केशवप्रसाद मिश्र

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केशवप्रसाद मिश्र (चैत्र कृष्ण सप्तमी, विक्रम संवत् १९४२ - चैत्र ७, संवत् २००८) शिक्षाविद तथा हिन्दी साहित्यकार थे।

जीवन परिचय[संपादित करें]

आचार्य जी के पूर्वज बस्ती जिला के धर्मपुर गाँव के कई शताब्दी पूर्व काशी आकर भदैनी मुहल्ले में बस गए। प्राचीन राममंदिर के पास ही आप लोगों का पैतृक गृह था। यहीं विक्रम संमवत 26 जुलाई 1926 को मिश्र जी का जन्म हुआ। पंडित जी अपने पिता पं० भगवतीप्रसाद वैद्य के ज्येष्ठ पुत्र थे। किशोरावस्था खेलकूद और पतंगबाजी में बीती। आपने १४ वर्ष की अवस्था में पं० योगेश्वर झा से व्याकरण पढ़ना आरंभ किया। क्रमश: जयनारायण हाई स्कूल और संस्कृत महाविद्यालय (वर्तमान सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय) में शिक्षा प्राप्त की। अपने गुरु पं० योगेश्वर जी की बाल पाठशाला से ही आपने अध्यापन कार्य आरंभ किया। महामहोपाध्याय पं० शिवकुमार शास्त्री जी के सांग वेद विद्यालय में कुछ काल तक व्याकरण पढ़ाते रहे। इसी काल में श्री माधवाचार्य, श्रीराम शास्त्री, महामहोपाध्याय गंगाधर शास्त्री, गोस्वामी दामोदरलाल जी प्रभृति मनीषियों की छत्रछाया में साहित्य, व्याकरण, वेदांत, दर्शन का भी अध्ययन करते रहे। अपने अध्यवसाय से अंग्रेजी में इंटर की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए और साहित्य, में काव्यतीर्थ की उपाधि प्राप्त की। बिना किसी गुरु के स्वाध्याय द्वारा बंगला, गुजराती, फारसी, पालि, जर्मन, लैटिन, आदि भाषाओं में दक्षता प्राप्त कर ली। आयुर्वेद में भी आपकी असाधारण प्रगति थी। सुश्रुत, अष्टांगहृदय, आदि ग्रंथों के बहुत से स्थल आपको कंठस्थ थे। साहित्य क्षेत्र में आचार्य पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी को अपना गुरु मानते थे। १९१४-१९१६ तक आपने सनातन धर्म हाई स्कूल, इटावा में अध्यापन किया।

१९१६ में आप काशी के विख्यात सेंट्रल हिंदू स्कूल में अध्यापक नियुक्त हुए। यहीं से आप १९२८ में पदोन्नति कर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सेंट्रल हिन्दू कालेज के हिंदी विभाग में प्राध्यापक होकर चले आए और अवकाश ग्रहण तक यहीं बने रहे। १९४१-५० तक हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहकर आपने अवकाश ग्रहण किया। विश्वविद्यालय ने १९५२ में पंडित जी को डाक्टर ऑव लेटर्स की सम्मानित उपाधि प्रदान की थी। इनकी सरसता, प्रतिभा तथा विद्वता से पूज्य पंडित मदनमोहन मालवीय जी इतने प्रभावित थे कि इनकी नियुक्ति का स्वयं ही प्रस्ताव किया था।

पंडित जी अध्ययनशील तथा स्वभावत: एकांतप्रिय व्यक्ति थे। उनके ओजस्वी संस्कृत धारावाही भाषण तथा लेखन से अगाध पांडित्य टपकता था। उनका अंग्रेजी भाषाज्ञान भी बहुत अच्छा था। उन्होंने अंग्रेजी में बहुत से निबंध लिखे जो प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे। अपभ्रंश पर आपका इंडियन एंटीक्वेरी में निबंध प्रकाशित हुआ। उनके शोधात्मक दृष्टिकोण से देश विदेशों के विद्वान विशेषत: प्रभावित हुए। उनके लेखों का संकलन और संस्मरण नागरीप्रचारिणी पत्रिका के 'केशव स्मृति अंक' में संकलित हैं।

पंडित जी की मित्रमंडली में उस समय के प्रसिद्ध साहित्यिक और कवि थे जिनमें प्रमुख राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, राय कृष्णदास, बाबू राधेकृष्णदास, पं० रामदहिन मिश्र, पं० रामनारायण मिश्र, पं० महावीर प्रसाद द्विवेदी और जयशंकर प्रसाद, जैसे, प्राप्तिख्यात व्यक्ति थे। सहयोगियों में बाबू श्यामसुंदर दास, पं० रामचंद्र शुक्ल, पं० अयोध्यासिंह उपाध्याय, लाला भगवानदीन, पं० विश्वनाथ प्रसाद मिश्र आदि थे।

पंडित केशवप्रसाद जी का 22 अक्टूबर 1989 में काशी में देहावसान हो गया।

कार्य[संपादित करें]

पंडित जी हिंदी और संस्कृत दोनो भाषाओं में पद्यरचना करते थे। आपका कालिदास के मेघदूतम् का खड़ी बोली में पद्यानुवाद भाव, भाषा और सौंदर्य की दृष्टि से अनूठी कृति है।

आपकी अनेक भूमिकाओं में मधुमती की भूमिका विशिष्ट है। कामायनी अध्यापन आपका प्रिय विषय था। आपका गद्य बहुत ही भावपूर्ण होता था।

'हिंदी वैद्युत शब्दावली' नामक अंग्रेजी-हिंदी तकनीकी शब्दों का आपका कोश १९२५ में प्रकाशित हुआ था। 'हिंदी शब्दसागर' में शब्दों की व्युत्पत्ति का कार्य आपकी देखरेख में चला था। परंतु पंडित जी की सबसे बड़ी विशिष्टता उनकी आलोचना पद्धति है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और पंडित जी का आलोचनात्मक विवेचन भिन्न सिद्धांत और दिशा में होता था। शुक्ल जी की जीवन दृष्टि प्रत्यक्षवादी थी, मिश्र जी की अध्यात्मवादी। मिश्र जी भारतीय संस्कारों से परिपोषित दृष्टिकोण से देखते थे। उनका आचार्य शुक्ल के रस-मीमांसा-सिद्धांत से वैषम्य था।

पंडित जी के मौलिक विचार मेघदूत के पद्यानुवाद, 'आदर्श और यथार्थ', शांतिप्रिय द्विवेदी के 'परिचय की भूमिका', 'काव्यालोक', 'गद्य भारती', 'पदचिह्न', हिंदी वैद्युत शब्दावली, शुद्ध साहित्य का आनंद प्रदान करते हैं। देवभाषा संस्कृत में पंडित जी ने 'हरिवंश गुण स्मृति' नामक प्रबंध काव्य की रचना की। संस्कृत पढ़ने एवं सीखने वालों के लिये दो भागों में 'संस्कृत सारिणी' नामक पुस्तक लिखी। आपके अक्षर मोतियों के समान सुडौल और सुगठित होते थे।

आप संगीत और कला में अभिरुचि लेते एवं उसके उत्तम पारखी थे। आपकी अनेक पद्य रचनाएँ 'सरस्वती' और 'इंदु' में प्रकाशित हुई थीं।