कातंत्र व्याकरण

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  • सिद्धो वर्णो ( कातंत्र व्याकरण)*
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	सरिता पत्रिका में वर्णित मूल ‘ सिद्धो वर्णो’ और लोक-प्रचलित ‘सीधो वरणो’ का तुलनात्मक विश्लेषण
(नेट पर सातवाहन युग में शर्व वर्मा का  यह कातंत्र-व्याकरण *ऐंद्र व्याकरण* के तहत माना गया है!) 
	(पं. शर्व वर्मा का *कातंत्र- व्याकरण* पाणिनी की अष्टाध्यायी का सरल विकल्प)	लोक-परंपरा में प्रचलित *सीधो वरणा पाटी*  के कुछ उपलब्ध अपभ्रंश, विकृत और हास्यास्पद अंश| 
	सरिता पत्रिका 1980 में वर्णित मूल ‘ सिद्धो वर्णो’ 	 मेरे द्वारा अपने व्याकरण-ज्ञान की सीमा में प्रस्तावित अर्थ-संकेत भी दिये हैं और लोक-प्रचलित *सीधो वरणो* के कुछेक स्फुट वाक्यांश सही रूप के सामने ही 'लोक-प्रचलित रूप' लिखकर दिये हैं! 

जो मेरे स्वर्गीय पिताजी श्री नारायणरामजी पुत्र श्री भोमाजी, साँकड (ग्रामीण किसान) द्वारा लौकिक रूप में बताये थे और जिनका सत्यापन उनके गुरु स्वर्गीय श्री पीतांबर जोशी से भी किया गया!

आप उन दोनों रूपों से मिलान करेंगे, तो आपको हँसी छूट जाएगी।


दरअसल, लोक परम्परा में *सीधो' यानी भोजन सामग्री जुटाने का ' शास्त्र-सम्मत' तरीका* बताया गया है।

उसे ही हमारे ग्रामीण पूर्वजों ने पढा और अपने शिष्यों को भी आगे से आगे हमें 1957 तक पढाया।

इसी से हमारी लोक भाषा-संस्कृति का निर्माण हुआ!

हम उन बुजुर्ग पूर्वजों के ऋणी हैं, जो इन संस्कृति के बीजों को सुदामा की पोटली की तरह अपनी काँख में दबाये हमें सुपुर्द कर गये! हम उनकी भेंट को आने वाली पीढियों की अमानत के रूप डिजिटल अमरता प्रदान करके ही उऋण हो सकते हैं!

शुद्ध रूप में " तत्र चतुर्दषायौ स्वरा। दश समाना। " के लोक-प्रचलित रूप ( दहु सवेरा। दसे समाना।) था और उसका अर्थ यह बताया जाता कि *बरसात के दिनों में दो महीनें जल्दी उठकर काम में लगने वाला , आगे के 10 महीनों के 'सीधे' यानी 'रसोई के सामान' का जुगाड कर सकता है!*

मैंने उन परम्परागत गुरुओं से सम्पूर्ण  *सीधो वरणो*  का अर्थ बताने का आग्रह किया है, तो कहा गया कि यह सब खेती-बाडी के बारे में है।  

फिर ये तो वेद-शास्त्रों की बातें हैं, ये साधारण आदमी (खासकर किसानों) की समझ से परे है! इसलिये जो कुछ और जितना बताया जाए, उस पर कभी कोई तर्क और सवाल नहीं करना चाहिए!

मुझे भी धमकाया गया कि " शास्त्रों में स्पष्ट आज्ञा है कि "तर्क करने वाला नष्ट हो जाता है!

( तर्कबुद्धि विनिश्यते।) " 

तो आओ, अब हम तो निडर होकर पूरे ‘ *सीधो वरणो* ’ के असली और शास्त्र-सम्मत रूप से परिचित होते चलें।

हाँ, यह भी ध्यान में रखें कि उस समय के  लोक-प्रचलन और महाजनी में  तथा *शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा और माध्यन्दिन शाखा* के तहत ' ष' को 'ख' बोला जाता था। 

अथ! शर्व वर्मा का *कातंत्र- व्याकरण* (सिद्धोवर्णो पाटी)

1) ऊँ नमः सिद्धम्। सिद्धो वर्ण समान्माय। ।1।

समाम्नाय -निघंटु है!
 लोक-प्रचलित रूप  - (सिद्धो वर्णो समैमनाया।) 	 	

2)| तत्र चतुर्दषायौ स्वरा। । 2। -

( अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ लृ लृ ृ ऋ )

लोक-प्रचलित रूप - ( जय जय चतुरकदसा । )


3)| दश समाना। । 3 । ( अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ, ये दस समान हैं)

लोक-प्रचलित रूप - ( दहु सवेरा। दसे समाना।)


4 ) तेषु दवौ द्वावन्यौन्यस्य सवर्णो 4।

( दो दो एक दूसरे के सवर्ण हैं, जैसे अ, आ का सवर्ण, इ, ई का)

लोक-प्रचलित रूप - ( तकाउ दुधवा वरणा वरणो, वरणा नसीस वरणा)

5 पूर्वो ह्रस्वः परो दीर्घाः । 5।

( पूर्व वर्ण ह्रस्व तथा बाद का वर्ण दीर्घ है।)	

लोक-प्रचलित रूप -

  (  पुरवो रसवा, पारो दुरषा ।) 


6) स्वरो वर्ण वर्गो नामी। । 6। लोक-प्रचलित रूप - (सारो वरणा, )

7) एकारादिनाम् सांध्याक्षराणि।

।7!    	( अ  +  इ =  ए )	

लोक-प्रचलित रूप- ( इकरादेणी सिंध कराणी।)


8) कादिनि व्यंजनानि। ।8।

	( क आदि व्यंजन हैं।)

लोक-प्रचलित रूप- (कादीणी विणजैनामी)

9 ) ते वर्गो पंचः पंचः। ।9। ( पाँच-पाँच वर्णों के 5 वर्ग हैं )

लोक-प्रचलित रूप-

(ते वर्गो पंचो पंचिया) 

10 ) वर्णानाम् प्रथम द्वितीय,श ष स श्च अघोषा।10।

( वर्णों में प्रथम और द्वितीय तथा शषस अघोष हैं)

11) घोषवंतो अन्य। 11 ।

 	( शेष अन्य *गघ,जझ,डढ,दध*  घोष वर्ण हैं। 
 लोक-प्रचलित रूप -(10,11,12  गोषागोष पथोरणी।) 


12 ) अनुनासिका ङ ञ ण न म । 12 ।

(ङ ञ ण न म इत्यादि अनुनासिक हैं।) लोक-प्रचलित रूप -

(  निनाणै रा नषाँ।)


13 ) अन्तस्थ य र ल व । 13 ।

( य र ल व अंतस्थ वर्ण हैं।)

लोक-प्रचलित रूप - (अंतसथ यरलव।) नोट- यही काफी मिलता-जुलता है!

14)| उष्माणं श ष स ह ।

( श ष स ह उष्म वर्ण हैं।)

लोक-प्रचलित रूप-

( संकोसह हंसिया उस्मल )

15 ) अः इति विसर्गनियम्।

(अः विसर्ग है।) ( नोट - इसके बाद के लोक-प्रचलित अपभ्रंश रूप उपलब्ध ही नहीं)

16) क इति जिव्हामूलीय।

( क वर्ग जीभ के मूल यानि कंठ से बोला जाता है।)	

17) ष इति मूर्धन्यम्। ( ष मूर्धा से बोला जाता है, मूर्धन्य है।)

18 ) अं इति अनुस्वार। ( अं अनुस्वार है।)

19 ) पूर्वाषयोरथोपलब्धो पदमश। ( यह पद प्रयास के बावजूद अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ )

20 ) व्यंजन स्वरं पद वर्णन्यूत।

21) अनतिक्रमयत विश्लेषयेत्।

22 ) लोको यथा ग्रहणसिद्धि।

इति सादर!

विनीत प्रस्तोता -

मंगलाराम विश्नोई श्री नारायणरामजी कडवासरा, साँकड, साँचोर, _राजस्थान, 21-2-2019 

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