कैलाश आश्रम

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ब्रहमविदंयापीठ श्री कैलाश आश्रम की स्थापना वर्ष 1880 में श्रीमत्स्यास्वामी धनराज गिरीजी महाराज ने की। आज भी वे आदरपूर्वक आदि महाराज जी के नाम से पुकारे जाते हैं। आम विश्वास है कि उन्हें स्वप्न में भगवान शिव ने आश्रम में एक शिवलिंग की स्थापना का आदेश दिया था। इसके अतिरिक्त टिहरी के राजा के अनुरोध पर उन्होंने ग्रंथों को सुरक्षित रखने के लिए एक भवन खंड का निर्माण महामंडलेश्वर श्रीमत्स्यास्वामी विदयानन्द गिरीजी महाराज का आवास है। यही शिवलिंग आज भी श्री अभिनव चंद्रेश्वर भगवान (शिव) का रूप धारण करता है।


आश्रम का प्रवेश द्वार[संपादित करें]

इस आश्रम का विस्तार इसके प्रबन्धक स्वामी पूर्णानन्द गिरिजी द्वारा कैलाश आश्रम के दूसरे एवं चौथे आचार्यों के कार्यकाल में किया गया जिनके नाम क्रमशः आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमत्स्यस्वामी जनार्दन गिरीजी तथा आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमत्स्यस्वामी गोविंदानन्द गिरिजी था।

आचार्य महामण्डलेश्वर विद्यानन्द गिरिजी ने आश्रम का विस्तृत विकास किया। एक गोशाला, भक्त निवास (श्रद्वालुओं के लिए घर), चैतन्य गिरि अस्पताल, एक छात्रावास, विष्णुधाम, चन्ना भोजनालय (एक रेस्टोरेन्ट) तथा भगवान हर सत्संग भवन का निर्माण कैलाश आश्रम में किया गया हैं।

क्षेत्र का सबसे पुराना आश्रम कैलाश आश्रम अपने वेदान्त के प्राचीन ज्ञान के लिए प्रसिद्व हैं। यह शंकराचार्य की धार्मिक पीठ है। यह एक सिद्व पीठ की तरह है जहां वेद तथा सन्यास से सबंधित ज्ञान की शिक्षा दी जाती है। आज यह विश्वभर के पर्यटकों को आकर्षित करता है जिनकी रुचि उपदेशों को सुनने तथा आध्यात्म ग्रहण करने में है। शिवानन्द आश्रम की स्थापना से पहले इस आश्रम में कई प्रखर विद्वान स्वामी विवेकानन्द, स्वामी चिन्मयानन्द तथा स्वामी शिवानन्द जैसे कुछ लोग यहां रह चुके हैं।

इस आश्रम की अन्य शाखाएं हरिद्वार, उत्तरकाशी, दिल्ली, इलाहाबाद, रोहतक, जम्मु, मध्य प्रदेश, कानपुर, मुजफ्फरनगर, बिहार, सामना मण्डी में स्थित है।