किशोर काबरा

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डॉ॰ किशोर काबरा (जन्म : २६ दिसम्बर १९३४) हिन्दी कवि हैं। साठोत्तरी हिन्दी-कविता के शीर्षस्थ हस्ताक्षरों में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। काबरा जी मूलत: कवि हैं, साथ ही निबन्धकार, आलोचक, कहानीकार, शब्द-चित्रकार, अनुवादक एवं संपादक भी हैं। आपक की गद्य-प्रतिभा लघुकथाओं और प्रबंध-काव्यों तक व्याप्त है। आपका कवित्व कवि-सम्मेलनों के श्रोताओं से लेकर पाठकों की हृदयभूमि तक प्रतिष्ठित है।

जीवन परिचय[संपादित करें]

मध्य प्रदेश के मालव-अंचल में रचे-बसे मंदसौर नगर की काली मिट्टी किशोर काबरा की जन्मभूमि है। 26 दिसम्बर 1934 को 'नंदकिशोर' नाम के बालक ने काबरा परिवार में जन्म लिया। इसी बालक ने 'किशोर काबरा' के नाम से हिन्दी-भाषा-साहित्य में एम.ए., पी-एच.डी. और साहित्यरत्न की पदवियां प्राप्त की। स्नातकोत्तर अध्यापक एवं उपाचार्य पद पर वर्षो तक रहने के बाद आपने केन्द्रिय विद्यालय संगठन से स्वैच्छिक त्यागपत्र दे दिया और एकांत एवं अनन्य भाव से साहित्य-साधना में प्रवृत्त हो गये। शिल्प, कथ्य एवं विधा की दृष्टि से विपुल साहित्य की रचना करने वाले काबरा जी को देश के कोने-कोने से कई साहित्यिक संस्थानों द्वारा समादृत एवं पुरस्कृत किया गया है। साहित्यकला श्री, साहित्य शिरोमणि, साहित्य श्री, पत्रकार श्री, विद्यावाचस्पति जैसी मानद पदवियों से आप समलंकृत हैं। नि:संदेह डॉ॰ किशोर काबरा सच्चे अर्थो में सारस्वत हैं और मां भारती के अनुपम कंठहार हैं।

कृतियाँ[संपादित करें]

श्री किशोर काबरा प्रणीत 'उत्तर महाभारत' एक गरिमामंडित प्रबंध-कृति है। कलात्मकता, भाव-सौंदर्य, युगबोध एवं गहन जीवन-दृष्टि का सन्निवेश ही इसकी अपनी गरिमा है। उत्तर महाभारत का उपजीव्य भी महाभारत के 17 वें और 18 वें पर्व का आख्यान है। इसकी कथा सात सर्गो में विभक्त है। महाभारत के 18 दिवसीय विध्वंसकारी युद्ध के अनंतर अवशिष्ट पांच पांडवों के हिमालय-प्रस्थान की कथा-काव्य, दर्शन और मनोविज्ञान के त्रिवेणी-संगम पर कही गयी है।

कवि ने उत्तर महाभारत में अतीत के बीजों को वर्तमान की भूमि पर भविष्य के लिए बोने का प्रयास किया है। प्रत्येक पांडव एक तटस्थ दार्शनिक की भांति महाप्रयाण की बेला में अपने पूर्व-कृत कर्मो का पर्यवेक्षण करता है। पांडवों के आत्मालोचन का यह अंश कवि की नितान्त मौलिक उद्भावना है। स्वयं कवि का कथन है - उत्तर महाभारत अर्थात षटविकारों के शमन और षड़दर्शन की प्राप्ति का बिंबात्मक आख्यान है। वस्तुत: यह छह व्यक्तियों के स्वभाव-वैचित्र्य का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है।

'उत्तर रामायण' भी पांच सर्गो में विभक्त महाकाव्य स्तर का गरिमायुक्त प्रबंध-काव्य है, जिसमें कवि ने रामकथा से संबंधित कुछ शाश्वत प्रश्नों के समाधान खोजने का प्रामाणिक प्रयत्न किया है। कवि ने अपनी प्रासादिक एवं प्रवाहयुक्त भाषा-शैली में इस महाकाव्य की रचना की है।

निश्चय ही उत्तर रामायण में रूपायित रामकथा न तो आक्षेप-कथा है, न क्षेपक-कथा है और न ही कोई कलंक-कथा है। यह तो नि:संदेह सीता-राम की गौरव-गाथा का युग-सापेक्ष पुनर्मूल्यांकन है। स्वयं कवि के मतानुसार, यह मानव की पूर्णता-यात्रा में विश्व-इतिहास के सबसे बड़े त्याग, बलिदान एवं तिरोहित होने की संघर्षपूर्ण और उतार-चढ़ाव वाली तथा मानव-मन के कई योगों से भरी परीक्षा-कथा है।

डॉ॰ किशोर काबरा प्रबंध-चेतना के सशक्त कवि हैं। इनके पांचों प्रबंध-काव्य हिन्दी-जगत के पर्याप्त चर्चित-समादृत एवं पुरस्कृत हुये हैं। सभी प्रबंध-काव्यों में कवि की सूक्ष्म काव्य-दृष्टि एवं गंभीर मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि के दर्शन होते हैं। डॉ॰ घनश्याम अग्रवाल ने यथार्थ ही लिखा है कि डॉ॰ धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, दुष्यन्तकुमार के साथ ही डॉ॰ काबरा का नाम इन प्रबंध-काव्यों के संदर्भ में आदर के साथ लिया जा सकता है।.... वे निश्चय ही आधुनिक काल के आठवें दशक के उत्तम प्रबंध कवि हैं। (डॉ॰ किशोर काबरा: व्यक्तित्व एवं कृतित्व, पृ.49)

डॉ॰ काबरा-रचित खंडकाव्य 'परिताप' के पांच क्षण महाभारत के अमर पात्र भीष्म पितामह के मनस्ताप एवं परिताप पर आधारित है। कवि ने प्रस्तुत खंडकाव्य में आजीवन अविवाहित रहने की भीष्म प्रतिज्ञा का पुनर्मूल्यांकन तो किया ही है, साथ ही मनोवैज्ञानिक सत्य के प्रकाश में उनके परंपरागत उज्ज्वल चरित्र पर एक जबर्दस्त प्रश्न-चिन्ह भी लगा दिया है। महाभारत युद्ध के अनंतर कुरूक्षेत्र की रणभूमि में शरशैया पर लेटे हुये मुमूर्ष भीष्म पितामह असह्य मनस्ताप से आक्रांत हैं और अनेक अंतर्विरोधों के बीच तड़प रहे हैं। उनके लिए जीवन पाप और मरण अभिशाप हो गया है। आखिर ऐसा क्यों? इसलिए कि भीष्म ने अपने रूग्ण और क्षतवीर्य सौतेले भाई विचित्रवीर्य के लिए काशीराज की तीनों राजकुमारियों (अंबालिका, अंबिका, अंबा) का अपहरण करके भारी अदूरदर्शिता का परिचय दिया था। इनमें से दो को क्रमश: प्राप्त हुये पांडुरोगग्रस्त पुत्र और अंधा पुत्र। कहीं की नहीं रही तो अंबा। भीष्म ने उसे अपनी प्रतिज्ञा के बहाने ठुकरा दिया, फलस्वरूप वह आजीवन प्रणय और प्रतिशोध की आग में जलती रही। भीष्म को भी अंबा के प्रति अन्याय का भीषण परिताप है। भीष्म के इसी परिताप के माध्यम से कवि ने एक और उपेक्षित नारी अंबा का उद्धार किया है।

डॉ॰ काबरा प्रणीत खंडकाव्य 'धनुष-भंग' का प्रेरणा-स्रोत रामायण है। धनुष-भंग का संपूर्ण कथानक पांच विस्फोटों, किवां पांच सर्गो में विभक्त है। एक युगदृष्टा कवि के अनुरूप काबरा जी ने प्रस्तुत खंडकाव्य में रामायण की एक सूक्ष्म मिथकीय परिकल्पना के सहारे युग-बोध का सन्निवेश किया है। श्रीराम का वरण करने के लिए सीता अपने हाथों में वरमाला लिये खड़ी है। सीता के पलक झपकने के केवल एक क्षण को कवि ने व्यापक युग-संदर्भो में देखा है। पिछली इक्कीस पीढ़ियों से चलने वाली धनुष और हल की कहानी को प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करना ही इस खंडकाव्य का उद्देश्य है।

कविवर काबरा जी के खंडकाव्य 'नरो वा कुंजरो वा' का उत्स भी महाभारत की कथा में मिलता है। इस खंडकाव्य के नायक द्रोणाचार्य हैं। ये वे द्रोण हैं, जिन्होंने अपने पुत्र अश्वत्थामा को दूध के स्थान पर आटा घोल-घोल कर पिलाया था। उसी अश्वत्थामा की मृत्यु का समाचार सुनते ही द्रोण उच्छिन्न वृक्ष की तरह धराशायी हो गये, क्योंकि नर-कुंजर की अनिश्यात्मक मनोदशा में वे पुत्र-वियोग का आघात सह न सके। कवि के सम्मुख द्रोण का व्यक्तित्व एक प्रश्न के रूप में टिका हुआ था। नरो वा कुंजरो वा खंडकाव्य में अर्द्धसत्य पर टिके हुये द्रोणाचार्य के जीवन-दर्शन की वह प्रतीक कथा है, जो दूध के मुहाने से प्रारंभ होकर रक्त के महासागर पर समाप्त हो जाती है।

'जलते पनघट : बुझते मरघट' डॉ॰ काबरा की इक्यावन कविताओं का संकलन है। इसमें कुछ कविताएं मुक्तछंद में भी लिखी गयी हैं। कविताओं में कवि के कटु-मधुर अनुभवों की प्रतिध्वनियां स्पष्ट सुनाई पड़ती हैं। आधुनिकता के नाम पर समाज और देश में व्याप्त प्रवंचना, कुंठा और अनास्था के बावजूद इन कविताओं में कवि ने आस्था और विश्वास के गीत गाए हैं।

'सारथि, मेरे रथ को लौटा दे' में कवि का कवित्व तीन धुरियों अर्थात् कविता, गीत और गजल के तीन रंगों में अभिव्यक्त हुआ है। इस संकलन की कविताओं का परिदृश्य अपेक्षाकृत अधिक व्यापक है, जिसमें धर्म, समाज, राजनीति, जीवन, साहित्य आदि में व्याप्त कुत्साओं और अनिष्टों की स्पष्ट विवृति परिलक्षित होती है। संग्रह की लंबी कविता 'सारथि मेरे रथ को लौटा दे' आधुनिक-बोध से अनुप्राणित एक सशक्त और उल्लेखित कविता है।

'टूटा हुआ सागर' की कविताओं में कवि की बलवत्तर अनुभूतियों एवं प्रौढ भाषा-शिल्प के दर्शन होते हैं। व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के प्रति कवि का दायित्व बोध यहां और भी तीव्र रूप में व्यक्त हुआ हे। जीवन के कारागार में कैद आज के आदमी की तस्वीर को कवि ने कितने मर्मस्पर्शी रूप में अंकित किया है :

मैं एक
निचुड़े हुये कपड़े की तरह
बरामदे के किसी कोने में अलगनी पर
टांग दिया गया हूं।' (राख की पर्त दर पर्त, पृ.11)

शहर की विषाक्त सभ्यता और उसमें सरापागर्क नागरिकों के प्रति कवि का यह चुटीला व्यंग्य देखिए और अज्ञेयजी की 'सांप' शीर्षक कविता का स्मरण कीजिए :

अच्छा है तुम्हारा नगर
अच्छे हैं तुम्हारे नागरिक
एक बात बताओ दोस्त
यह नागरिक 'नाग'से ही बना है न?' (नागरिक पृ. 21)

'ऋतुमती है प्यास' विशुद्ध गीत-संग्रह है, जिसमें उपमालंकार एवं लाक्षणिक प्रयोगों से समलंकृत प्रकृति का चित्रोपम एवं बिंबात्मक चित्रण देखते ही बनता है।

'हाशिए की कविताएं' काव्य-संकलन को प्रबंधकार डॉ॰ काबरा के कवि-कर्म का उपोत्पाद कहा जा सकता है। इसमें कवि की 301 क्षणिकाएं ग्रंथस्थ हैं, जो वस्तुत:, प्रबंध-रचना के दौरान कवि के हृदय में उत्पन्न समसामयिक बोध से संबंधित चिंतन-कणिकाएं हैं।

'किशोर-सतसई' 707 दोहों का संग्रह है। संस्कृत और प्राकृत को छोड़ भी दें तो हिन्दी में मध्ययुग से लेकर आज तक सतसई की एक अक्षुण्ण परंपरा दृष्टिगत होती है। 'किशोर सतसई' उसी सुदीर्घ परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। काबराजी दोहा छंद की शक्ति से सुपरिचित हैं। नई पीढ़ी की नियति का इससे सहज, सुंदर और संक्षिप्त किन्तु पूर्ण चित्र और क्या होगा?

सतसई के सात सोपानों में मानो कवि ने जगाीवन-संबंधी अपना विराट अनुभव व्यक्त कर दिया है। दोहा जैसा प्राचीन छंद स्वीकार करके उसमें कथ्य और शिल्प का नावीन्य संपूर्ण अर्थ-गौरव के साथ संजो पाना डॉ॰ किशोर काबरा जैसे युगधर्मी एवं सिद्धहस्त कवि के बूते की ही बात है।

'मैं एक दर्पण हूं' कवि का नवीनतम कविता-संग्रह है। प्रस्तुत संग्रह की कविताओं में भावों के टटकापन है तो व्यंग्य का चुटीलापन भी है। कविता चाहे सामाजिक बोध से अनुप्राणित हो या वैयक्तिक चेतना से संयुक्त हो, किन्तु कवि की एक गहरी जीवन-दृष्टि सर्वत्र जुड़ी रहती है।

शैली[संपादित करें]

रस-परिपाक, गुण-गरिमा, लाक्षणिक प्रयोग, बिंब-योजना एवं प्रतीक-विधान आदि की दृष्टि से काबरा जी की कविता समृद्ध है। व्यंग्य तो उनकी कविता का प्राण-तत्व है। काबरा जी की कविता की केंद्रवर्ती विशेषता है उनका मानवतावादी दृष्टिकोण और मानव-मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए उनकी निरन्तर चिंता। यही कारण है कि वे अपनी कविता के लिए कथ्य चाहे सुदूर अतीत के पुराख्यानों से ढूंढकर लाते हों या अपने आसपास के परिवेश से ग्रहण करते हों, किन्तु उसके केंद्र में तो मनुष्य ही रहता है। आज के मानव की समस्याओं को पूरी ईमानदारी और निष्ठा से रूपायित करना वे अपनी रचनाधर्मिता और अपना युगधर्म स्वीकार करते हैं।

कहा गया है कि 'गद्य कवीनां निकषं वदन्ति'। पद्य के साथ-साथ गद्य में भी उसी अधिकार और क्षमता से लिखने वाले डॉ॰ काबरा जी का गद्य-लेखन, बाल-साहित्य से लेकर निबंधों एवं शोध-प्रबंधों जैसे प्रौढ़-साहित्य तक परिव्याप्त है। आपका प्रथम गद्य-ग्रंथ सन् 1975 में प्रकाशित शोध-प्रबंध 'रीतिकालीन काव्य में शब्दालंकार' है। इस ग्रंथ में काबरा जी ने वैदिक काल से अद्यावधि शब्दालंकारों का वैज्ञानिक पर्यवेक्षण प्रस्तुत किया है। यही बात साहित्यिक निबंध के संबंध में भी शत-प्रतिशत सही है। स्वयं काबरा जी का विधान अपने इस निबंध-संग्रह के सबंध में उद्धरणीय है - इसमें कवि है, कलम है, कागज है। इसमें जीवन है, जगत है, जगन्नियंता है। गद्यकार काबरा जी के गद्य-शिल्प का सर्वाधिक मनोहर रूप हमें उनकी लघुकथाओं में देखने को मिलता है। ये लघुकथाएं वस्तुत: काबरा जी के गद्य की उस शिल्पगत चेष्टा के दर्शन कराती हैं जिसमें उन्होंने 'एक चुटकी आसमान' को, 'एक टुकड़ा जमीन' को और 'बूंद-बूंद कड़वा सच' को समेटना चाहा है। आपकी कई लघुकथाएं अपने समकालीन बोध, टटकेपन और चुटीलेपन के कारण उर्दू के सआदत हुसैन मंटों की याद दिलाती हैं।

डॉ॰ किशोर काबरा की अखंड काव्य-साधना ने क्षणिका से खंड-काव्य और मुक्तक से महाकाव्य तक की सफल यात्रा की है। उनकी काव्य-साधना की सफलता का यह सबसे बड़ा प्रमाण है कि हिन्दी के मूर्धन्य कवियों और सुप्रसिद्ध साहित्यकारों ने उनकी काव्य-कला की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है। श्री नरेश मेहता और चंद्रकांत बांविवडेकर कवि के प्रतीकों-रूपकों पर मुग्ध हैं तो सुधी समीक्षक डॉ॰ कुमार विकल डॉ॰ काबरा की प्रबंध-पटुता एवं मिथक-योजना पर न्यौछावर है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]