गण

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गण यह मूल में वैदिक शब्द था। वहाँ 'गणपति' और 'गणनांगणपति' शब्द प्रयोग में आए हैं। इस शब्द का सीधा अर्थ समूह था। देवगण, ऋषिगण पितृगण-इन समस्त पदों में यही अर्थ अभिप्रेषित है।

वैदिक मान्यता के अनुसार सृष्टि मूल में अव्यक्त स्रोत से प्रवृत्त हुई है। वह एक था, उ koस एक का बहुधा भाव या गण रूप में आना ही विश्व है। सृष्टिरचना के लिए गणतत्व की अनिवार्य आवश्यकता है। नानात्व से ही जगत् बनता है। बहुधा, नाना, गण इन सबका लक्ष्य अर्थ एक ही था। वैदिक सृष्टिविद्या के अनुसार मूलभूत एक प्राण सर्वप्रथम था, वह गणपति कहा गया। उसी से प्राणों के अनेक रूप प्रवृत्त हुए जो ऋषि, पितर, देव कहे गए। ये ही कई प्रकार के गण है। जो मूलभूत गणपति था वही पुराण की भाषा में गणेश कहा जाता है। शुद्ध विज्ञान की परिभाषा में उसे ही समष्टि (युनिवर्सल) कहेंगे। उससे जिन अनेक व्यष्टि भावों का जन्म होता है, उसकी संज्ञा गण है। गणपति या गणेश को महत्ततत्व भी कहते हैं। जो निष्कलरूप से सर्वव्यापक हो वही गणपति है। उसका खंड भाव में आना या पृथक् पृथक् रूप ग्रहण करना गणभाव की सृष्टि है। समष्टि और व्यष्टि दोनों एक दूसरे से अविनाभूत या मिले हुए रहते है। यही संतति संबंध गणेश के सूँड से इंगित होता है। हाथी का मस्तक महत् या महान का प्रतीक है और आंखु या चूहा पार्थित व्यष्टि पदार्थों या केंद्रों का प्रतीक है। वही पुराण की भाषा में गणपति का पशु है। वस्तुत: गणपति तत्व मूलभूत रुद्र का ही रूप है। जिसे महान कहा जाता है उसकी संज्ञा समुद्र भी थी। उसे ही पुराणों ने एकार्णव कहा है। वह सोम का समुद्र था और उसी तत्व के गणभावों का जन्म होता है। सोम का ही वैदिक प्रतीक मधु या अपूप था, उसी का पौराणिक या लोकगत प्रतीक मोदक है जो गणपति को प्रिय कहा जाता है। यही गण और गणपति की मूल कल्पना थी।

गणों के स्वामी गणेश हैं और उनके प्रधान वीरभद्र जो सप्तमातृका मूर्तियों की पंक्ति के अंत में दंड धारण कर खड़े होते हैं। शिव के अनंत गण हैं जिनके वामन तथा विचित्र स्वरूपों का गुप्तकालीन कला में पर्याप्त आकलन हुआ है। खोह (म. प्र.) से प्राप्त और इलाहाबाद के संग्रहालय में सुरक्षित स्थूल वामन गणों की अपरिमित संख्या है। विकृत रूपधारीगण पट्टिकाओं पर उत्खचित हैं। परंपराया शिव की बारात में इन अप्राकृतिक रूपधारी गणों का विशेष महत्व माना जाता है।. मंदिर शिवगण शिव गणो से संबंधित है अद्भुत एक प्राचीन शिव गुणों की मूर्ति नागों की मूर्ति भगवान शंकर की इस मंदिर में विद्यमान है मंदिर पूर्ण रूप से भगवान शिव शिव शिव गुरु को समर्पित आसपास के क्षेत्र में यह मंदिर शिव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है यहां पर शिव गणों की भूतों की लगभग 51 मूर्तियां स्थापित है मंदिर के प्रांगण के अंदर 151 नर्वदेश्वर शिवलिंग स्थापित है अरुणाचलम लिंग स्थान क्षेत्र भगवान गण की चित्र को लिए हुए नर्वदेश्वर शिवलिंग मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित है जिसमें प्राकृतिक रूप से भगवान गणेश जी का चित्र शिवलिंग के मध्य में विद्यमान है और दूसरी और आत्म लिंग का चिन्ह शिवलिंग केंद्र स्थापित है यह मंदिर आसपास के क्षेत्र में बहुत ही श्रद्धा का केंद्र है और महाशिवरात्रि के दिन हजारों की संख्या में लगभग आठ 10,000 आदमी यहां पर एकत्रित होते हैं और इतने व्यक्तियों का भंडारे की व्यवस्था यहां पर की जाती है मिलेगा तो रुपया लिए होती है और भगवान शिव और शिव से संबंधित नागौर से संबंधित भगवान शिव का मंदिर यहां पर स्थापित हैब। मंदिर शिव गण छावनी शिव मंदिर नारा नारी रोड गांव नाहरी नजदीक लामपुर बॉर्डर नरेला जिला सोनीपत मुख्य मार्ग पर स्थापितक प्रथम शिवगण मूर्ति गणेश स्थान देव सेनापति वीरभद्र भैरव मणिभद्र चंद सी नंदी श्रृंगी धर गिल्टी सेल गोकर्ण घंटाकरण जय विजय शत्रु मर्दन वीर युद्ध पति गुहार पर ब्रह्मराक्षस संस्कृति कुबेर नलकूप एवं पुष्प कमल दंत कीर्ति भद्रकाली रुद्र का लगनी क्षेत्रपाल चंद हिसार देते नाग नागिनी नागिनी नागिनी प्रथम सूची मुगलों की मूर्ति शिवगढ़ छावनी में स्थापित है हरियाणा जिला सोनीपत गांव नाहरी नजदीक नरेला लमपुर बॉर्डर दिल्ली।

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