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गणेशशंकर विद्यार्थी

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(गणेशशंकर 'विद्यार्थी' से अनुप्रेषित)
गणेश शंकर विद्यार्थी

1940 के दशक का चित्र
जन्म 26 अक्टूबर 1890
957/493/368 अतरसुइया, निकट दुर्गा पूजा पार्क, प्रयागराज, संयुक्त प्रांत, भारत
मौत 25 मार्च 1931(1931-03-25) (उम्र 40 वर्ष)
कानपुर, संयुक्त प्रांत, भारत
पेशा पत्रकार
कार्यकाल 1890–1931
पदवी संपादक- प्रताप (1913-1931)

गणेश शंकर विद्यार्थी (26 अक्टूबर 1890 - 25 मार्च 1931) एक निडर पत्रकार, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता और स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यकर्ता थे। उन्होंने 'प्रताप' नामक पत्रिका का सम्पादन किया। इस पत्रिका के माध्यम से राजनीतिक मुद्दों को तो उठाया ही, साथ ही उन्होंने समाज को कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों के प्रति जागृत भी किया।

गणेशशंकर विद्यार्थी, आश्विन शुक्ल 14, रविवार सं. 1947 (1890 ई॰) का जन्म अपनी ननिहाल, इलाहाबाद के अतरसुइया मोहल्ले में दुर्गा पूजा पार्क के निकट, श्रीवास्तव वर्मा (कायस्थ) परिवार में हुआ था । माता का नाम गोमतीदेवी था। उनके पिता जयनारायण श्रीवास्तव हथगाँव, जिला फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे किन्तु ग्वालियर रियासत में मुंगावली में आकर बस गये थे। वे यहाँ के ऐंग्लो वर्नाक्युलर स्कूल के हेडमास्टर थे।

गणेशजी जब शैशवावस्था में थे, यही कोई ढाई तीन साल की उम्र रही होगी, तो कुछ दिनों के लिए उन्हें अपनी माँ के साथ सहारनपुर जाकर रहना पड़ा। उनके पिता वहाँ सहायक जेलर थे। शैशवावस्था बीतते-न-बीतते गणेशजी को अपने पिता के पास विदिशा के मुंगावली चले जाना पड़ा जहाँ उनकी प्राथमिक शिक्षा आरम्भ हुई। उनका अधिकांश बचपन साँची और विदिशा के ऐतिहासिक सांस्कृतिक परिवेश में बीता और विदिशा के मुंगावली से ही १९०५ में उन्होंने एंट्रेंस तक की पढ़ाई की। पढ़ाई की शुरूआत उर्दू से हुई। अंग्रेजी और हिन्दी भाषाएँ मिडिल से उनके साथ जुड़ी। 1905 में उन्होंने मिडिल की परीक्षा पहली भाषा अंग्रेजी और दूसरी भाषा हिन्दी लेकर उतीर्ण की।

मिडिल पास करने के बाद पिता ने उन्हें कानपुर अपने बड़े बेटे शिवव्रत नारायण के पास भेज दिया कि कहीं नौकरी लगवा देंगे। लेकिन शिवव्रत पिता की तुलना में कहीं अधिक व्यापक दृष्टि वाले पुरुष थे। आर्य समाज में सक्रिय थे और उन्हीं की प्रेरणा से तत्कालीन प्रमुख पत्र पत्रिकाओं के गणेशजी तब तक नियमित पाठक बन चुके थे। अतः बड़े भाई ने एंट्रेंस की किताबें ख़रीद देकर उन्हें फिर पिता के पास वापस भेज दिया कि प्राइवेट तौर पर तैयारी करो और परीक्षा दो। इस तरह अंग्रेजी, फारसी, इतिहास और गणित विषय लेकर गणेश जी ने द्वितीय श्रेणी में एंट्रेस पास किया। इसके बाद 1907 में इलाहाबाद जाकर कायस्थ पाठशाला में एफ०ए० में अध्ययन के लिये प्रवेश लिया। वस्तुतः यह इलाहाबाद काल ही गणेशशंकर के भावी व्यक्तित्व का निर्णायक दौर बना।

लेखन के बीज तो उनमें शुरू से ही पड़ गये और मिडिल की पढ़ाई के दौरान ही 'हमारी आत्मोत्सर्गता' नामक एक किताब भी लिख डाली थी। यह पुस्तक मिस चार्लोट एम यंग द्वारा लिखित पुस्तक ‘बुक ऑफ गोल्डन डीड्स’ से प्रभावित थी। इसमें उन्होंने उन भारतीय नायकों की कहानियाँ लिखी थी जिन्होंने दूसरों के लिए अपना बलिदान दिया था। दूसरे शब्दों में यह भारतवासियों के आत्मत्याग की ऐतिहासिक कथाओं का संग्रह था। प्रयागराज में अपनी पढ़ाई के साथ उनकी रचनायें पत्र पत्रिकाओं में स्थान बनाने लगीं थीं। स्वराज्य अखबार के जरिये उन्होंने उर्दू में लिखना शुरू किया और भारत में अंग्रेज़ी राज के यशस्वी लेखक एवं पत्रकार पंडित सुन्दरलाल के सान्निध्य से वे हिन्दी की ओर आकृष्ट हुए। गणेश जी सुन्दर लाल जी के साथ उनके हिंदी साप्ताहिक कर्मयोगी के संपादन में सहयोग देने लगे। उनके ही प्रभाव से वे लेखन में अपने नाम आगे परिवार का पारंपरिक उपनाम "श्रीवास्तव" की बजाय "विद्यार्थी" लिखते थे । वे कहते कि अभी मैं विद्यार्थी हूँ इसलिये लिखता हूँ। जब वे सोलह वर्ष के थे तब उनकी रचना "सरस्वती" पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। साहित्य में महावीर प्रसाद द्विवेदीज को और पत्रकारिता में पं सुन्दर लाल को वे अपना आदर्श और गुरु मानते थे। साहित्य एवं पत्रकारिता में यह अंतर्धारा उनके प्रत्येक लेखन में झलकती है। उन्हे पढ़ने और लिखने का शौक बचपन से था इसी शौक ने उन्हें लेखक पत्रकार बनाया।

इसी दौरान पढ़ाई के रास्ते में एक विघ्न आ खड़ा हुआ। आँखें खराब होने की वजह से गणेश को एफ०ए० की पढ़ाई बीच में ही रोककर कानपुर वापस आ जाना पड़ा। १९०८ में कानपुर में उन्होंने करेंसी दफ्तर में 30 रु. मासिक की नौकरी की। लेकिन अध्ययन और लिखना सतत जारी रहा। उनके लेखन में समाज को जाग्रत रहने और स्वयं के सम्मान का ध्यान रखने का आव्हान होता था। लेखन की यह विधा अंग्रेज अधिकारी को पसंद न थी इसलिये विवाद हुआ और वे नौकरी छोड़कर पृथ्वीनाथ हाई स्कूल, कानपुर में अध्यापन करने लगे। इसके पहले उन्होंने एक-के बाद-एक कई नौकरियाँ बदलीं लेकिन कहीं भी ज़्यादा दिन टिक नहीं पाये। राष्ट्रीय भावनाएँ आड़े आती रहीं। शुरू की दो जगहों से तो उन्हें महज इसीलिए इस्तीफा देना पड़ा कि खाली वक्त में वे कर्मयोगी अखबार पढ़ा करते थे। कुछ दिनों होम्योपैथी प्रेक्टिस और ट्यूशन करके भी काम चलाया। पृथ्वीनाथ हाई स्कूल का वातावरण उनके अनुकूल था। पठन-पाठन और लेखन का कार्य तेज चला । इसी अवधि में सरस्वती, कर्मयोगी, स्वराज्य (उर्दू) तथा हितवार्ता (कलकत्ता) में समय-समय पर लेख लिखते रहे।

1911 में वे शिक्षक की नौकरी छोड़कर सरस्वती पत्रिका में सहायक हो गये। महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके संपादक थे। यहाँ वे दो वर्ष रहे। सरस्वती की अपनी सीमा थी कि वह साहित्यिक पत्रिका थी। किन्तु विद्यार्थी जी का झुकाव देश की स्वतंत्रता और राजनीति की तरफ था। "सरस्वती" छोड़कर "अभ्युदय" में सहायक संपादक हुए जहाँ उनका वेतन ४० रुपये मासिक हो गया। यहाँ सितंबर, 1913 तक रहे। दो ही महीने बाद 9 नवम्बर 1913 को कानपुर से स्वयं अपना हिंदी साप्ताहिक प्रताप के नाम से निकाला। यह नाम उन्होंने महाराणा प्रताप के ओज के रूप में माना था। प्रताप निकालने का निर्णय लिया तब उनकी आयु तेइस वर्ष की थी। परिवार की विरासत, अध्ययन और आयु का ओज इनकी त्रिवेणी ने उनका विचार बनाया था कि राष्ट्र का निर्माण महाराणा प्रताप जैसी संघर्ष शीलता और समर्पण से ही संभव है। इसलिये उन्होंने पत्रिका का नाम "प्रताप" रखा। सात वर्ष पश्चात 1920 में प्रताप को दैनिक कर दिया और "प्रभा" नाम की एक साहित्यिक तथा राजनीतिक मासिक पत्रिका भी अपने प्रेस से निकाली। "प्रताप" किसानों और मजदूरों का हिमायती पत्र रहा। उसमें देशी राज्यों की प्रजा के कष्टों पर विशेष सतर्क रहते थे। "चिट्ठी पत्री" स्तंभ "प्रताप" की निजी विशेषता थी। विद्यार्थी जो स्वयं तो बड़े पत्रकार थे ही, उन्होंने कितने ही नवयुवकों को पत्रकार, लेखक और कवि बनने की प्रेरणा तथा ट्रेनिंग दी। ये "प्रताप" में सुरुचि और भाषा की सरलता पर विशेष ध्यान देते थे। फलत: सरल, मुहावरेदार और लचीलापन लिए हुए चुस्त हिंद की एक नई शैली का इन्होंने प्रवर्तन किया। कई उपनामों से भी ये प्रताप तथा अन्य पत्रों में लेख लिखा करते थे।

इसी समय से 'विद्यार्थी' जी का राजनीतिक, सामाजिक और प्रौढ़ साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ। पहले इन्होंने लोकमान्य तिलक को अपना राजनीतिक गुरु माना, किंतु राजनीति में गांधी जी के अवतरण के बाद आप उनके अनन्य भक्त हो गए। श्रीमती एनीं बेसेंट के 'होमरूल' आंदोलन में विद्यार्थी जी ने बहुत लगन से काम किया और कानपुर के मजदूर वर्ग के एक छात्र नेता हो गए। कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने तथा अधिकारियों के अत्याचारों के विरुद्ध निर्भीक होकर "प्रताप" में लेख लिखने के संबंध में ये 5 बार जेल गए और "प्रताप" से कई बार जमानत माँगी गई। कुछ ही वर्षों में वे उत्तर प्रदेश (तब संयुक्त प्रान्त) के चोटी के कांग्रेस नेता हो गए। 1925 ई॰ में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की स्वागत-समिति के प्रधानमंत्री हुए तथा 1930 ई॰ में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हुए। इसी नाते सन् 1930 ई॰ के सत्याग्रह आंदोलन के अपने प्रदेश के सर्वप्रथम "डिक्टेटर" नियुक्त हुए।

अपने जेल जीवन में इन्होंने विक्टर ह्यूगो के दो उपन्यासों, "ला मिजरेबिल्स" तथा "नाइंटी थ्री" का अनुवाद किया। हिंदी साहित्य सम्मलेन के 19 वें (गोरखपुर) अधिवेशन के ये सभापति चुने गए। विद्यार्थी जी बड़े सुधारवादी किंतु साथ ही धर्मपरायण और ईश्वरभक्त थे। वक्ता भी बहुत प्रभावपूर्ण और उच्च कोटि के थे। यह स्वभाव के अत्यंत सरल, किंतु क्रोधी और हठी भी थे।

कानपुर के सांप्रदायिक दंगे में 25 मार्च 1931 ई॰ को इनकी हत्या कर दी गई।

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