गंगाबाई (कवि )

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गंगाबाई (कवि ) बल्लभ सम्प्रदाय की कवियों में गंगाबाई का स्थान प्रमुख है।[1]

जीवन परिचय[संपादित करें]

गंगाबाई का जन्म वि ० सं ० १६२८ में मथुरा के पास महावन नामक स्थान में हुआ था। गंगाबाई जाति से क्षत्राणी थीं।दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता में भी गंगाबाई क्षत्राणी का उल्लेख किया गया है। गंगाबाई गोस्वामी विट्ठलनाथ की शिष्या थीं। अतः अपने कीर्तन-पदों में इन्होंने अपने नाम के स्थान पर श्री विठ्ठल गिरिधरन शब्द को प्रयुक्त किया है किया है। 'दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता ' में दी गई इनकी वार्ता से पता चलता है कि वि ० सं ० १७३६ में श्रीनाथ जी ने अपनी लीला में सदेह अंगीकार कर लिया।[1]

रचनाएँ[संपादित करें]

गंगाबाई के कुछ पद 'श्री विट्ठल गिरधरन लाल ' [2] नाम पुष्टि-मार्ग के वर्षोत्सव ग्रंथों में संकलित हैं। नमें जन्म से लेकर कृष्ण की विभिन्न लीलाओं का वर्णन किया गया है। महिला होने कारण इनका मधुर-लीलाओं का वर्णन अत्यधिक मर्यादित है।

माधुर्य भक्ति का वर्णन[संपादित करें]

गंगाबाई के आराध्य कृष्ण हैं। कृष्ण के स्वरुप की विशेष चर्चा इनके पदों में नहीं मिलती। केवल इतना पता चलता है कि श्रीकृष्ण सुन्दर हैं और रसिक हैं। गोपियाँ इनकी रूप माधुरी से मुग्ध हो उनकी प्राप्ति के लिए व्रत-उपवास आदि का आचरण करती हैं। गोपियों के पूर्वानुराग के वर्णन में भी कृष्ण की सुंदरता का वर्णन करने की अपेक्षा उसके प्रभाव की ओर विशेष ध्यान दिया गया है:-

सखी अब मो पै रह्यो न जाय।
चलि री मिल उन ही पैं जैये जहाँ चरावत गाय।।
अंग अंग की सब सुधि भूली देखत नंद किशोर।
मेरो मन हर लियो तब ही को जब चितयें यह ओर।[1]

किन्तु कुछ पदों में हास - परिहास की झलक अवश्य मिल जाती है:-

जीती हो चन्द्रावली नारि।
जीती हैं व्रजमंगलराधे जीती सुंदरि गोपकुमारि।।
हारे हैं ब्रजराज लड़ैते रहे हैं सबके वदन निहारी।
पकरो पाय कह्यो करो मेरो कह रही जिय माँझ विचारी।
पहेरो हार इनैं पेहेरायो करो कुँवर आपन मन भाये।
श्री विठ्ठलगिरिधर सबही की गहि गहि भुजा हिये सों लाये।।

कृष्ण की मधुर लीलाओं में केवल संयोग पक्ष की रास,झूलन ,होरी,द्युत-क्रीड़ा आदि लीलाओं का वर्णन गंगाबाई ने अपने पदों किया है। सुरत के प्रसंग को रूपात्मक शैली में इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि वह स्पष्ट रूप से रति का वर्णन नहीं प्रतीत होता :-

झूलो तो सुरत हिंडोरे झुलाऊँ।
मरुवे मयार करौं हित चित के तन मन खंभ बनाऊँ।।
सुधि पटली बुद्धि डाँडी बेलन नेह बिछौना बिछाऊँ।
अति औसेर `धरोँ रूचि कलशा प्रीति ध्वजा फेहराऊँ।।
गरजन कोहोक किलक मिलवे की की प्रेम नीर बरषाऊँ।
श्री विठ्ठलगिरिधरन झुलाऊँ जो इकेले करि पाऊँ।। [1]

बाह्य स्रोत[संपादित करें]

  • ब्रजभाषा के कृष्ण-काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७

सन्दर्भ[संपादित करें]