कपालभाति (हठयोग)

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कपालभाती दो शब्दों से मिलकर बना है । कपाल का अर्थ ललाट या मस्तिष्क और भाती का अर्थ है प्रकाश या ज्योति अर्थात कपालभाति प्राणायाम करने वालो के ललाट पर ज्योति या प्रकाश होता है । कपालभाति को संजीवनी भी कहते है केवल 5 मिनट कपालभाति करने से कई बीमारियों को दूर किया जा सकता है । और अपने आप को स्वस्थ रखा जा सकता है। कपालभाति को करने से पाचन तंत्र ,पेट से जुडी हुई समस्या ,मोटापा ,पेट पर जमी हुई चर्बी ,बेली फैट को कुछ ही दिनों में दूर किया जा सकता है । साथ ही साथ रक्त प्रवाह भी अच्छा होता है। कपालभाति हमारे शरीर से विषाक्त पदार्थो को बाहर निकालने में मदद करता है। यह किडनी और लीवर की समस्या प्रभावी ढंग से ठीक करता है ।

कपालभाति योग में षट्कर्म (हठ योग) की एक विधि (क्रिया) है। संस्कृत में कपाल का अर्थ होता है माथा या ललाट और भाति का अर्थ है तेज। इस प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से मुख पर आंतरिक प्रभा (चमक) से उत्पन्न तेज रहता है। कपाल भाति बहुत ऊर्जावान उच्च उदर श्वास व्यायाम है।

कपाल अर्थात मस्तिष्क और भाति यानी स्वच्छता। अर्थात 'कपाल भाति' वह प्राणायाम है जिससे मस्तिष्क स्वच्छ होता है और इस स्थिति में मस्तिष्क की कार्यप्रणाली सुचारु रूप से संचालित होती है। वैसे इस प्राणायाम के अन्य लाभ भी है। लीवर किडनी गैस आदि के लिए बहुत लाभ कारी है Ido it on an empty stomach only.

कपालभाति करने का सही समय[संपादित करें]

कपालभाति प्राणायाम करने का सही समय सुबह 4 से लेकर 7 बजे तक अच्छा माना जाता है ।इस समय वातावरण में शांति अधिक होती है कपालभाति प्राणायाम सदैव खाली पेट किया जाना चाहिए। आप इसे शाम के समय भी कर सकते है ।परन्तु भोजन किये हुए 4 घंटे हो गए हो। यह शाम के समय किया जाता है तो भी यह पर्याप्त लाभ देता है ।

विधि[संपादित करें]

1. कपालभाति करने के लिए सबसे पहले पद्मासन ,वज्रासन या सुखासन मुद्रा में बैठ जाये ।

2. अब अपने दोनों हाथो से चित मुद्रा बनाये और इसे अपने दोनों घुटनो पर रखे

3. अपनी आँखे बंद कर ले और अपने शरीर को ढीला छोड़ दे रिलैक्स करे । Read More

भाति प्राणायाम करने के लिए रीढ़ को सीधा रखते हुए किसी भी ध्यानात्मक आसन, सुखासन या फिर कुर्सी पर बैठें। इसके बाद तेजी से नाक के दोनों छिद्रों से साँस को यथासंभव बाहर फेंकें। साथ ही पेट को भी यथासंभव अंदर की ओर संकुचित करें। तत्पश्चात तुरन्त नाक के दोनों छिद्रों से साँस को अंदर खीचतें हैं और पेट को यथासम्भव बाहर आने देते है। इस क्रिया को शक्ति व आवश्यकतानुसार 50 बार से धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 500 बार तक कर सकते हैे, किन्तु एक क्रम में 50 बार से अधिक न करें। क्रम धीरे-धीरे बढ़ाएं।

कम से कम ५ मिनट एवं अधिकतम ३० मिनट।

लाभ[संपादित करें]

इस प्राणायाम के नियमित अभ्यास से शरीर की अनावश्यक चर्बी घटती है। हाजमा ठीक रहता है। भविष्य में कफ से संबंधित रोग व साँस के रोग नहीं होते। प्राय: दिन भर सक्रियता बनी रहती है। रात को नींद भी अच्छी आती है। अस्थमा(दमा) का रोग जड़ से नष्ट होते हैं I

सावधानियाँ[संपादित करें]

  • हृदय रोगों, हाई ब्लड प्रेशर और पेट में गैस आदि शिकायतों में यह प्राणायाम धीरे धीरे करना चाहिये (60 बार एक मिनट में ) है।
  • धूल-धुआं-दुर्गन्ध, बन्द व गर्म वातावरण में यह प्राणायाम न करें।
  • मासिक चक्र के समय और गर्भावस्था के दौरान इसे न करें।
  • बुखार, दस्त, अत्यधिक कमजोरी की स्थिति में इसे न करें।
  • कब्ज़ की स्थिति में यह प्राणायाम न करें। गुनगुने पानी में नींबू डालकर पेट साफ करें और फिर इसके बाद ही इसे करें।
  • बाहर की ओर निकले हुए पेट को शीघ्र घटाने के चक्कर में अनेक लोग दिन में कई बार इस प्राणायाम को करते हैं, जो हानिप्रद है।
  • खाना खाने के बाद 4घंटे तक कपाल भाति प्राणायाम न करें।
  • जिन्हें किसी भी तरह का सर्जरी हुई हैं उन्हें 6 माह तक कपालभाति नहीं करना चाहिए ।