कबीर दास के दोहे

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कबीर दास के दोहे[संपादित करें]

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।

राजा-परजा जेहि रुचें, शीश देई ले जाय ॥


दिल का मरहम ना मिला, जो मिला सो गर्जी ।

कह कबीर आसमान फटा, क्योंकर सीवे दर्जी ॥


कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय ।

टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय ॥


सोना, सज्जन, साधु जन, टूट जुड़ै सौ बार ।

दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, ऐके धका दरार ॥


ऊँचे कुल में जामिया, करनी ऊँच न होय ।

सौरन कलश सुरा, भरी, साधु निन्दा सोय ॥


कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।

जम जब घर ले जाएँगे, पड़ा रहेगा म्यान ॥

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