कूका विद्रोह

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कूका विद्रोह सन १८७१-७२ में पंजाब के कूका लोगों (नामधारी सिखों) द्वारा किया गया एक सशस्त्र विद्रोह था जो मूलतः अंग्रेजों द्वारा गायों की हत्या को बढ़ावा देने के विरोध में किया गया था। बालक सिंह तथा उनके अनुयायी गुरु रामसिंह जी ने इसका नेतृत्व किया था। कूके लोगों ने पूरे पंजाब को बाईस जिलों में बाँटकर अपनी समानान्तर सरकार बना डाली। कूके वीरों की संख्या सात लाख से ऊपर थी। अधूरी तैयारी में ही विद्रोह भड़क उठा और इसी कारण वह दबा दिया गया। भारत का वायसराय लॉर्ड नर्थब्रूक था।

सिखों के नामधारी संप्रदाय के लोग कूका भी कहलाते हैं। इस पन्थ का आरम्भ 1840 ईस्वी में हुआ था। इसे प्रारम्भ करने का श्रेय सेन साहब अर्थात भगत जवाहर मल को जाता है।

कूका विद्रोह के दौरान 66 नामधारी सिख शहीद हो गए थे। नामधारी सिखों की कुर्बानियों को भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास में 'कूका लहर' के नाम से अंकित किया गया है।

परिचय[संपादित करें]

ऐतिहासिक शहर मालेरकोटलाण का भौगोलिक मानचित्र

जब अंग्रेजों ने धर्म के नाम पर लोगों को लड़ने व गुलामी का अहसास करवाने के लिए पंजाब में जगह-जगह गौ वध के लिए बूचड़खाने खोले, तब नामधारी सिखों ने इसका बड़ा विरोध किया व सौ नामधारी सिखों ने 15 जून 1871 को अमृतसर व 15 जुलाई 1871 को रायकोट बूचड़खाने पर धावा बोल कर गायों को मुक्त करवाया। इस बगावत के जुर्म में 5 अगस्त 1871 को तीन नामधारी सिक्खों को रायकोट, 15 दिसम्बर 1871 को चार नामधारी सिखों को अमृतसर व दो नाम धारी सिखों को 26 नवम्बर 1871 को लुधियाना में बट के वृक्ष से बांधकर सरेआम फांसी देकर शहीद कर दिया गया।

मालेरकोटला का खूनी कांड[संपादित करें]

मलौद में एक हलकी मुठभेड़ के पश्चात 15 जनवरी 1872 में हीरा सिंह व लहिणा सिंह के जत्थे ने मालेरकोटला धावा बोल दिया। इसमें 10 नामधारी सिख लड़ते हुए शहीद हो गए। अंग्रेज प्रत्येक उस चिंगारी को बुझा देना चाहते थे, जो उनकी सत्ता के लिए नुकसानदायक हो। नामधारी सिक्खों को समाप्त करने के लिए मालेरकोटला के परेड ग्राउंड में देसी रियासतों से नौ तोपें मंगवाकर लगाई गई। सात तोपें सात बार चली, जिसमें 49 नामधारी सिखों को आजादी के लिए टुकड़े-टुकड़े कर शहीद कर दिया गया। इस जत्थे में एक 12 वर्षीय बच्चा बिशन सिंह भी शरीक था, जिसे सिपाहियों ने सिर धड़ से अलग कर शहीद कर दिया। 18 जनवरी 1872 को 16 अन्य सिखों को तोपों से उड़ाकर शहीद कर दिया गया। इस तरह मालेरकोटला कांड में 10 सिख लड़ते हुए, चार काले पानी की सजा काटते हुए, 65 सिखों को तोपों तथा एक सिख को तलवार से शहीद कर इन नामधारी सिखों को शहीद कर दिया गया। अंग्रेजों ने सतगुरु राम सिंह को गिरफ्तार कर लिया व नामधारी सिखों की कुर्बानियां रंग लाई, आखिर में 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया।

प्रत्येक वर्ष इन शहीद कूका की याद में मालेरकोटला में एक विशाल श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया जाता है, जिसमें देशभर से नामधारी सिख श्रद्धांजलि देने यहां पहुंचते हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]