गागरौन दुर्ग
| गागरौन दुर्ग | |
|---|---|
| Part of गागरोन् | |
| राजस्थान, भारत | |
गागरोन दुर्ग का दृश्य | |
| अवस्थिति | |
| Coordinates | 24°37′41″N 76°10′59″E / 24.627937°N 76.182957°E |
| इतिहास | |
| युद्ध | गागरों का युद्ध (१५१९) – राणा सांगा ने मालवा के महमूद खिलजी क्को पराजित किया।[1] |
| Garrison information | |
| Occupants | डोडिया राजपूत, खीची चौहान, भीमकरन महमूद खिलजी, राणा कुंभा, अकबर एवं महाराव भीम सिंह |
| प्रकार: | सांस्कृतिक |
| मापदंड: | ii, iii |
| अभिहीत: | 2013 (36th session) |
| भाग: | राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग |
| सन्दर्भ क्रमांक | 247 |
| देश: | भारत |
| क्षेत्र: | एशिया |
गागरोन का दुर्ग दक्षिण-पूर्वी राजस्थान Archived 2021-06-11 at the वेबैक मशीन के सबसे प्राचीन व विकट दुर्गों में से एक गागरोन दुर्ग हैँ प्रमुख जल दुर्ग है ! जिसे झालावाड़ में आहू और कालीसिंध नदियों के संगम स्थल ‘सामेलजी’ के निकट डोड ( परमार ) राजपूत शासक बिजल देव ने करवाया था इन्हीं के नाम पर इसे डोडगढ़ या धूलरगढ़ कहते थे !
गागरोन दुर्ग भारतीय राज्य राजस्थान के झालावाड़ जिले में स्थित एक दुर्ग है। यह काली सिंध नदी और आहु नदी के संगम पर स्थित है। 21जूूून, 2013 को राजस्थान के 5 दुर्गों को युनेस्को विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया जिसमें से गागरों दुर्ग भी एक है। यह झालावाड़ से उत्तर में 13 किमी की दूरी पर स्थित है। किले के प्रवेश द्वार के निकट ही सूफी संत ख्वाजा हमीनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है।[2] यह दुर्ग दो तरफ से नदी से, एक तरफ से खाई से और एक तरफ से पहाड़ी से घिरा हुआ है। कभी इस किले 92 मंदिर होते थे और सौ साल का पंचांग भी यहीं बना था।
यह तीन ओर से अहू और काली सिंध के पानी से घिरा हुआ है। पानी और जंगलों से सुरक्षित यह किला कुछ ही ऐतिहासिक स्थलों में से एक है जिसमें ‘वन’ और ‘जल’ दुर्ग दोनों हैं। किले के बाहर यात्री सूफी संत मिट्ठे शाह की दरगाह देख सकते हैं। प्रत्येक वर्ष मोहर्रम के अवसर पर यहाँ एक मेला आयोजित किया जाता है। संत पीपा जी का मठ भी, जो संत कबीर के समकालीन के रूप में प्रसिद्ध है, किले के पास स्थित है।
इतिहासकारों के अनुसार, इस दुर्ग को मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर ने अपने हितैषी पृथ्वीराज राठौर को दिया था
तेरहवी शताब्दी में अल्लाउदीन खिलजी ने किले पर चढ़ाई की जिसे राजा जैतसिंह खिंची ने विफल कर दिया था। 1338 ई से 1368 तक राजा प्रताप राव ने गागरों पर राज किया और इसे एक समर्ध रियासत बना दिया। बाद में सन्यासी बनकर वही 'राजा संत पीपा' कहलाए। गुजरात के द्वारका में आज उनके नाम का मठ है।
चौदहवी सदी के मध्य तक गागरों किला एक समर्ध रियासत बन चुका था। इसी कारन मालवा के मुस्लिम घुसपैठिये शासको की नजर इस पर पड़ी। होशंग शाह ने 1423 ईस्वी में तीस हजार की सेना और कई अन्य अमीर राजाओ को साथ मिलाकर गढ़ को घेर लिया और अपने इसे जीत लिया।
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Decisive Battles India Lost pg 57 by Jaywant Joglekar
- ↑ "गागरों किला, झालावाड़". मूल से से 1 दिसंबर 2017 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 20 नवंबर 2017.