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कुल्हड़

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कुल्हड़ में चाय परोसी जाती है।कुलहर

कुल्हड़ (हिन्दी: कुल्हड़; उर्दू: کلہڑ) अथवा कुल्हाद, बंगाली में माटिर भाँड़ (মাটির ভাঁড়) या संक्षेप में भाँड़ (ভাঁড়), कभी-कभी शिकोड़ा भी कहा जाता है। यह दक्षिण एशिया में प्रयुक्त एक पारम्परिक बिना हत्थे वाला मिट्टी का कप है, जो सामान्यतः बिना सजावट और बिना काँच कोटिंग वाला होता है तथा उपयोग के लिए बनाया जाता है। कुल्हड़ लगभग कभी पुनः उपयोग नहीं किए जाते।[1]

भारतीय उपमहाद्वीप के बाज़ारों तथा सड़क किनारे लगे खाने-पीने के ठेलों में पारम्परिक रूप से चाय जैसे गर्म पेय कुल्हड़ों में परोसे जाते आए हैं, जिससे पेय में ‘सौंधी खुशबू’ भर जाती है, जो लोगों को आकर्षक प्रतीत होती है। दही, गर्म दूध में चीनी मिलाकर तैयार पेय और कुछ क्षेत्रीय मिष्टान्न—जैसे कुल्फी—भी कुल्हड़ों में परोसे जाते हैं। समय के साथ कुल्हड़ों की जगह पॉलीस्टायरीन और कोटेड कागज़ के कपों ने ले ली है, क्योंकि वे बड़े मात्रा में ले जाने में हल्के और सस्ते होते हैं। ⁠[2][3]

संभवतः उत्पत्ति

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ग्रामीण भारत में विनिर्माण स्थल पर बिना फायर किए कुल्हड़

कुल्हड़ सिंधु घाटी सभ्यता के बाद से पिछले ५,००० वर्षों से इस क्षेत्र में उपयोग में हो सकते हैं।[4]

स्वाद पर प्रभाव

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चूंकि कुल्हड़ बिना काँच की कोटिंग वाले मिट्टी के होते हैं, इसलिए चाय जैसे गर्म पेय का कुछ भाग कप की भीतरी सतह में सोख जाता है। इससे पेय के स्वाद और सुगंध में विकास होता है, जिसे अक्सर ‘सौंधी खुशबू’ कहते हैं। यद्यपि लागत और सुविधा के कारण कुल्हड़ों की जगह सिंथेटिक कपों ने लेना शुरू कर दिया है, लेकिन उच्च श्रेणी के रेस्टोरेंट अभी भी ग्राहकों को ‘कुल्हड़वाली चाय’ के रूप में कुल्हड़ में परोसी जाने वाली चाय परोसते हैं। [5]

भारतीय रेल द्वारा पुनरुद्धार प्रयास एवं आलोचना

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कुल्हड़ में चाय डालना

2004 में भारतीय रेल (उस समय रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में) ने रेलवे स्टेशनों एवं ट्रेनों में बेचे जाने वाले चाय और अन्य पेयों के लिए कुल्हड़ों के उपयोग को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। यह तर्क दिया गया कि प्लास्टिक की तुलना में कुल्हड़ अधिक स्वच्छ होते हैं तथा पर्यावरण के अनुकूल भी हैं क्योंकि कुल्हड़ केवल मिट्टी से बनाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, चूँकि कुल्हड़ लघु-उद्योगों द्वारा बनाए जाते हैं, इससे ग्रामीण रोजगार को भी बढ़ावा मिलेगा। [6]

विरोधियों ने तर्क दिया कि रेल को वार्षिक लगभग १.८ अरब कुल्हड़ों का वितरण करना पड़ेगा, जिससे ईंट भट्ठों में भारी ईंधन खपत होगी और प्रदूषण बढ़ेगा। यह भी कहा गया कि कुल्हड़ों का पुर्नक्षरण (डिग्रेडेशन) दशक भर में ही नहीं होता, जबकि सिंधु घाटी की हजारों वर्ष पुरानी मूर्तियाँ इसका प्रतिकूल उदाहरण हैं और यह प्रमाणित करती हैं कि मिट्टी के बर्तन समय के साथ आसानी से खनिज बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, यह आशंका व्यक्त की गई कि कुल्हड़ पुनरुद्धार से रोज़ाना प्रत्येक राज्य में १०० एकड़ (०.४० किमी²) शीर्ष मिट्टी (टॉप-सॉयल) की उपज घट जाएगी और ग्रामीण कारीगरों को होने वाले आर्थिक लाभ नगण्य रहेंगे। [7]

कुल्हड़ में दही

हालाँकि कुल्हड़ बनाने के लिए टॉप-सॉयल के विकल्प उपलब्ध हैं और कम तापमान पर बनाए जाने पर ईंधन की बचत होती है तथा वे तेज़ी से विघटित भी हो सकते हैं, पर २००८ तक रेल में कुल्हड़ों के उपयोग का प्रयास विफल माना जाने लगा, क्योंकि प्लास्टिक एवं कोटेड पेपर कपों का प्रचलन जारी था। मुख्य कारण कुल्हड़ों का भारी वजन और प्रति यूनिट उच्च लागत था। एक अनुमान के अनुसार, प्रति कुल्हड़ क्रय लागत लगभग १.४० रुपये थी, जबकि कोटेड पेपर कप की मात्र ७-१० पैसे होती थी। कुछ विक्रेताओं ने यह शिकायत भी की कि कुल्हड़ थोड़ी मात्रा में तरल सोख लेते हैं, अतः कुल्हड़ में चाय परोसते समय अधिक मात्रा में चाय देना पड़ता है, जबकि डिस्पोज़ेबल प्लास्टिक कप में उतनी आवश्यकता नहीं होती। [8]

यह भी देखें

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  1. ↑ Nigel B. Hankin (1997). Hanklyn-janklin: a stranger's rumble-tumble guide to some words, customs, and quiddities, Indian and Indo-British. Banyan Books. ISBN 9788186558065. For the fussy, on request, the beverage will usually be served in a hand- less, unglazed, disposable earthenware pot, the kulhar, straight from the kiln ...
  2. ↑ Sonu Jain (6 July 2004), "Why Laloo's kulhad isn't as green as he makes it out to be", Indian Express, Contrary to common perception, the red kulhad takes nearly a decade to return to its natural form ... "The water in the clay disappears and the salts melt into a glassy state and bind together making the clay stronger," said D Chakravorty, ceramic engineer at CGCRI. It takes a while before this salt, exposed to vagaries of nature, decomposes ...
  3. ↑ Venkatesh Dutta (4 September 2010). "कुल्हड़ में चाय और लस्सी नहीं चली लालू की रेल में (Kulhars for tea and lassi are a flop on Laloo's Railway)". मूल से से 5 जुलाई 2015 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 4 जून 2025. वेंडरों को यह महंगा सौदा पड़ा, क्योंकि कुल्हड़ पॉलिथीन के कप से महंगा पड़ रहा था। कुल्हड़ का वजन भी ज्यादा होता है। नतीजा यह हुआ कि फिर पॉलिथीन की कप में चाय बिकने लगी (Vendors found this an expensive deal because kulhars are more expensive than plastic cups. Kulhars also weigh more. The result was that tea began selling again in plastic cups.
  4. ↑ Jasleen Dhamija (1970), Indian folk arts and crafts, National Book Trust, India, 1992, The simple clay kulhar, which is made in thousands as an inexpensive container for curd, sweets, tea or water, and after being used only once is thrown away, has the same form as those excavated at the Indus Valley or ...
  5. ↑ The Guide Team (16 July 2010). "Must catch events this weekend in Delhi" – via mid-day.com. ... Taste of Dilli: Dilwalon ki Delhi is famous ... there is kulhar chai with every buffet after the meal. Or you can opt for your favourite brand of whisky, served straight up with ice.
  6. ↑ "Storm In A Kulhar". Outlook India. 2 August 2004. मूल से से 9 मई 2013 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 4 जून 2025. For those romantic souls who've regretted the loss of that earthy aroma and its replacement by the smell of plastic and detergent, railway minister Laloo Prasad Yadav is bringing back the bygone era ... kilns that use not only cowdung but also coal and wood.
  7. ↑ Venkatesh Dutta (6 July 2004), "A clay pot dictatorship", Indian Express, The potter who makes the kulhars gets just 25 paisa per piece. So if the potter works really hard and makes 100 kulhars a day, how much does he earn? Rs 25. Just imagine, how much agricultural land will be needed for several lakh kulhars a day? Perhaps more than 100 acres per day per state ...
  8. ↑ M. Rajendran (14 June 2004). "Pots of money for tea in pot - Laloo's experiment with earthen cups comes at high price". The Telegraph. Calcutta. मूल से से 11 September 2004 को पुरालेखित। – via telegraphindia.com. It has the disconcerting tendency to soak the contents ... Normally, we supply 150 ml of tea. When poured into the kulhar, it shrinks to only about 100 ml because of the high absorption rate ...

बाहरी लिंक

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