क्लास पोंटस अर्नोल्डसन
| क्लास पोंटस अर्नोल्डसन | |
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नोबेल शांति पुरस्कार विजेता क्लास पोंटस अर्नोल्डसन | |
| जन्म |
27 अक्टूबर 1844 गोथेनबर्ग, स्वीडन |
| मौत |
20 फरवरी 1916 stockholm, स्वीडन |
| नागरिकता | स्वीडिश |
| प्रसिद्धि का कारण | स्वीडिश शांति और मध्यस्थता समाज |
| पुरस्कार | नोबेल शांति पुरस्कार (1908) |
क्लास पोंटस अर्नोल्डसन (27 अक्टूबर 1844 – 20 फरवरी 1916) एक अत्यंत प्रख्यात और विश्वविख्यात स्वीडिश राजनीतिज्ञ, पत्रकार, लेखक और शांतिवादी नेता थे, जिन्हें स्कैंडिनेवियाई देशों के बीच शांति स्थापित करने और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के लिए उनके ऐतिहासिक आंदोलनों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है।[1] वर्ष 1908 में उन्हें वैश्विक शांति के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व और अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान के लिए डेनमार्क के फ्रेडरिक बाजेर के साथ संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।[2] यह महान सम्मान उन्हें 'स्वीडिश शांति और मध्यस्थता समाज' की स्थापना करने और अंतरराष्ट्रीय विवादों को युद्ध के बजाय कूटनीति तथा बातचीत के माध्यम से सुलझाने की अत्यंत ऐतिहासिक वकालत करने के लिए प्रदान किया गया था।[3] उनका यह अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक कार्य आधुनिक मानवाधिकारों और यूरोपीय शांति संधियों को स्पष्ट रूप से समझने में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर माना जाता है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
[संपादित करें]उनका जन्म 27 अक्टूबर 1844 को स्वीडन के गोथेनबर्ग नामक एक अत्यंत ऐतिहासिक और प्रमुख नगर में हुआ था। उनके पिता एक स्थानीय संगीतकार थे, जिनका निधन तब हो गया था जब अर्नोल्डसन केवल 16 वर्ष के थे। पिता के असामयिक निधन के कारण उनके परिवार को अत्यंत भयंकर आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। धन के अभाव के कारण उन्हें अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़नी पड़ी और अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए रेल विभाग में एक साधारण कर्मचारी के रूप में कार्य करना पड़ा।
हालाँकि उन्होंने अपनी औपचारिक स्कूली शिक्षा छोड़ दी थी, परंतु उनके भीतर ज्ञान प्राप्त करने की अत्यंत गहरी लालसा थी। उन्होंने स्वाध्याय के माध्यम से इतिहास, दर्शनशास्त्र और धर्मशास्त्र के अत्यंत जटिल ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। वे रेल विभाग में कार्य करते हुए भी अपने खाली समय में स्वतंत्र रूप से विभिन्न समाचार पत्रों के लिए अत्यंत विचारोत्तेजक और प्रगतिशील लेख लिखते रहते थे। इसी वैचारिक अध्ययन और संघर्षपूर्ण जीवन ने उन्हें मानव अधिकारों और शांतिपूर्ण समाज के महत्व को समझने की अत्यंत गहरी प्रेरणा दी।
राजनीतिक और शांति आंदोलन
[संपादित करें]पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी एक अलग और अत्यंत स्वतंत्र पहचान बनाने के पश्चात, उन्होंने अपना पूरा ध्यान राजनीति और समाज सुधार की ओर केंद्रित कर दिया। वर्ष 1882 में वे स्वीडिश संसद के निचले सदन के लिए एक निर्वाचित सदस्य के रूप में चुने गए और 1887 तक उन्होंने एक अत्यंत समर्पित जनसेवक के रूप में कार्य किया। संसद में रहते हुए उन्होंने सैन्य खर्च को कम करने, नागरिक अधिकारों का विस्तार करने और धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करने के लिए अत्यंत ऐतिहासिक कानून प्रस्तावित किए।
वर्ष 1883 में उन्होंने वैश्विक शांति के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए 'स्वीडिश शांति और मध्यस्थता समाज' की स्थापना की। यह संस्था आज भी पूरे यूरोप में सबसे पुरानी और प्रामाणिक शांतिवादी संस्थाओं में से एक मानी जाती है। उनकी सबसे बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि वर्ष 1905 में सामने आई, जब स्वीडन और नॉर्वे के बीच का राजनीतिक गठबंधन टूट रहा था और दोनों देशों के बीच एक अत्यंत भयंकर युद्ध छिड़ने की आशंका उत्पन्न हो गई थी। अर्नोल्डसन ने अपने मजबूत जन-आंदोलन और लेखों के माध्यम से स्वीडिश सरकार पर अत्यंत भारी दबाव डाला कि इस विवाद को शांतिपूर्ण कूटनीति के माध्यम से सुलझाया जाए। अंततः उनके प्रयासों से युद्ध टल गया और दोनों देश शांतिपूर्वक अलग हो गए।
सम्मान और साहित्य
[संपादित करें]अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, मानवाधिकारों और वैश्विक शांति के क्षेत्र में उनके इस ऐतिहासिक और अभूतपूर्व प्रयासों के लिए उन्हें वर्ष 1908 में नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक अत्यंत उत्कृष्ट और प्रभावशाली लेखक भी थे। उन्होंने 'विश्व शांति की आशा' नामक एक अत्यंत प्रसिद्ध पुस्तक भी लिखी थी, जिसने पूरे यूरोप में शांति आंदोलन को एक नया और अत्यंत मजबूत वैचारिक आधार प्रदान किया। उन्होंने अपने नोबेल पुरस्कार की संपूर्ण धनराशि को शांति आंदोलनों और सामाजिक कार्यों के लिए पूरी तरह से दान कर दिया था। 20 फरवरी 1916 को 71 वर्ष की अत्यंत परिपक्व आयु में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में उनका शांतिपूर्ण निधन हो गया, परंतु वैश्विक शांति के जगत में उनका अमूल्य योगदान सदा के लिए अमर रहेगा।