कबीर पंथ

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संत कबीर

कबीर पंथ या सतगुरु कबीर पंथ भारत के भक्तिकालीन कवि कबीर की शिक्षाओं पर आधारित एक पंथ है, जिसका स्थापना खुद सदगुरु कबीर ने अपने परम शिष्य धर्मदास के द्वारा किये थे। यह पंथ दार्शनिक और नैतिक शिक्षा पर आधारित है। कबीर पंथ के अनुयायियों में हिंदू, मुसलमान, बौद्ध आदि धर्मों के लोग शामिल हैं। इनमें बहुतायत हिंदुओं की है।[1] कबीर की उपदेशों का संग्रह अनुराग सागर इस पंथ के दार्शनिक और आध्यात्मिक चिंतन का आधार ग्रंथ है।

..."[2]डा० केदारनाथ द्विवेदी ने अपने 'कबीर और कबीर पंथ' नामक शोद्य प्रबंध में साखी दोहा व चौपाई आदि में लिखे कई ग्रंथ का उल्लेख किया है, जिसमें सबसे प्राचीन 'ज्ञान सागर' और 'अनुराग सागर' हैै।

इतिहास[संपादित करें]

द्विवेदी कबीर पंथ की स्थापना की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि, "कहा जाता है कि सबसे पहले संतों में नानक ने ही पंथ रचना का सूत्रपात किया था और उन्होंने उसके कुछ नियम भी बनाये थे। संभवतः नानकदेव (संवत १५९५) के अनंतर ही कबीर पंथ की स्थापना हुई होगी।...दादूपंथी राघवदास ने अपने हस्तलिखित ग्रंथ भक्तमाल (१७१७) में धर्मदास को कबीर का शिष्य कहा है। छत्तीसगढ़ी शाखा का इतिहास प्रस्तुत करते समय आगे चलकर धर्मदास के आविर्भाव की तिथि सत्रहवीं शताब्दी के प्रथम चरण के लगभग सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। संभवतः धर्मदास ने ही पंथ को व्यापक बनाने के लिए सर्वप्रथम ठोस कदम उठाया था।"[3]

प्रमुख शाखाएँ[संपादित करें]

भारत में कबीर पंथ की मुख्यतः तीन शाखाएँ मानी जाती हैं। काशी (कबीरचौरा) वाली शाखा, धनौती वाली भगताही शाखा और छत्तीसगढ़ वाली शाखा। इन शाखाओं के संस्थापक क्रमशः श्रुति गोपाल साहब, भगवान गोसाईं तथा मुक्तामणि नाम साहब को माना जाता है।[4]

कबीर जयंती समारोह के दौरान मेघवाल बालिकाओं का एक समूह
कबीर जयंती समारोह के दौरान मेघवाल बालिकाओं का एक समूह

मुख्य केन्द्र[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Dissent, protest, and reform in Indian civilization. Indian Institute of Advanced Study, 1977
  2. ...
  3. कबीर और कबीर पंथ, डॉ॰ केदार नाथ द्विवेदी, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, प्रथम संस्करण, १९६५, पृष्ठ- १६२
  4. भारत में कबीर पंथ की प्रमुख शाखाएँ

Sadguru Kabir Saheb is Nitya Anadi sadguru which is only first alternative of super god(Parmatma)-Super Power and only one power in three part himself and left one part is the extention of Brahmand including earth.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]