कल्ला जी राठौड़

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वीर कल्ला जी राठौड (वीर योद्धा क्षत्रिय वंश )

जन्म

वीर कल्ला जी राठौड़ का जन्म १५४४ ई. में (आश्विन शुक्ल अष्टमी वि.सं.१६०१) को सामियाना गांव मेडता, नागौर में हुआ था। इनके पिता का नाम आसशिंह राठौड़ था। ये जयमल मेड़तिया तथा मीरा बाई के भतीजे थे।

परिचय

ये राजस्थान के प्रमुख लोकदेवता है। इनकी कुलदेवी नागणेची मातामें वीर कल्ला जी का सिद्ध पीठ है। कल्ला जी अस्त्र शस्त्र पारंगत होने के साथ औषधि विज्ञान और योग क्रियाओं के ज्ञाता थे। वीर कल्ला जी को चार हाथों वाला देवता, कमधज, बाल ब्रह्मचारी, केहर आदि नामों से भी जाने जाते हैं। इनके भील जाति के भक्त इनकी प्रतिमा पर केसर भांग एवं अफीम चढ़ाते हैं। कल्ला जी को शेषनाग का अवतार माना जाता है।

भूत पिशाच से ग्रस्त लोग, रोगी पशु का इलाज व पागल कुत्ते, विषैले जानवर से दंशित लोग कल्ला जी की कृपा से संताप से छुटकारा पाते हैं।

लड़ाई व वीरगति

जब १५६८ को अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया तब वीर जयमल मेड़तिया, वीर फत्ता जी और कल्ला जी ने अद्भुत वीरता दिखाई थी। जब जयमल पांवों में घाव होने पर घायल हो गए तब वीर कल्ला जी ने अपने काका जयमल को अपने कंधों पर उठा लिया और मुगलों की सेना को दांतों चने चबवा दिए थे। इसलिए अकबर ने इन्हें चार भुजा वाले देवता कहा। उन्होंने जयमल जी को अपने कंधे पर बैठा कर युद्ध किया था और चार हाथ मे तलवार ले कर काका ओर भतीजे ने चलाई थी इसलिए इन्हें चार भुजा वाले देवता कहा जाता है | जब कल्लाजी बावजी ने पीछे मुड़ कर देखा कितने सैनिक मेने मारे तब इन्होंने अपना वचन तोड़ दिया जो इन्होंने माताजी को दिया था कि पीछे मुड़ कर नही देखा तो जीत निश्चय ही इनकी ही है और पीछे से इनको कोई नही मार पायेगा लेकिन जैसे के वचन टूटा कल्लाजी ने अपना शीश काट मार माताजी को अर्पण कर दिया जिस से माताजी ने आशीर्वाद दिया और कहा तुम्हे अपनी छाती से भी दिखेगा ओर तुम्हारा धड़ भी युद्व करता रहेगा एवम माता शीश ले कर अंतर्ध्यान हो गई इसके पश्च्यात जहा कल्लाजी का शीश कटा था वह आज भी चित्तौड़ किले के भैरवपोल में इनकी छतरी बनी हुई है।

“कहा जाता है कि कल्ला जी का विवाह हो रहा था और इसी बीच युद्ध की तलवारें खिंच गई थी। वे उसी समय अपनी नववधू कृष्णाकुंवरी चौहान को वचन देकर युद्ध में चले गए कि युद्ध में चाहे जो हो, लेकिन मैं मिलने जरूर आऊंगा। कहते हैं कि कल्ला जी का बिना शीश वाला धड़ चित्तौड़ से चलकर १८० मील दूर सलूंबर के पास रनेला आया और पत्नी के पास आकर शांत हो गया। आखिर अपने पति के इस गर्वीले बलिदान से गौरवान्वित होकर कृष्णाकुंवरी चौहान जलती हुई चिता में बैठ सती हो गई और उनका सौंदर्य पति के शौर्य व वीरता में ही विलीन हो गया।" यह कृष्णकवरी माँ आब माता सती के रूप में जानी जाती है

इनकी वीरगति १५७८ ई.(वि.सं.१६२४) को हुई थी। कल्लाजी के धाम अब हर जगह मेवाड़ मारवाड़ वागड़ एवं पड़ोसी राज्यो में स्थित है मुख्य धाम: चित्तोड़(शीश धाम)

       रनेला एवं रन्देला (धड़ धाम)

अनोखे धाम एवं भक्त इच्छा पूर्ति धाम :: कल्लाजी धाम खैरवाड़ा (जिला उदयपुर तहसील खैरवाड़ा राज्य राजस्थान) जानकारी सूत्र:कल्ला काव्य सुमन पुस्तक कल्लाजी सम्प्रदाय ~अखिल भारतीय कल्लाजी सम्प्रदाय