काफ़ि़र

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Kafirs of Natal - काफ़िर से संबंधित एक पुस्तक

काफिर (अरबी كافر (काफिर); बहुवचन كفّار कुफ्फार) इस्लाम में अरबी भाषा का बहुत विवादित शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ - "अस्वीकार करने वाला" या "ढ़कने वाला" होता है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] इस शब्द को अपमानसूचक माना जाने लगा है; इसी लिये कुछ मुस्लिम इसके स्थान पर "गैर-मुस्लिम" शब्द का प्रयोग करने की सलाह देते हैं।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

इस्लाम के मजहबी साहित्य (कुरान, हदीथ, आदि) का बहुत बड़ा हिस्सा काफिर के बारे में और काफिरों के साथ कैसा व्यवहार किया जाय, इसको लेकर लिखा गया है। कुरान का लगभग 64% भाग काफिरों से सम्बन्धित है; शिरा का 81% भाग में इसी बात का वर्णन है कि इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद काफिरों के साथ कैसे निपटे थे; हदीथ का लगभग 32% भाग काफिरों या कुफ्र के बारे में है। इस प्रकार इन तीनों का औसतन 60% भाग काफिरों या कुफ्र के बारे में है।[1]

विभिन्न प्रकार के काफ़िर[संपादित करें]

प्रायः इस्लाम का पूरा सिद्धान्त उसके छः विश्वास-सूत्रों के सार रूप में बताया जाता है, जो निम्नलिखित हैं-

  1. तौहीद : यानी ऍकेश्वरोपासना, एक अल्लाह पर ईमान या विश्वास रखना।
  2. मलाइका : देवदूत पर विश्वास रखना।
  3. इस्लामी पवित्र पुस्तकों पर विश्वास रखना। [2][3]
  4. इस्लामी पैग़म्बरों या प्रेशितों पर विश्वास रखना।
  5. तक़दीर या विधी या भाग्य पर विश्वास रखना।
  6. यौम अल-क़ियामा या पुनर्जीवन के दिन पर विश्वास रखना।

इनमें से पहले पांच का उल्लेख कुरान में आया है। सलाफी विद्वान मोहम्मद तकी-उद-दीन-अल-हिलाली के अनुसार उपरोक्त किसी भी बात पर जो कोई विश्वास नहीं रखता तो वह "कुफ्र' का दोषी है। उन्होने अनेक प्रकार के प्रमुख कुफ्र गिनाए हैं-

  1. कुफ्र-अल-तकधीब : अलौकिक सत्य को अस्वीकारना या छः विश्वास सूत्रों में से किसी को नकारना (quran 39:32)
  2. कुफ्र-अल-इबा वत-तक्कबुर मा'अत-तस्दीक : refusing to submit to God's Commandments after conviction of their truth (quran 2:34)[46]
  3. कुफ्र-अश-शक्क वज़-ज़ान : doubting or lacking conviction in the six articles of Faith. (quran 18:35–38)[46]
  4. कुफ्र-अल-इ'रादह : turning away from the truth knowingly or deviating from the obvious signs which God has revealed. (quran 46:3)[46]
  5. कुफ्र-अल-निफ़ाक़ : hypocritical disbelief (quran 63:2–3

कुफ्र का दण्ड[संपादित करें]

  • (१) फिर, जब पवित्र महीने बीत जाऐं, तो ‘मुश्रिकों’ (मूर्तिपूजकों ) को जहाँ-कहीं पाओ कत्ल करो, और पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। ( कुरान मजीद, सूरा 9, आयत 5)[4]
  • (२) जिन लोगों ने हमारी ”आयतों” का इन्कार किया (इस्लाम व कुरान को मानने से इंकार) , उन्हें हम जल्द अग्नि में झोंक देंगे। जब उनकी खालें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल देंगे ताकि वे यातना का रसास्वादन कर लें। निःसन्देह अल्लाह प्रभुत्वशाली तत्वदर्शी हैं” (कुरान सूरा 4, आयत 56) [5]
  • (३) ईसाइयों और यहूदियों के साथ मित्रता मत करो (सूरा 5, आयत 51)।
  • (४) काफिरों को जहाँ पाओ, उनको जान से मार दो (सूरा 2, आयत 191)।
  • (५) ईमान वालों, अपने आस-पास रहने वाले काफिरों के साथ युद्ध करो। उनको तुम्हारे अन्दर कटुता दिखनी चाहिए। (सूरा 9, आयत 123)

इसी तरह की सैकड़ों आयतों में इस्लाम या उसके सिद्धान्तों में विश्वास न करने वालों के साथ हिंसा का उपयोग करने की सलाह दी गयी है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]