कुरमाली लोक-गीत

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कुरमाली समाज में लोकगीतों का बाहुल्य है। आज भी ये गीत लोक-मुख में जीवित हैं। कुरमाली गीतों की परंपरा अति प्राचीन है। कोई भी अनुष्ठान गीत एवं नृत्य के बिना संपन्न नहीं होता। अधिकांश गीत नृत्यगीत हैं। गीत अत्यंत सरस और मर्मस्पर्शी है। राग के द्वारा ही गीतों के पार्थक्य और वैशिष्ट्य को समझा जा सकता है। कुरमाली जीवन के हरेक पहलू, विविध दृष्टिकोण और बहुआयामी विचार-धाराओं को कुरमाली लोकगीत संस्पर्श करता है।

कुरमाली लोक-गीतों की प्रमुख विशेषता यह है कि अधिकांश गीत प्रश्नोत्तर के रूप में हैं। ये छंद-विधान के नियम से पूर्णतः मुक्त हैं। इसके अपने छंद हैं जो गेय हैं। गीतों के लय द्वारा ही शैलीगत तत्व को पहचाना जा सकता है। कहीं-कहीं स्वतः अलंकारो का प्रयोग हुआ है।

कुरमाली लोकगीतों को कई वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है:-
(क) संस्कार-गीत,
(ख) ऋतु-गीत,
(ग) देवी-देवताओं के गीत,
(घ) श्रम-गीत,
(ड) खेल-गीत,
(च) जाती-गीत,
(छ) प्रबंध गीत आदि।

कुरमाली के प्रमुख लोकगीत[संपादित करें]

उधवा, ढप, बिहा, दमकच, सरहुल, नटुआ, डाइडधरा, जावा-करम, एधेइया, डाबका, बंदना, कुवांरी- झुपान आदि। साधारणतः कुरमाली के लोक-गीतों में प्रकृति का चित्रण प्रयाप्त मात्रा में मिलता है। करम गीतों में अंकुरोदय, पुनर्विवाह, कृषि-कर्म, हास्य-व्यंग्य, जीवन-यापन की पद्धिति का उल्लेख मिलता है। विवाह गीतों में कुरमाली संस्कृति, सामाजिक व्यवहार, खान-पान, दैनिक कर्म, रहन-सहन की छाप परिलक्षित होती है।

कुरमाली समाज में कन्या का महत्वपूर्ण स्थान है। जिस प्रकार वन की शोभा पुष्प है, उसी प्रकार घर की शोभा कन्या होती है।

कुरमाली के कुवांरी झुपान गीतों में जादू-टोना, तंत्र-मन्त्र एवं अंध-विश्वास का वर्णन मिलता है। डाइडधरा, ढप आदि गीतों में उच्च कोटि का दार्शनिक भाव झलकता है। वहीं डमकच गीतों में भाव-सौंदर्य के साथ-साथ हास्य का पुट भी मिलता है।

कुरमाली लोकगीतों में जीवन के विभिन्न पहलुओं का यथार्थ और सजीव चित्रण हुआ है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  • कुरमाली साहित्य: विविध सन्दर्भ, लेखक डा. एच.एन. सिंह, प्रकाशक- कुरमाली भाषा परिषद्, राँची।