कुमाऊँनी होली

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उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में होली का त्यौहार एक अलग तरह से मनाया जाता है, जिसे कुमाऊँनी होली कहते हैं।[1][मृत कड़ियाँ] कुमाऊँनी होली का अपना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व है। यह कुमाऊँनी लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है, क्योंकि यह केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का ही नहीं, बल्कि पहाड़ी सर्दियों के अंत का और नए बुआई के मौसम की शुरुआत का भी प्रतीक है, जो इस उत्तर भारतीय कृषि समुदाय के लिए बहुत महत्व रखता है।

होली का त्यौहार कुमाऊँ में बसंत पंचमी के दिन शुरू हो जाता है। कुमाऊँनी होली के तीन प्रारूप हैं; बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली। इस होली में सिर्फ अबीर-गुलाल का टीका ही नहीं होता, वरन बैठकी होली और खड़ी होली गायन की शास्त्रीय परंपरा भी शामिल होती है। बसंत पंचमी के दिन से ही होल्यार प्रत्येक शाम घर-घर जाकर होली गाते हैं, और यह उत्सव लगभग २ महीनों तक चलता है।

शशि भूषण मैठाणी पारस - एक समय ऐसा था जब पूरे पहाड़ में होली की एक समान परंपरा थी । होली महीनेभर का जश्न होता था पहाड़ वासियों के लिए । होली बड़े ही प्यार, आदर, सम्मान व बड़ों से आशीर्वाद प्राप्त करने का पर्व था । एक ऋतु के आगमन दूसरी ऋतु के विदाई का पर्व भी होली को माना जाता है । समय बदलता गया, पहाड़ों से पलायन होता चला गया, गांव के गांव वीरान होते चले गए । और नब्बे के दशक तक आते-आते उत्तराखंड के एक हिस्से गढ़वाल मण्डल से करीब करीब होली का पर्व अपनी मूल परम्परा से पिछड़ते चला गया । इक्कसवीं सदी आते-आते गढ़वाल की होली किस्से कहानियों व मंचों में सिमटने लगी । जबकि हमारे दूसरे मण्डल कुमायूं के रहवासियों ने बदलते जमाने के साथ कदमताल करने के साथ-साथ अपने पहाड़ की अनूठी होली के कलेवर को पुराने अंदाज में जीवित रखा है । और आज भी कुमायूँ मण्डल के घर-घर में होली पर्व को बेहद ही पारंपरिक ढंग से मनाया जाता है । जिस कारण देश और दुनियाँ में मथुरा व ब्रज की होली के बराबर ही कुमाऊनी होली की भी चर्चा खूब होती है । लेकिन अच्छी बात यह भी है कि अब 2021 आते-आते एक बार फिर से गढ़वाल के कई क्षेत्रों में भी होली अपने पारंपरिक स्वरूप में मनाई जाने लगी है । खड़ी होली बैठकी होली यहा गढ़वाल की खूब चर्चित हुआ करती थी । उम्मीद है कि एक बार फिर से पूरे पहाड़ में होली अपने अनूठे अंदाज व पहचान के साथ मनाई जाएगी । वैसे उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पहाड़ के लोग एक बार फिर बड़ी तेजी से वापस अपनी परम्पराओं को अपनाने लगे हैं । यह सुखद एहसास भी है । ◆ शशि भूषण मैठाणी पारस, संस्कृति प्रेमी । (Shashi Bhushan Maithani Paras 7060214681 )

उत्पत्ति[संपादित करें]

कुमाऊँनी होली की उत्पत्ति, विशेष रूप से बैठकी होली की संगीत परंपरा की शुरुआत तो १५वीं शताब्दी में चम्पावत के चन्द राजाओं के महल में, और इसके आस-पास स्थित काली-कुमाऊँ, सुई और गुमदेश क्षेत्रों में मानी जाती है। बाद में चन्द राजवंश के प्रसार के साथ ही यह सम्पूर्ण कुमाऊँ क्षेत्र तक फैली। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में तो इस त्यौहार पर होली गाने के लिए दूर दूर से गायक आते थे।

प्रकार[संपादित करें]

बैठकी होली[संपादित करें]

बैठकी होली पारम्परिक रूप से कुमाऊँ के बड़े नगरों में (मुख्यतः अल्मोड़ा और नैनीताल में) ही मनाई जाती रही है। बैठकी होली बसंत पंचमी के दिन से शुरू हो जाती है, और इस में होली पर आधारित गीत घर की बैठक में राग रागनियों के साथ हारमोनियम और तबले पर गाए जाते हैं। इन गीतों में मीराबाई से लेकर नज़ीर और बहादुर शाह ज़फ़र की रचनाएँ सुनने को मिलती हैं। ये बैठकें आशीर्वाद के साथ संपूर्ण होती हैं जिसमें मुबारक हो मंजरी फूलों भरी..। या ऐसी होली खेले जनाब अली...जैसी ठुमरियाँ गाई जाती हैं। कुमाऊं के प्रसिद्द जनकवि गिरीश गिर्दा ने बैठकी होली के सामाजिक शास्त्रीय संदर्भों के बारे में गहराई से अध्ययन किया है, और इस पर इस्लामी संस्कृति और उर्दू का असर भी माना है।

खड़ी होली[संपादित करें]

खड़ी होली बैठकी होली के कुछ दिनों बाद शुरू होती है। इसका प्रसार कुमाऊँ के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलता है। खड़ी होली में गाँव के लोग नुकीली टोपी, कुरता और चूड़ीदार पायजामा पहन कर एक जगह एकत्रित होकर होली गीत गाते हैं, और साथ साथ ही ढोल-दमाऊ तथा हुड़के की धुनों पर नाचते भी हैं। खड़ी होली के गीत, बैठकी के मुकाबले शास्त्रीय गीतों पर कम ही आधारित होते हैं, तथा पूर्णतः कुमाऊँनी भाषा में होते हैं। होली गाने वाले लोग, जिन्हें होल्यार कहते हैं, बारी बारी गाँव के प्रत्येक व्यक्ति के घर जाकर होली गाते हैं, और उसकी समृद्धि की कामना करते हैं।

महिला होली[संपादित करें]

महिला होली में प्रत्येक शाम बैठकी होली जैसी ही बैठकें लगती हैं, परन्तु इनमें केवल महिलाएं ही भाग लेती हैं। इसके गीत भी प्रमुखतः महिलाओं पर ही आधारित होते हैं।

अनुष्ठान[संपादित करें]

चीड़ बन्धन तथा चीड़ दहन[संपादित करें]

होलिका दहन के लिए कुमाऊँ में छरड़ी से १५ दिन पहले ही चीड़ की लकड़ियों से होलिका का निर्माण किया जाता है, जिसे चीड़ बंधन कहते हैं। प्रत्येक गांव अपने अपने चीड़ की सुरक्षा में लग जाते हैं, क्योंकि प्रतिद्वंद्वी गाँव के लोग दूसरों की चीड़ चुराने की कोशिश करते हैं। होली से एक रात पहले चीड़ को जलाया जाता है, जिसे चीड़ दहन कहा जाता है। चीड़ दहन प्रह्लाद की हिरण्यकशिपु के विचारों पर जीत का प्रतीक माना जाता है।

छरड़ी[संपादित करें]

छरड़ी (धुलेंडी) के दिन लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं। ऐतिहासिक तौर पर इस क्षेत्र में छरड़ से होली मनाई जाती थी, जिस कारण इसे छरड़ी कहा जाता था। छरड़ बनाने के लिए टेसू के फूलों को धूप में सुखाकर पानी में घोला जाता था, जिससे नारंगी-लाल रंग का घोल बनता था, जो छरड़ कहलाता था।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  • एटकिंसन, एडविन टी (१९७४). Kumaun hills [कुमाऊंनी पहाड़ियां] (अंग्रेज़ी में). दिल्ली: कॉस्मो प्रकाशन.
  • पाण्डेय, बद्री दत्त (१९३७). कुमाऊं का इतिहास. अल्मोड़ा: श्याम प्रकाशन.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]