खेरवार आंदोलन

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खरवार आंदोलन भारतीय राज्य झारखण्ड में भागीरथ मांझी के नेतृत्व में 1871 में आरम्भ हुआ आंदोलन था।

1855 ईसवी में संथाल जाति के लोगों ने जो विद्रोह किया था उसके कारण ब्रिटिश सरकार ने कुछ ऐसे कदम उठाए थे जिससे इस जाति के लोगों को कुछ राहत मिल थी। लेकिन 1858 ईसवी में भारतीय प्रशासन को अपने हाथों में लेने के पश्चात सरकार ने फिर से अपनी शोषण और अत्याचार की नीति को आरंभ किया। 1855 ईसवी के संथाल विद्रोह के पश्चात जो जमींदार, महाजन, साहूकार इत्यादि संथाल परगना से प्रस्थान कर गए थे वह फिर इस क्षेत्र में आकर बस गए। इसके अलावा यूरोपीय ठेकेदार भी सस्ते मजदूरों को प्राप्त करने के लिए इस क्षेत्र में आ गए। वन क्षेत्र में संथालों को जो परंपरागत अधिकार थे उनसे भी ब्रिटिश सरकार ने उन्हें वंचित कर दिया। संस्थालों द्वारा की जाने वाले झूम की खेती पर भी सरकार ने रोक लगा दिया। संथालों पर भूमि राजस्व‌ और अधिक बढ़ा दिया गया। संथालों के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। ईसाई धर्म प्रचारक भी संथालों के धार्मिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप कर उन्हें ईसाई बनाने लगे।

जमींदार और साहूकारों ने उन पर अत्याचार करना फिर से आरंभ कर दिया। ऐसी परिस्थिति में संस्थालों का असंतोष दिन प्रतिदिन बढ़ता ही चला गया और वे 1871 ईसवी में एक बार फिर विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह 1871 से 1882 ईसवी तक चला। इस विद्रोह को खेरवार विद्रोह कहते हैं। खेरवार विद्रोह के नेता भागीरथ मांझी, जदू मांझी और देबू गोसाईं थे। मांझी ग्राम प्रधान को कहा जाता था जिसका संथाल जाति के लोगों पर बहुत प्रभाव रहता था। खेरवार विद्रोह हिंसक नहीं हो पाया। विद्रोहियों ने प्रदर्शन और सभाओं द्वारा अपन विरोध प्रकट किया। प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के कारण यह विद्रोह समाप्त हो गया। इस विद्रोह ने यह प्रमाणित कर दिया कि आदिवासी जातियों का एकमात्र उद्देश्य विदेशी शासन से मुक्त होना है और विरोध की अग्नि अब शांत नहीं हो पाएगी।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

कोल विद्रोह

संथाल विद्रोह

चुआड़ विद्रोह

रंगपुर विद्रोह

सन्दर्भ[संपादित करें]