गन्ना कारखाना

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गन्ने के एक कारखाने का बाहरी दृष्य
गन्ने के कारखाने के अन्दर का दृष्य
गन्ना पेरने के लिए बना लकड़ी का कोल्हू

भारत एक कृषि प्रधान देश है। गन्ने का मूल स्थान भी भारतवर्ष है। देश में प्राचीन काल से ही गन्ने का इस्तेमाल गुड और राब बनाने में होता आ रहा है। देश में प्रथम प्राचीनतम चीनी मिल की स्थापना सन 1903 में की गई थी। इस चीनी मिल को उत्तर प्रदेश में देवरिया के प्रतापपुर स्थान पर स्थापित किया गया था। लेकिन तब गन्ना को क्रय-विक्रय करने के लिए कोई संस्थापित पद्धति नहीं थी। सन 1920 में ‘इंडियन शुगर कमेटी’ की स्थापना की गई। सन 1931 में चीनी उद्योग को संरक्षण प्रदान किया।

भारत के अलग-अलग राज्यों में गन्ने की खेती की जाती है। भारत में उत्तर प्रदेश गन्ने के उत्पादन में देश में सबसे अग्रणी है। उत्तर प्रदेश में 42 लाख गन्ना किसान हैं। इन सभी किसानों के गन्ने की आपूर्ति प्रदेश की कुल 119 गन्ना मिलो को कराई जाती है। गन्ने से कच्ची चीनी या सफेद चीनी बनाने वाले कारखानों को गन्ना कारखाना कहते हैं। गन्ने को पेरकर उससे रस निकालने वाले यन्त्रों भी 'गन्ना मिल' कहा जाता है।

वर्तमान समय में देश में कुल 732 चीनी मिलें[1] स्थापित हो चुकी हैं। देश में स्थापित कुल 732 चीनी मिलों में से 327 सहकारी चीनी मिलें हैं। जबकि निजी क्षेत्र की चीनी मिलों की संख्या 362 है। इनमें 43 सार्वजानिक मिलें भी शामिल है। इन चीनी मिलों में चीनी उत्पादन की क्षमता लगभग 338 लाख मीट्रिक टन है। इस उत्पादन क्षमता को निजी क्षेत्र और सहकारिता क्षेत्र की यूनिट में सरकारी तौर पर बराबर रूप से विभाजित किया गया है। कुल मिलकर चीनी मिलों की क्षमता 2500 TCD से 5000 TCD ब्रेकेट है। इसमें तेजी से वद्धि हो रही है। अब यह क्षमता 10000 TCD को भी पार करने जा रही है।

देश में दो स्थानों पर आधुनिक शुगर रिफाइनरियां भी स्थापित की गईं हैं। यह रिफाइनरियां गुजरात और पश्‍चिम बंगाल के तटवर्ती क्षेत्रों में स्थापित की गईं हैं। इन रिफाइनरियों में प्रमुख रूप से आयातित कच्‍ची चीनी से रिफाइंड चीनी और घरेलू कच्‍ची चीनी से रिफाइंड चीनी उत्पादन किया जाता है। मिलों को गन्ने की आपूर्ति सहकारी गन्ना विकास समिति और चीनी मिल समिति कराती है। उत्तर प्रदेश में 169 सहकारी गन्ना विकास समिति और 14 चीनी मिल समितियां हैं।

गन्ना किसान समितियों के सदस्य होते हैं, उनके लिए समितियां सट्टा निर्धारित करती है। सट्टे से तात्पर्य है, मिलों को सोंपे जाने वाले गन्ने का निर्धारण। इसके लिए समितियों द्वारा किसानों की भूमि और फसल का आकलन किया जाता है। इसके बाद मिल द्वारा किसानों को गन्ना पर्ची[2] जारी की जाती है। इस गन्ना पर्ची के बाद ही किसान अपना गन्ना मिल को बेच पाते हैं। किसानों से गन्ने को खरीदने के लिए क्रय केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्र पर किसान, गन्ना पर्ची दिखाकर अपना गन्ना बेच सकता है, और फिर गन्ना कारखाने में चीनी बनाइ जाती है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

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