खड़िया विद्रोह

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तेलंगा खड़िया के नेतृत्व में खड़िया विद्रोह 1880 में हुआ। यह आंदोलन अपनी माटी की रक्षा के लिए शुरू हुआ। जंगल की जमीन से अंग्रेजों को हटाने के लिए युवा वर्ग को गदका, तीर और तलवार चलाने की शिक्षा दी गई। तेलंगा की पत्नी रत्नी खड़िया ने हर मोर्चे पर पति का साथ दिया। रत्नी ने कई जगह अकेले ही नेतृत्व संभालते हुए अंग्रेजों से लोहा लिया। 23 अप्रैल 1880 को अंग्रेजों के दलाल बोधन सिंह ने गोली मारकर तेलंगा खड़िया की हत्या कर दी। उनकी हत्या के बाद रत्नी खड़िया ने पति के अधूरे कार्यां को पूरा किया। वह अपनी सादगी, ईमानदारी और सत्यवादिता से लोगों में जीवन का संचार करती रहीं।[1]

परिचय[संपादित करें]

तेलंगा खड़िया ने अंग्रेजी हुकूमत को नकार दिया था। उसने कहा- जमीन हमारी, जंगल हमारे, मेहनत हमारी, फसलें हमारी, तो फिर जमींदार और अंग्रेज कौन होते हैं हमसे लगान और मालगुजारी वसूलने वाले। अंग्रेजों के पास अगर गोली-बारूद हैं, तो हमारे पास भी तीर-धनुष, कुल्हाड़ी, फरसे हैं। बस क्या था, आदिवासियों की तेज हुंकार से आसमान तक कांप उठा। तेलंगा ने जोड़ी पंचैत संगठन की स्थापना की। यह एक ऐसा संगठन था, जिसमें विद्रोहियों को तमाम तरह की युद्ध विद्याओं समेत रणनीति बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता था। रणनीतिक दस्ता युद्ध की योजनाएं बनाता और लड़ाके जंगलों, घाटियों में छिपकर गुरिल्ला युद्ध करते।

अब हर गांव में जोड़ी पंचैत बनने लगे। अखाड़े में युवा युद्ध का अभ्यास करने लगे। हर जोड़ी पंचैत एक दूसरे से रणनीतिक तौर पर जुड़े थे। संवाद और तालमेल बेहद सुलझा हुआ था। जमींदारों के लठैतों और अंग्रेजी सेना के आने के पहले ही उसकी सूचना मिल जाती थी। विद्रोही सेना पहले से ही तैयार रहती और दुश्मनों की जमकर धुनाई करती। तेलंगा ने छोटे स्तर पर ही सही, मगर अंग्रेजों के सामानांतर सत्ता का विकल्प खोल दिया था। तेलंगा ने लड़ाई की शुरूआत मूरगू गांव से की, जहां 09 फरवरी 1806 ई. को उसका जन्म हुआ था। अधिकतर गांव जमींदारी और अंग्रेजी शोषण से पीडि़त थे। इसलिए विद्रोहियों को ग्रामीणों का भारी समर्थन मिल रहा था। गुरिल्ला युद्ध में दुश्मनों को पछाड़ने के बाद विद्रोही जंगलों में भूमिगत हो जाते। तेलंगा जमींदारों और अंग्रेजी शासन के लिए खौफ बन चुका था। उसे पकड़ने के लिए इनाम का जाल फेंका गया। कई लोग लालच में पड़ गए और गुप्त सूचना पर तेलंगा को कुम्हारी गांव में बैठक करते हुए बंदी बना लिया गया। लोहरदगा में मुकदमा चला और तेलंगा को चैदह साल कैद की सजा सुनाई गई।

चैदह साल बाद जब तेलंगा जेल से छूटा, तो उसके विद्रोही तेवर और भी तल्ख हो गए। विद्रोहियों की दहाड़ से जमींदारों के बंगले कांप उठे। जोड़ी पंचैत फिर से जिन्दा हो उठा और युद्ध प्रशिक्षणों का दौर शुरू हो गया। बसिया से कोलेबिरा तक विद्रोह की लपटें फैल गईं। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, हर कोई उस विद्रोह में भाग ले रहा था। तेलंगा जमींदारों और सरकार के लिए एक भूखा बूढ़ा शेर बन चुका था। दुश्मन के पास एक ही रास्ता था- तेलंगा को मार गिराया जाए। 23 अप्रैल 1880 को तेलंगा समेत कई प्रमुख विद्रोहियों को अंग्रेजी सेना ने घेर लिया। तेलंगा गरजा- हिम्मत है तो सामने आकर लड़ो। कहते हैं तेलंगा की उस दहाड़ से इलाका थर्रा गया था। युद्ध कौशल से प्रशिक्षित विद्रोहियों से सीधी टक्कर लेने की हिम्मत दुश्मन में नहीं थी। सिपाही बेधन सिंह ने झाडि़यों में छिपकर तेलंगा की पीठ पर गोली चला दी। बेहोश तेलंगा के पास आने की भी हिम्मत दुश्मनों में नहीं थी। मौके का फायदा उठाकर विद्रोही तेलंगा को ले जंगल में गायब हो गए। तेलंगा फिर कभी नजर नहीं आए। खडि़या लोकगीतों में आज भी तेलंगा जीवित हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

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