केदार शर्मा

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केदार शर्मा ( संवत् 1954 - संवत् 2023) चित्रकार एवं हिन्दी साहित्यकार थे।

जीवनी[संपादित करें]

केदार शर्मा का जन्म मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी सं. 1954 में भागलपुर जिले के साहबगंज में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा वहीं हुई किंतु बाद में ये काशी चले आए। इन्होंने प्रयाग के इंडियन प्रेस में जर्मन कलाकार लुई जोमर के सान्निध्य में चित्रकला की साधना की। इनका घर का नाम नारायण था किंतु कलाजगत् में चित्रकार केदार के नाम से प्रसिद्ध हुए।

कलम और कूची के समान रूप से धनी थे। बनारस, बनारसी रंग और जीवन इनकी कला और साहित्य में विशेष: व्यंजित हुए। रंग और रेखाओं के अंकन में बड़े सिद्ध थे। 1920 में केदार जी ने अपनी व्यंग्य और हास्यमूलक अनुभूतियों को आकार देना शुरु किया और 1925 तक पौराणिक, साहित्यिक और राजनीतिक संदर्भों में अनेक व्यंग्य चित्र प्रस्तुत किए। कलाक्षेत्र में ये प्रथम चित्रकार थे जिन्होंने सांस्कृतिक विषयों का लेकर हास्य चित्र बनाए। इन्होंने व्यंग्य चित्रों की कई सीरीज चलाई थी। इनमें व्यंग्य करने की अद्भुत क्षमता थी। बिहारी सतसई के दोहों पर अनेक व्यंग्य चित्र बनाए जो प्रयाग की प्रसिद्ध पत्रिका "सरस्वती" में प्रकाशित हुए। इन चित्रों की विशेषता यह रही है कि आकृतियों में मूल प्रकृति और भावना का हनन नहीं हुआ। इनके राजनीतिक कार्टूनों में बड़ा तीखापन था। इन्होंने 'मंडूक मिश्र' के नाम से दैनिक "आज" में धारावाहिक रूप से व्यंग्य चित्र प्रस्तुत किए। व्यक्तिचित्र, रेखाचित्र और व्यंग्यचित्रों में इनकी समान गति थी। ये यथार्थवादी शैली के चित्रकार थे। भारतेंदु और निराला जैसे साहित्यकारों पर इन्होंने प्रतीकात्मक चित्र बनाए थे। दो युगों तक हिंदीजगत् में एकमात्र पुस्तक-चित्रकार थे। इनके भावचित्र बड़े मार्मिक होते थे।

लेखक के रूप में इनके व्यक्तिव्यंजक निबंधों को हिंदी संसार में मान्यता मिली। इनके आरंभिक निबंध "खिलौना", "बालसखा", "चाँद" और माधुरी" में और व्यक्तिव्यंजक निबंध "आज" के रविवारी अंकों में प्रकाशित हुए जिनके लिए चित्रों की डिजाइन भी ये स्वय बना देते थे। कुछ वर्षों तक "आज" और "तरंगिनी" में व्यंग्य चित्रकार के रूप में काम किया।

संगीत में गहरी अभिरुचि थी। स्वयं सुरीले बाँसुरी वादक थे और हारमोनियम भी अच्छा बजाते थे। इनके शिष्य कलाजगत् में बहुविधि कलाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी सं. 2023 वि. काशी में स्वर्गवास हुआ।