कवींद्राचार्य सरस्वती

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कवीन्द्राचार्य सरस्वती ब्रजभाषा के कवि थे। सत्रहवीं शताब्दी में भारत में जो श्रेष्ठ तथा दिग्गज आचार्य कवि हुए उनमें कवींद्राचार्य सरस्वती का नाम विशेष उल्लेखनीय है। दक्षिण में गोदावरी के तीर पर एक गाँव में ऋग्वेदीय आश्वलायन शाखा के ब्राह्मण कुल में जन्मे कवींद्राचार्य के वास्तविक नाम का पता नहीं चलता। 'कवींद्र' इनकी उपाधि है। अद्वैतवेदांती संन्यासी होने के कारण ये 'सरस्वती' उपाधि से विभूषित थे और शाहजहाँ के राज्यकाल में प्रयाग तथा वाराणसी के सबसे प्रधान संन्यासी मठाधीश और काव्यदर्शन तथा वेदवेदांग के मूर्धन्य पंडित थे।

परिचय[संपादित करें]

कवीन्द्राचार्य सरस्वती के मूल नाम के संबंध में कोई प्रामाणिक प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। वे मूलत: महाराष्ट्र के गोदावरी नदी के किनारे स्थित किसी नगर के निवासी थे। यह स्थान 'प्रतिष्ठान' (संप्रति भैठण) कहा गया है। कवींद्राचार्य आश्वलायन शाखा के ऋग्वेदीय ब्राह्मण थे। बाल्यावस्था में उन्हें सांसारिक विषयों से विरक्ति हुई थी जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने बचपन ही में संन्यासाश्रम में प्रवेश किया। उन्होंने जीवन के प्रारंभिक दिनों में वेद-वेदांग, काव्यशास्त्र आदि का गंभीर अध्ययन किया था।

बचपन में संन्यस्त हो ये महाराष्ट्र से वाराणसी चले गए थे। वरुणा के किनारे इनका विशाल मठ था। मठ तो संभवत: इनके ब्रह्मलीन होने के बाद ही यवनों ने ध्वस्त कर दिया, पर वह स्थान आज भी 'वेदांती का बाग' के नाम से प्रसिद्ध है। इस मठ में कवींद्राचार्य ने विशाल पुस्तकालय स्थापित किया था, जिसमें सहस्रों दुर्लभ हस्तलेख थे। इनमें से कई हस्तलेख आज भी बड़ौदा, पूना तथा लंदन के पुस्तकालयों में उपलब्ध हैं। कुछ पर तो मुगल राजकुमार दारा शिकोह के हस्ताक्षर तक मिलते हैं।

कवींद्राचार्य मुगल सम्राट् शाहजहाँ, शाहजादा दाराशिकोह और शाहजादी जहाँनारा के निकट संपर्क में रहे। वे इनका बड़ा सम्मान करते थे, इसके प्रमाण मिलते हैं। कहा जाता है, उन्हें धार्मिक दृष्टि से उदार बनाने में कवींद्र का खास हाथ रहा है। शाहजहाँ ने अपने शासनकाल में हिंदुओं पर यात्राकर लगाया था। तीर्थयात्रा के लिए आए यात्रियों से जबरन करवसूली करने में घोर अत्याचार होता देख कवींद्र वाराणसी के पंडितों और हिंदू जनता के प्रतिनिधि बन आगरा गए थे और वहाँ जब इन्होंने हिंदुओं पर मुस्लिम अधिकारियों द्वारा किए जा रहे अत्याचार का वर्णन किया तो शाहजहाँ बड़े दु:खी हुए और इनके प्रभाव में आकर न केवल उन्होंने शाही फरमान जारी कर यात्राकर बंद कर दिया, अपितु कवींद्र को 'सर्वविद्यानिधान' उपाधि से विभूषित कर जागीर भी बख्शी थी। बाद में समय-समय पर ये आगरा जाते रहे। शाहजहाँ, दारा शिकोह और जहाँनारा के संबंध में इन्होंने ब्रजभाषा में कविताएँ भी लिखी हैं।

इनकी मातृभाषा मराठी होते हुए भी, इन्होंने संस्कृत के अतिरिक्त ब्रजभाषा में भी रचनाएँ की थीं। संस्कृत में इन्होंने ऋग्वेद पर भाष्य लिखा था। 'हंसदूत' नामक दार्शनिक काव्य की रचना की थी। इनकी और भी कई रचनाओं के नाम मिलते हैं, पर प्राय: वे सभी अनुपलब्ध हैं। दंडी के दशकुमारचरित पर इनकी संस्कृत टीका अवश्य प्रकाशित है। इनके फुटकल संस्कृत पद्यों का संग्रह 'कवींद्रकल्पद्रुम' इंडिया आफिस लाइब्रेरी, लंदन में है, पर अप्रकाशित है। योगवासिष्ठ का इन्होंने ब्रजभाषा में अनुवाद भी किया था, पर वह अभी तक नहीं मिल पाया है।

वाराणसी के पंडितों में इनका बड़ा आदर था। फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने वाराणसी के जिन प्रधान पंडित, उनके विद्यालय और पुस्तकालय का बड़े आदर के साथ जिक्र किया है, वे संभवत: कवींद्र ही हैं। वाराणसी तथा प्रयाग के जनसमाज में इनका कितना सम्मान था, इसका प्रमाण तो इसी से चलता है कि यात्राकर हटवाकर जब ये आगरा से वाराणसी लौटे तो प्रयाग और वाराणसी की जनता तथा पंडित समाज ने इनका भव्य अभिनंदन किया था। 'कवीद्रंचंद्रोदय' नाम से लगभग 70 संस्कृत कवियों ने और 'कवींद्रचंद्रिका' नाम से 33 ब्रजभाषा के कवियों ने इन्हें काव्यात्मक अभिनंदन भेंट किए थे। इनमें से प्रथम प्रकाशित हो चुका है।

संदर्भ ग्रंथ[संपादित करें]

  • कृष्णामाचारी : हिस्ट्री ऑव संस्कृत लिटरेचर;
  • डॉ॰ हरदत्त शर्मा संपादित : कवींद्रचंद्रोदय;
  • रानी लक्ष्मीकुमारी संपादित : कवींद्रकल्पलता;
  • मिश्रबंधु विनोद