम्भू शेक के डमरू से हुई है, जिसे गोएन्दाणी वाणी या गोंडवाणी कहा जाता है। अति प्राचीन भाषा होने की वजह से गोंडी भाषा अपने आप में पूरी तरह से पूर्ण है। गोंडी भाषा की अपनी लिपि है, व्याकरण है जिसे समय-समय पर गोंडी साहित्यकारों ने पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित किया है। गोंडवाना साम्राज्य के वंशजो को अपनी भाषा लिपि का ज्ञान होना अति आवश्यक है। भाषा समाज की माँ होती है, इसलिए इसे "मातृभाषा" के रूप में आदर भी दिया जाता है। गोंडियन समाज की अपनी मातृभाषा गोंडी है, जिसे आदर और सम्मान से भविष्यनिधि के रूप में संचय करना चाहिए। गोंडो द्वारा बोली जाने वाली भाषा को गोंडी अथवा पारसी कहा जाता है। एक चीज और गोंड जनजाति में परधान जाति कहते हैं वहाँ वहां प्रधान नेगी जनजाति वहां देव पूजने का कार्य करते हैं और प्रधान नेगी का अब नाम बिगड़ कर परधान हो गया है लेकिन वहां परधान नहीं वहां नेगी है नेगी के बिना आज भी देव पूजन का कार्य गोंडवाना समाज में नहीं होता है।

गोंड कला लोककला का ही एक रूप है। जो गोंड जनजाति की उपशाखा परधान जनजाति के कलाकारों द्वारा चित्रित की जाती है। जिसमें गोंड कथाओं,गीतों एवं कहानियों का चित्रण किया जाता है जो परम्परागत रूप से परधान समुदायों के द्वारा गोंड देवी देवताओं को जगाने और खुश करने हेतु सदियों से गायी जाती चली आ रही हैं। प्रायः परधान लोग गोंड समुदायों के यहाँ कथागायन करने हेतु जाया करते थे। जो उनकी जीविका का साधन था। जब परधानों के कथागायन की परंपरा कम हो गयी तब परधान कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम ने इस गोंड कथागायन की परंपरा को चित्रकला के माध्यम से साकार करना प्रारम्भ किया।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]