कुम्भलगढ़ प्रशस्ति

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कुम्भलगढ़ प्रशस्ति या कुम्भलगड़ शिलालेख राजस्थान के राजसमंद जिले के कुम्भलगढ़ दुर्ग में स्थित कुम्भश्याम मंदिर में स्थित है। इस मन्दिर को वर्तमान समय में मामादेव का मदिर कहते हैं। यह प्रशस्ति संस्कृत भाषा एवं नागरी लिपि में है और पांच शिलाओं पर उत्कीर्ण की गयी थी। अब यह प्रशस्ति उदयपुर संग्रहालय में है।इस प्रशस्ति को किसने रचा, यह ठीक से ज्ञात नहीं है। सम्भवत इसके रचयिता कन्ह व्यास हों जो इसके रचना काल में कुम्भलगढ़ में ही रहते थे। प्रसस्ति का काल वि.सं. १५१७, मार्ग शीर्ष कृष्ण पंचमी थी। (सन १४६० ई)

इस प्रशस्ति में मुख्यतया राणा कुम्भा की विजयों का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसमें भौगोलिक स्थिति का, जनजीवन का, एकलिंग मन्दिर का वर्णन, चित्तौड़ का वर्णन (चित्रांग ताल, दुर्ग, वैष्णव तीर्थ के रूप में) किया गया है। इसमें गुहिल वंश का वर्णन है। यह मेवाड़ के महाराणाओं की वंशावली को विशुद्ध रूप से जानने का महत्वपूर्ण साधन है। इस लेख में हम्मीर को विषम घाटी का 'पञ्चानन' (शेर) कहा गया है। इसके रचयिता कान्ह व्यास है। जबकि डॉ गौरीशंकर हीराचन्द ओझा के अनुसार इसका रचयिता महेश भट्ट हैं।

डॉ. गोपीनाथ शर्मा लिखते हैं कि यह शिलालेख पाँच शिलाओं पर उत्कीर्ण था जिसमें पहली, तीसरी और चौथी शिलाएँ उपलब्ध हैं। दूसरी शिला का एक छोटा सा टुकड़ा मिला है और पाँचवीं शिला अप्राप्य है।

प्रथम शिला में ६८ श्लोक हैं जिनमें उस समय के भूगोल, जनजीवन, तीर्थस्थान आदि पर प्रकाश पड़ता है। एकलिंगजी के मंदिर तथा कुटिला नदी के वर्णन में बड़ी स्वाभाविकता है। इसके साथ इन्द्रतीर्थ वर्णन, कामधेनु, तक्षक, धारेश्वर आदि का रोचक वर्णन है। चित्तौड़ के वर्णन में प्राकृतिक स्थिति, समाधीश्वर, कुम्भश्याम, महालक्ष्मी के मंदिरों का वर्णन है। प्रशस्तिकार ने ५८ से ६८ श्लोक तक आनुसंगिक ढंग से मेवाड़ के नगरों, नदियों, पहाड़ों, झीलों, बागों तथा जनसमुदाय का वर्णन किया है।

द्वितीय शिला में ६९ से १११ तक श्लोक हैं। इसमें चित्रांगताल, चित्तौड़गढ़ दुर्ग, तथा चित्तौड़ का वैष्णव तीर्थ होने का वर्णन है। चित्तोड़ के बाजारों, मंदिरों तथा राजप्रासाद के वर्णन से कुम्भा के समय की समृद्धि का पता लगता है। इसके अंतिम ६ श्लोकों में रावल शाखा तथा राणा शाखा की विभिन्नता को समझने में सहायता मिलती है। प्रशस्तिकार ने बापा को यहाँ 'विप्रवंशीय' कहा है जो बड़े महत्व का है।

तृतीय शिला में वंश वर्णन चलता रहता है जिसमें बापा को फिर 'विप्र' कहा गया है जिसने हारीत की अनुकम्पा से मेवाड़ राज्य प्राप्त किया। यहाँ बापा को वंश-प्रवर्तक माना है और गुहिल को उसका पुत्र लिखा है जो भ्रम में डालने वाला है। इसमें गुहा के पुत्र लाटविनोद का नाम दिया है जो अन्यत्र नहीं मिलता है। इसके पश्चात इसमें दिया गया वर्णन एकलिंगजी महात्म्य के राज वर्णन से मिलता जुलता है। वैरीसिंह के सम्बन्ध में यह उल्लिखित है कि उसने आहड़ के चारों ओर परकोट तथा चार गोपुर बनवाए। इसमें केतु के साथ सामन्तसिंह के संघर्ष का भी वर्णन मिलता है। इसके बाद वर्णित है कि रत्नसिंह की चित्तोड़ रक्षा के निमित्त मृत्यु हो जाने पर खुमाण के वंशज लक्ष्मणसिंह ने दुर्ग रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी और उस अवसर पर उसके सात पुत्र दुर्ग रक्षा में काम आये। इस प्रशस्ति से उस समय के मेवाड़ के चार विभागों (चित्तोड़, आघाट, मेवाड़ और बागड़) का पता चलता है। इसमें दी गयी कुछ सामाजिक संस्थाओं के उल्लेख जैसे दास-प्रथा, आश्रम-व्यवस्था, वैदिक-यज्ञ , तपस्या, धर्मशाला तथा पाठन व्यवस्था बड़े रोचक हैं।

चतुर्थ प्रशस्ति में विशेष रूप से कुम्भा का वर्णन तथा उसकी विजयों का सविस्तार उल्लेख है। उसके द्वारा की गयी विजयों में योगिनीपुर, मंडोवर, यज्ञपुर, हमीरपुर, वर्धमान, चम्पावती, सिंहपुरी, रणस्तम्भ, सपादलक्ष, आभीर, बंबावदा , माण्डलगढ़, सारंगपुर, आदि मुख्य हैं। हम्मीर के वर्णन में उसके चेलावाट जीतने का वर्णन है, और उसे विषमघाटी का पञ्चानन (शेर) कहा गया है। लाखा के वर्णन में उसके धार्मिक तुलादान, और विजय कार्यों का वर्णन है। मोकल के वर्णन में सपादलक्ष जीतने तथा फीरोज को हराने का वर्णन है। क्षेत्र सिंह द्वारा भी यवन शासक को कैद करने तथा अलीशाह को परास्त करने का उल्लेख है।

रतनलाल मिश्र ने लिखा है कि कुम्भलगढ़ प्रशस्ति में नागौर जीतने का वृत्त है। उसमें नागौर के शासक को 'शकाधिपति' कहा है, नाम नहीं दिया है। नागौर का वर्णन १८वें पद्य से प्रारम्भ होकर २२वें पद्य तक समाप्त हो जाता है। इसके उपरान्त आगे की विजयों का वर्णन है। श्लोक २३ में उल्लिखित 'समसखां' को कायमखानी शमसखां माना जा सकता है क्योंकि इसके तत्काल बाद कासली की जीत की बात आती है।

रतनलाल मिश्र ने यह भी लिखा है कि कुम्भलगढ़ प्रशस्ति के श्लोक संख्या २१ एवं २२ से ज्ञात होता है कि महाराणा कुम्भा जांगलस्थल को युद्ध में रोंदता हुआ आगे बढा और शम्सखान (कायमखानी) भूपति के अनन्त रत्नों के संग्रह को छीन लिया। उसने कासली को अचानक जीत लिया। कासली, सीकर के दक्षिण में ९ किमी दूरी पर है। उस समय इस पर सम्भवतः चन्देलों का राज्य था जो पहले चौहानों के सामन्त थे पर उनके कमजोर पड़ने पर स्वतंत्र हो गए थे। रेवासा, कसली और संभवत: खाटू के आसपास का प्रदेश इनके अधिकार में था। खंडेले में उस समय निर्वाणों का राज्य था। महाराणा के दुन्दुभियों के जयघोष से धुंखराद्रि (धोकर) गूँज उठा। आकर्ण पर्यन्त (कान तक) खेंचे हुए धनुष के बाणों के समूह से अरदिल को नष्ट करते हुए महाराणा ने आगे बढकर खण्डेले के दुर्ग को खण्ड-खण्ड कर डाला। इस प्रकार इस हमले के क्रम में कुम्भा ने शेखावाटी के अनेक स्थानों को पददलित कर दिया।