केरल की लोक क्रीड़ाएँ

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केरल की ग्रामीण संस्कृति के प्रतिरूप हैं लोक क्रीडाएँ। केरल के आचार कला, साहित्य, जाति - व्यवस्था इत्यादि से ये लोक क्रीडाएँ जुडी हुई हैं। लोक क्रीडाओं का लक्ष्य विजयी का चयन करना मात्र नहीं था, इनमें गान, नृत्य, पुराकथा संदर्भों का स्मरण, सहभागिता सभी भाव अन्तर्निहित थे। इस कारण बहुत सी लोक क्रीडाएँ ऐसी होती है जिनमें कोई भी विजयी नहीं माना जाता है। राष्ट्रीय लक्ष्यों को सिद्ध करने के लिए भी लोक क्रीडा आयोजित की जाती थीं। इसका एक उदाहरण है मुर्गों की लडाई। मध्यकालीन केरल में मुर्गा भिंडत से रियासतों के अधिपतियों के बीच के वाद - विवाद का समाधान ढूँढा जाता था। यदि उससे समाधान न होता तो वे 'आळंकम्' याने मानव द्वन्द्व युद्ध के लिए तैयार हो जाते थे। मुर्गों की लडाई आज कल प्रचलित नहीं है। किन्तु 'कोष़िप्पोरू' नामक भिंडत का आयोजन किया जाता है जिसमें मुर्गों को परस्पर लड़ने दिया जाता है, लेकिन किसी को जान नहीं खोनी पड़ती। यह क्रीडा आज भी उत्तरी मलबार में प्रचलित है।

इतिहास[संपादित करें]

केरल की अधिकतर कलाओं का प्रारंभ क्रीडाओं से हुआ है। अत्यंत प्राचीन कळियाट्टम कालान्तर में अधिक ताल निष्ठ कला के रूप में विकसित होकर परिभाषा बद्ध हो गया। अनेक कलारूपों ने विभिन्न खेलों से कई तत्त्व ग्रहण किए। परिचमुट्टुकळि, कोल्क्कळि, तुळ्ळल, दप्पुकळि, कथकळि, पूरक्कळि इत्यादि में कळरिप्पयट्टु के प्रभाव लक्षित होते हैं। प्रसिद्ध विद्वान मूरकोत्तु कुमारन का कहना है कि केरल के खेलों को 'कला और कमला' का संगम कहा जा सकता है। आज खेले जाने वाले कई खेलों में नृत्य-सा तालबद्ध पद विन्यास, गीत तथा मिथकीय बिम्ब की झलक मिलती है। वैसे ही केरल में अनेक उत्कृष्ट कलाएँ 'कळि' (खेल) नाम से जानी जाती हैं। उदाहरण द्रष्टव्य हैं - कथकळि, कैकोट्टिक्कळि, तुळ्ळलकळि, पूरक्कळि, अरवनक्कळि आदि। इस प्रकार जिन खेलों में कला का प्राधान्य रहता है वे लोक क्रीडाओं के अन्तर्गत नहीं आते।

केरल की क्षेत्रीय कलाओं को पाँच विभागों में बाँट सकते हैं- कलहक्कळि, कौशलक्कळि, भाग्यक्कळि, अन्वेषणक्कळि और अनुकरणक्कळि। कलहक्कळि ऐसे खेल हैं जिनमें विनोदपरक कलह तथा झगडे का कलाप्रदर्शन समाहित हैं। इस प्रकार के खेलों में थोड़ा बहुत बल प्रयोग धक्का-मुक्की, खींचातानी आदि हुआ करते हैं। उदा - कबड्डी, तुम्बिकळि आदि।

कौशलक्कळि

इसमें दावपेंचों की प्रधानता रहती है। साँस छोडे बिना सरल उपायों से लक्ष्य प्राप्ति इस खेल की खूबी है। कौशलपूर्वक मोहरें चलाना, प्रतिद्वन्द्वी की गति समझकर प्रतिक्रिया जताना आदि प्रस्तुत खेलों की विशेषताएँ हैं। उदा - तलप्पन्तुकळि, कक्कुकळि आदि।

भाग्यक्कळिकल

ये ऐसे खेल हैं जो भाग्याश्रित रहते हैं। परंतु इसमें थोडा-सा कौशल भी है लेकिन भाग्य ही प्रमुख है। उत्सव मैदान के हाथी, मयूर, ऊँट खेलों से लेकर जुआ, पकिडकळि आदि इसमें शामिल हैं।

अन्वेषणक्कळियों

इनका सामान्य गुण है किसी वस्तु को छुपाकर रखना और उसे ढूँढ पाना। इन खेलों में अनुमान तथा भाग्य का स्थान अधिक है। उदा - अण्डरकळि, पून्तोलम् कळि आदि।

अनुकरणक्कळिकळ

ये वे खेल हैं जिनमें पुराण पात्रों से लेकर पशु-पक्षियों तक का अनुकरण किया जाता है। 'तवळच्चाट्टम' (मेंढक-कूद) जैसे अनुकरण खेल में मेंढक-कूद करके पहले पहुँचना ही शामिल है। किन्तु 'सियार और गाय' खेल में थोड़ा-सा बल प्रयोग भी शामिल है।

विदेशी खेल[संपादित करें]

यूरोपीय खेलों के आगमन के साथ केरल की अनेक लोक क्रीडाएँ तिरोहित हो गईं। रेडियो- टेलिवीज़न प्रसारण संप्रेक्षण तथा सितारों के उदय आदि से क्रिकेट घर-घर पहुँच गया। फुटबॉल, वॉलीबॉल, बास्कटबॉल आदि अन्तर्राष्ट्रीय महत्व के खेलों के प्रति केरल के लोगों का सम्मान दुनिया के किसी दूसरे देश के लोगों से कम नहीं है। कला और जीवन में भूमण्डलीकरण के कारण बडी क्रान्तियाँ हुई हैं मगर खेलों के विषय में कोई क्रान्ति नहीं हुई। यहाँ किसी लोक-क्रीडा पर भूमण्डलीकरण का अभाव नहीं पडा है। हाँ, अनेक लोक क्रीडाएँ विलुप्ति के कगार पर ज़रूर पहुँच गयीं। लोक क्रीडाएँ परिवर्तन के बदले लुप्त हो गई। आज केरल की लोकक्रीडाओं पर अनुसंधान करने तथा बहुत-सी लोक-क्रीडाओं की पुनर्स्थापना का प्रयास जारी है। इस दिशा में डॉ॰ एम. वी. विष्णु नंपूतिरि जैसे व्यक्तियों का प्रयास प्रशंसनीय है। 'फोकलोर निघंटु', 'नाटन कळिकळुम विनोदंगळुम' (लोक क्रीडाएँ एवं मनोरंजन) आदि ग्रन्थ लोक क्रीडाओं पर प्रकाश डालते हैं।