कलियुग

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कलियुग (संस्कृत: कलियुग, अनुवाद। कलियुग, प्रकाशित। 'कलि का युग') चार चरणों (या युगों) या संस्कृत के धर्मग्रंथों में 'युगों' (महायुग) के भाग का अंतिम भाग है। । [१] अन्य युगों को सत्य युग, त्रेता युग और द्वापर युग कहा जाता है।

आर्यभट के अनुसार महाभारत युद्ध ३१३७ ईपू में हुआ। कलियुग का आरम्भ कृष्ण के इस युद्ध के ३५ वर्ष पश्चात निधन पर हुआ। Encyclopedia of Hinduism के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के इस पृथ्वी से प्रस्थान के तुंरत बाद 3102 ईसा पूर्व से कलि युग आरम्भ हो गया।

कलियुग दानव काली (देवी काली के साथ नहीं) के साथ जुड़ा हुआ है। कलियुग के "कलि" का अर्थ है "कलह", "कलह", "झगड़ा" या "विवाद"।

वर्तमान कलियुग और संभावित शुरुआती तिथियां[संपादित करें]

सूर्य सिद्धान्त के अनुसार, कलियुग 18 फरवरी 3102 ई.पू. 4 को मध्यरात्रि (00:00) से शुरू हुआ। यह उस तिथि को भी माना जाता है जिस दिन भगवान कृष्ण वैकुंठ लौटने के लिए पृथ्वी से निकले थे। यह जानकारी इस घटना के स्थान, भालका के मंदिर में रखी गई है।

सूचना भलका में स्थित है, वह स्थान जहाँ से भगवान कृष्ण अपने स्वर्गीय निवास पर लौटे थे खगोलशास्त्री और गणितज्ञ आर्यभट्ट के अनुसार कलियुग 3102 ईसा पूर्व में शुरू हुआ था। उन्होंने 499 सीई में अपनी पुस्तक "आर्यभट्टीय" समाप्त की, जिसमें वे कलियुग की शुरुआत का सटीक वर्ष देते हैं। वह लिखते हैं कि उन्होंने 23 वर्ष की आयु में "काली युग के 3600 वर्ष" में पुस्तक लिखी थी। जब वह 23 वर्ष के थे, तब काली आयु का 3600 वां वर्ष था और यह देखते हुए कि आर्यभट्ट का जन्म 476 CE में हुआ था, कलियुग की शुरुआत होगी (3600 - (476 + 23) + 1 (जैसा कि केवल एक वर्ष 1 बीसीई और 1 सीई के बीच समाप्त होता है) =) 3102 बीसीई।

केडी अभ्यंकर के अनुसार, कलियुग का प्रारंभिक बिंदु एक अत्यंत दुर्लभ ग्रह संरेखण है, जिसे मोहन जोदड़ो मुहरों में दर्शाया गया है। इस संरेखण द्वारा वर्ष 3102 ई.पू. इस संरेखण की वास्तविक तारीख 3104 ईसा पूर्व की 7 फरवरी है। यह मानने के पर्याप्त प्रमाण भी हैं कि वृद्धा गर्गा को कम से कम 500 ईसा पूर्व पूर्वसूचना का पता था। गर्गा ने आधुनिक विद्वानों के अनुमान के 30% के भीतर पूर्वता की दर की गणना की थी।

वैदिक शास्त्रों के अधिकांश व्याख्याकार, भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी और उनके हालिया शिष्य भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद का मानना ​​है कि पृथ्वी वर्तमान में कलियुग में है और 432,000 वर्षों तक रहती है। अन्य लेखकों, जैसे कि स्वामी श्री युक्तेश्वर और परमहंस योगानंद, का मानना ​​है कि अब यह एक आरोही द्वापर युग है, जो प्रत्येक प्रमुख युग अवधि के भीतर चक्रों के स्तरों को दर्शाता है, क्योंकि प्रत्येक विकास के रूप में होता है, अंतत: चक्र के भीतर छोटे चक्र। युगों के गुणों का पूर्ण विकास करना। कलियुग को कुछ लेखकों द्वारा पिछले 6480 वर्षों तक माना जाता है, हालांकि अन्य अवतरण प्रस्तावित किए गए हैं।

कलियुग के गुण[संपादित करें]

हिंदुओं का मानना है कि कलियुग के दौरान मानव सभ्यता आध्यात्मिक रूप से पतित हो जाती है, जिसे डार्क एज के रूप में जाना जाता है क्योंकि इसमें लोग ईश्वर से यथासंभव दूर जाते हैं। हिंदू धर्म अक्सर प्रतीकात्मक रूप से भारतीय बैल के रूप में नैतिकता (धर्म) का प्रतिनिधित्व करता है। सत्य युग में, विकास के पहले चरण में, बैल के चार पैर होते हैं, लेकिन प्रत्येक उम्र में नैतिकता एक चौथाई से कम हो जाती है। कलि की आयु तक, नैतिकता केवल स्वर्ण युग के एक चौथाई तक कम हो जाती है, ताकि धर्म के बैल का केवल एक पैर हो।

महाभारत में सन्दर्भ[संपादित करें]

महाभारत युद्ध और कौरवों का पतन इस प्रकार "युग-संधि" में हुआ, जो एक युग से दूसरे युग में संक्रमण का बिंदु था। धर्मग्रंथों में उल्लेख है कि ऋषि नारद ने दैत्य काली को पृथ्वी पर उस समय रास्ते में टोका था जब दुर्योधन का जन्म होने वाला था, ताकि वह मूल्यों में क्षय के युग की तैयारी में अरशदवरगर्ह और अधर्म का अवतार बना सके और परिणामी कहर ढा सके।

कलियुग के बारे में भविष्यवाणियाँ[संपादित करें]

महाभारत में मार्कण्डेय का एक प्रवचन कलियुग के कुछ गुणों की पहचान करता है। [१६]

शासकों के संबंध में, यह सूचीबद्ध करता है:

  • शासक अनुचित हो जाएंगे: वे गलत तरीके से कर लगाएंगे।
  • शासक अब इसे आध्यात्मिकता को बढ़ावा देने, या अपने विषयों की रक्षा करने के अपने कर्तव्य के रूप में नहीं देखेंगे: वे दुनिया के लिए एक खतरा बन जाएंगे।
  • लोग उन देशों की ओर पलायन करना शुरू कर देंगे, जहां गेहूं और जौ मुख्य खाद्य स्रोत बनाते हैं।
  • "कलियुग के अंत में, जब भगवान के विषय पर कोई विषय नहीं है, यहां तक ​​कि तीन उच्च वर्णों (गुण या स्वभाव) के तथाकथित संतों और सम्माननीय सज्जनों के निवास पर और जब बलिदान की तकनीकों के विषय में कुछ भी पता नहीं है, शब्द से भी। उस समय भगवान सर्वोच्च पद के रूप में दिखाई देंगे। " (श्रीमद-भागवतम (२.))

मानवीय संबंधों के संबंध में, मार्कंडेय का प्रवचन कहता है:

  • लोभऔर क्रोध आम बात होगी। मनुष्य खुले तौर पर एक दूसरे के प्रति दुश्मनी प्रदर्शित करेंगे। धर्म की अज्ञानता होगी।
  • लोगों के पास बिना किसी औचित्य के हत्या के विचार होंगे और इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा।
  • वासना को सामाजिक रूप से स्वीकार्य के रूप में देखा जाएगा और संभोग को जीवन की केंद्रीय आवश्यकता के रूप में देखा जाएगा।
  • पाप तेजी से बढ़ेगा, जबकि पुण्य फीका पड़ जाएगा और फलने-फूलने लगेगा।
  • लोग नशे और ड्रग्स के आदी हो जाएंगे।
  • गुरुओं का सम्मान नहीं किया जाएगा और उनके छात्र उन्हें घायल करने का प्रयास करेंगे। उनकी शिक्षाओं का अपमान किया जाएगा, और कामा के अनुयायी सभी मनुष्यों से मन पर नियंत्रण रखेंगे।
  • महिलाएं अब शादी नहीं करेंगी।
  • पारंपरिक जातियां गायब हो जाएंगी और सभी लोग एक ही सामाजिक वर्ग के होंगे।
  • ब्राह्मणों को सीखा या सम्मानित नहीं किया जाएगा, क्षत्रिय बहादुर नहीं होंगे, वैश्य सिर्फ उनके व्यवहार में नहीं होंगे, और वर्ण व्यवस्था समाप्त कर दी जाएगी।

कलियुग का आगमन[संपादित करें]

धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव पाँचों पाण्डव महापराक्रमी परीक्षित को राज्य देकर महाप्रयाण हेतु उत्तराखंड की ओर चले गये और वहाँ जाकर पुण्यलोक को प्राप्त हुये। राजा परीक्षित धर्म के अनुसार तथा ब्राह्नणों की आज्ञानुसार शासन करने लगे। उत्तर नरेश की पुत्री इरावती के साथ उन्होंने अपना विवाह किया और उस उत्तम पत्नी से उनके चार पुत्र उत्पन्न हुये। आचार्य कृप को गुरु बना कर उन्होंने जाह्नवी के तट पर तीन अश्वमेघ यज्ञ किये। उन यज्ञों में अनन्त धन राशि ब्रह्मणों को दान में दी और दिग्विजय हेतु निकल गये।

उन्हीं दिनों धर्म ने बैल का रूप बना कर गौरूपिणी पृथ्वी से सरस्वती तट पर भेंट किया। गौरूपिणी पृथ्वी की नेत्रों से अश्रु बह रहे थे और वह श्रीहीन सी प्रतीत हो रही थी। धर्म ने पृथ्वी से पूछा - "हे देवि! तुम्हारा मुख मलिन क्यों हो रहा है? किस बात की तुम्हें चिन्ता है? कहीं तुम मेरी चिन्ता तो नहीं कर रही हो कि अब मेरा केवल एक पैर ही रह गया है या फिर तुम्हें इस बात की चिन्ता है कि अब तुम पर शूद्र राज्य करेंगे?"

पृथ्वी बोली - "हे धर्म! तुम सर्वज्ञ होकर भी मुझ से मेरे दुःख का कारण पूछते हो! सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, सन्तोष, त्याग, शम, दम, तप, सरलता, क्षमता, शास्त्र विचार, उपरति, तितिक्षा, ज्ञान, वैराग्य, शौर्य, तेज, ऐश्वर्य, बल, स्मृति, कान्ति, कौशल, स्वतन्त्रता, निर्भीकता, कोमलता, धैर्य, साहस, शील, विनय, सौभाग्य, उत्साह, गम्भीरता, कीर्ति, आस्तिकता, स्थिरता, गौरव, अहंकारहीनता आदि गुणों से युक्त भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के कारण घोर कलियुग मेरे ऊपर आ गया है। मुझे तुम्हारे साथ ही साथ देव, पितृगण, ऋषि, साधु, संन्यासी आदि सभी के लिये महान शोक है। भगवान श्रीकृष्ण के जिन चरणों की सेवा लक्ष्मी जी करती हैं उनमें कमल, वज्र, अंकुश, ध्वजा आदि के चिह्न विराजमान हैं और वे ही चरण मुझ पर पड़ते थे जिससे मैं सौभाग्यवती थी। अब मेरा सौभाग्य समाप्त हो गया है।"

जब धर्म और पृथ्वी ये बातें कर ही रहे थे कि मुकुटधारी शूद्र के रूप में कलियुग वहाँ आया और उन दोनों को मारने लगा।

अरे दुष्ट कलिकाल तू, देता दुःख महान।
पाण्डु पौत्र मारन चले, ले करमें धनुवान॥

राजा परीक्षित दिग्विजय करते हुये वहीं पर से गुजर रहे थे। उन्होंने मुकुटधारी शूद्र को हाथ में डण्डा लिये एक गाय और एक बैल को बुरी तरह पीटते देखा। वह बैल अत्यन्त सुन्दर था, उसका श्वेत रंग था और केवल एक पैर था। गाय भी कामधेनु के समान सुन्दर थी। दोनों ही भयभीत हो कर काँप रहे थे। महाराज परीक्षित अपने धनुषवाण को चढ़ाकर मेघ के समान गम्भीर वाणी में ललकारे - "रे दुष्ट! पापी! नराधम! तू कौन है? इन निरीह गाय तथा बैल क्यों सता रहा है? तू महान अपराधी है। तेरे अपराध का उचित दण्ड तेरा वध ही है।" उनके इन वचनों को सुन कर कलियुग भय से काँपने लगा।

महाराज ने बैल से पूछा कि हे बैल तुम्हारे तीन पैर कैस टूटे गये हैं। तुम बैल हो या कोई देवता हो। हे धेनुपुत्र! तुम निर्भीकतापूर्वक अपना अपना वृतान्त मुझे बताओ। हे गौमाता! अब तुम भयमुक्त हो जाओ। मैं दुष्टों को दण्ड देता हूँ। किस दुष्ट ने मेरे राज्य में घोर पाप कर के पाण्डवों की पवित्र कीर्ति में यह कलंक लगाया है? चाहे वह पापी साक्षात् देवता ही क्यों न हो मैं उसके भी हाथ काट दूँगा। तब धर्म बोला - "हे महाराज! आपने भगवान श्रीकृष्ण के परमभक्त पाण्डवों के कुल में जन्म लिया है अतः ये वचन आप ही के योग्य हैं। हे राजन्! हम यह नहीं जानते कि संसार के जीवों को कौन क्लेश देता है। शास्त्रों में भी इसका निरूपण अनेक प्रकार से किया गया है। जो द्वैत को नहीं मानता वह दुःख का कारण अपने आप को ही स्वीकार करता हैं। कोई प्रारब्ध को ही दुःख का कारण मानता है और कोई कर्म को ही दुःख का निमित्त समझता है। कतिपय विद्वान स्वभाव को और कतिपय ईश्वर को भी दुःख का कारण मानते हैं। अतः हे राजन्! अब आप ही निश्चित कीजिये कि दुःख का कारण कौन है।"

सम्राट परीक्षित उस बैल के वचनों को सुन कर बोले - "हे वृषभ! आप अवश्य ही बैल के रूप में धर्म हैं और यह गौरूपिणी पृथ्वी माता है। आप धर्म के मर्म को भली-भाँति जानते हैं। आप किसी की चुगली नहीं कर सकते इसीलिये आप दुःख देने वाले का नाम नहीं बता रहे हैं। हे धर्म! सतयुग में आपके तप, पवित्रता, दया और सत्य चार चरण थे। त्रेता में तीन चरण रह गये, द्वापर में दो ही रह गये और अब इस दुष्ट कलियुग के कारण आपका एक ही चरण रह गया है। यह अधर्मरूपी कलियुग अपने असत्य से उस चरण को भी नष्ट करने का प्रयत्न कर रहा है। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के स्वधाम गमन से दुष्ट पापी शूद्र राजा लोग इस गौरूपिणी पृथ्वी को भोगेंगे इसी कारण से यह माता भी दुःखी हैं।"

इतना कह कर राजा परीक्षीत ने उस पापी शूद्र राजवेषधारी कलियुग को मारने के लिये अपनी तीक्ष्ण धार वाली तलवार निकाली। कलियुग ने भयभीत होकर अपने राजसी वेष को उतार कर राजा परीक्षित के चरणों में गिर गया और त्राहि-त्राहि कहने लगा। राजा परीक्षित बड़े शरणागत वत्सल थे, उनहोंने शरण में आये हुये कलियुग को मारना उचित न समझा और कलियुग से कहा - "हे कलियुग! तू मेरे शरण में आ गया है इसलिये मैंने तुझे प्राणदान दिया। किन्तु अधर्म, पाप, झूठ, चोरी, कपट, दरिद्रता आदि अनेक उपद्रवों का मूल कारण केवल तू ही है। अतः तू मेरे राज्य से तुरन्त निकल जा और लौट कर फिर कभी मत आना।"

राजा परीक्षित के इन वचनों को सुन कर कलियुग ने कातर वाणी में कहा - "हे राजन्! आपका राज्य तो सम्पूर्ण पृथ्वी पर है, आपके राज्य से बाहर ऐसा कोई भी स्थान नहीं है जहाँ पर कि मैं निवास कर सकूँ। हे भूपति! आप बड़े दयालु हैं, आपने मुझे शरण दिया है। अब दया करके मेरे निवास का भी कुछ न कुछ प्रबन्ध आपको करना ही होगा।"

कलियुग इस तरह कहने पर राजा परीक्षित सोच में पड़ गये। फिर विचार कर के उन्होंने कहा - "हे कलियुग! द्यूत, मद्यपान, परस्त्रीगमन और हिंसा इन चार स्थानों में असत्य, मद, काम और क्रोध का निवास होता है। इन चार स्थानों में निवास करने की मैं तुझे छूट देता हूँ।" इस पर कलियुग बोला - "हे उत्तरानन्दन! ये चार स्थान मेरे निवास के लिये अपर्याप्त हैं। दया करके कोई और भी स्थान मुझे दीजिये।" कलियुग के इस प्रकार माँगने पर राजा परीक्षित ने उसे पाँचवा स्थान 'स्वर्ण' दिया।

कलियुग इन स्थानों के मिल जाने से प्रत्यक्षतः तो वहाँ से चला गया किन्तु कुछ दूर जाने के बाद अदृष्य रूप में वापस आकर राजा परीक्षित के स्वर्ण मुकुट में निवास करने लगा। इसके बाद परिक्षित शिकार के लिए बहुत भटके और भूख और प्‍यास के मारे उनका बुरा हाल था । शाम के समय थके हारे वह शमिक ऋषि के आश्रम पहुंचे ऋषि उस समय ब्रहमलीन समाघि में लीन थे । ।परिक्षित ने कहा कि हमें प्‍यास लगी है हमें पानी चाहिए यहां और कोई भी नही है क्‍या आप सुन रहे है हम राजा परिक्षित बोल रहे है हमें प्‍यास लगी है हमें पानी चाहिए आपको सुनाई नही देता क्‍या ऋषि उस समय समाघि में ब्रहमलीन थे राजा ने दो-तीन बार पानी मांगा परंतु ऋषि की समाघि नही टूटी । ।राजमुकुट मैं बैठे कलयुग की प्ररेणा से उनकी सात्‍विक बुद्धि भ्रष्‍ट हो गई और उन्‍होने ऋषि को दंड देने का फैसला किया । परंतु राजा के अच्छे संस्‍कारो के कारण उन्‍होनें अपने-आप को उस पाप से रोक लिया । क्रोध वश उन्‍होने मरा हुआ सांप ऋषि के गले में डाल दिया । उस शमिक ऋषि का पुत्र शृंगी बडा ही तेजस्‍वी था उस समय वह नदी में नहा रहा था। दूसरे ऋषि कुमारों ने जाकर सारा वृत्तांत सुनाया कि किस प्रकार एक राजा ने उसके पिता का तिरस्‍कार किया है । उनकी बात सुनकर वह क्रोध से पागल हो गया और उसी क्षण नदी का जल अंजुली में भरकर राजा को श्राप दिया जिस अभिमानी और मूर्ख राजा ने मेरे महान पिता का घोर अपमान किया है वह महापापी आज से सांतवे दिन तक्षक नाग की प्रचंड विषाग्नी में जलकर भस्‍म हो जायेगा

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सुखसागर के सौजन्य से

कल्कि पुराण