गुरू-पूर्णिमा

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भारतीय संस्कृति वैविध्य को धारण किये हुये है; जिस कारण कोई भी एक पर्व या त्यौहार किसी एक धर्म विशेष के साथ-साथ अन्य धर्मों में भी दृष्टिगोचर होता है | यही कारण है कि गुरु पूर्णिमा का जितना महत्व वैदिक संस्कृति मे देखने को मिलता है उतना ही जैन व बौध्द धर्मो मे भी |[1]

एक शिष्य को आशीर्वाद देते गुरुजी

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।[2]

यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है।[3] वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे।[4]

शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है।[5] अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है।

"अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया,चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नमः "

गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। [क] बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

[ख]

जैन धर्म मे गुरु पूर्णिमा[संपादित करें]

जैन धर्म में आज का दिन ''त्रिनोक गुहा पूर्णिमा'' कहलाता है 24 वे तीर्थंकर भगवान महावीर को ही त्रिनोक गुहा यानि प्रथम गुरु भी माना गया है भगवान महावीर ने इसी दिन गांधार राज्य के इंद्र भूति गौतम को अपना पहला शिष्य बनाया था |[6] गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है; इसी दिन जैन साधु-संतो के चौमसे हेतु कलश की स्थापना की जाती है | इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं।

बौध्द् धर्म मे गुरु पूर्णिमा[संपादित करें]

करीब २६०० साल पहले तथागत बुद्ध ने आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन सारनाथ में 5 भिक्षुओं को धर्म का पहला उपदेश दिया | इसे प्रथम धर्म चक्र प्रवर्तन कहते हैं गुरु पूर्णिमा को बौद्ध 'संघ दिवस' कहा जाता है बुद्ध ने उपदेश में चार आर्य सत्यो के बारे में बताया था |[6]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "गुरु पूर्णिमा 2020 - Guru Purnima in Hindi". हिन्दीकीदुनिया.com (अंग्रेज़ी में). 2019-02-23. अभिगमन तिथि 2020-07-14.
  2. "गुरू पूर्णिमा पर विशेष". अमर उजाला. मूल (एएसपी) से 27 सितंबर 2007 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 9 अगस्त 2007.
  3. गुरू पूर्णिमा - Guru Purnima: https://www.bhaktibharat.com/en/festival/guru-purnima
  4. "भक्तिकाल के सन्त घीसादास". सृजनगाथा. मूल (एचटीएम) से 16 मई 2008 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 9 अगस्त 2007.
  5. "गुरू की महिमा" (एचटीएम). वेब दुनिया. मूल से 8 नवंबर 2007 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 9 अगस्त 2007.
  6. "05-07-2020 : Indore ePaper: Read Indore Local Hindi Newspaper Online,Page 1". Dainik Bhaskar. अभिगमन तिथि 2020-07-14.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]