एलिस एक्का की कहानियां

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एलिस एक्का की कहानियां  
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एलिस एक्का की कहानियां
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एलिस एक्का की कहानियां पुस्तक का आवरण
लेखक एलिस एक्का
देश भारत
भाषा हिंदी
विषय आदिवासी साहित्य
प्रकाशक राधाकृष्ण (राजकमल), दिल्ली
प्रकाशन तिथि 2015
पृष्ठ 104
आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788183617918

एलिस एक्का की कहानियां हिंदी की पहली महिला आदिवासी कथाकार एलिस एक्का की कहानियों का एकमात्र संकलन है। एलिस एक्का की कहानियां हिंदी की पहली महिला आदिवासी कथाकार एलिस एक्का की कहानियों का एकमात्र संकलन है। हिंदी कथा साहित्य के ज्ञात इतिहास में एलिस एक्का से पूर्व किसी आदिवासी महिला कहानीकार का जिक्र नहीं मिलता। अविभाजित बिहार-झारखंड में चालीस-पचास के दशक में कथा लेखन की शुरुआत एलिस एक्का की कहानियों से होती है।

एलिस एक्का की कहानियां[संपादित करें]

‘एलिस एक्का की कहानियां’ संकलन में संकलन में एलिस की कुल छह कहानियां शामिल हैं। ‘वनकन्या’, ‘दुर्गी के बच्चे और एल्मा की कल्पनाएं’, ‘सलगी, जुगनी और अंबा गाछ’, ‘कोयल की लाड़ली सुमरी’, ‘पंद्रह अगस्त, बिलचो और रामू’ और ‘धरती लहलहाएगी, झालो नाचेगी गाएगी’। साथ ही इसमें खलील जिब्रान की पांच अनूदित कहानियां भी शामिल हैं।

‘एलिस एक्का की कहानियां’ की संपादक वंदना टेटे के अनुसार ‘उनकी सबसे पहली प्राप्य रचना जो कि खलील जिब्रान के साहित्य का अनुवाद है ‘आदिवासी’ के अगस्त 1959 के विशेषांक में छपी है।’ ... ‘और ‘पहली कहानी ‘आदिवासी’ के 17 अगस्त 1961, वर्ष 15, अंक 28-29 में छपी है। जिसका शीर्षक है ‘वनकन्या’।’ [1] श्रीमती टेटे के अनुसार संभव है इसके पूर्व भी उनकी रचनाएं छपी हों परंतु तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं की अनुपलब्धता के कारण इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

कहानियों का कथ्य, शिल्प और भाषा[संपादित करें]

एलिस एक्का की कहानियों के बारे में साहित्यकारों और समीक्षकों की राय है - ‘आदिवासी समाज का जीवन और अनुभव जब कहन बन कर आता है तो हम एक नये दर्शन से परिचित होते हैं। यह दर्शन सहअस्तित्व और सहजीविता का है जो एलिस की कहानियों में है और जिसकी बुनावट बहुत बारीक है। एलिस अपनी कहानियों में साठ के दशक के आदिवासी उम्मीदों को सामने रखती हैं। लेकिन बाद में वे उस छल को भी अभिव्यक्त करती हैं जिसका शिकार आदिवासी समाज बनता है।’ [2]

समीक्षक अमरेन्द्र यादव के अनुसार- ‘कहानियां बहुत बड़ी नहीं हैं, पर इन छोटे-छोटे किस्सों में कही गई बातों के मायने ज़रूर बेहद गहरे हैं। प्रकृति और स्त्री को केंद्र में रखकर लिखी गई ये कहानियां आहिस्ता-आहिस्ता पाठक के दिल में उतर जाती हैं। लेखिका ने जितना महत्व इंसानी भावनाओं को दिया है, उतनी ही मुस्तैदी से पेड़-पौधे, पक्षी, जानवर, नदी, आकाश, जंगल, चट्टान आदि भी इन कथाओं में अपनी सहज उपस्थिति दर्ज कराते हैं।’[3]

आलोचक डा. सावित्री बड़ाईक की टिप्पणी है- ‘किसी भी क्षेत्र के समुदाय की पहचान उसकी भाषा और संस्कृति से होती है। एलिस की कहानियों की भाषा आदिवासी हिन्दी है। वे नागपुरी, मगही, खोरठा, भाषाओं का भी प्रयोग संवादों में करती है। पर संवादों में सरलता है। साधारण लोग सरल भाषा का ही प्रयोग करते हैं। ... एलिस एक्का अपनी कहानियों में आदिवासी समाज की मूल प्रवृतियों और जीवन-मूल्यों का ध्यान रखती हैं। उनकी कथा नायिकाएँ अपने आत्मनिर्णय के अधिकार और पहचान (अस्मिता) के लिए निरन्तर संघर्ष करती हैं। समानता, सहअस्तित्व, सहभागिता, सामूहिकता, श्रम के प्रति निष्ठा, स्त्री-पुरुष के बीच बराबरी आदि जीवनमूल्य का वर्णन एलिस एक्का की कहानियों की विशेषता है।’ [4]

उपन्यासकार विनोद कुमार के अनुसार, ‘आदिवासी समाज में गद्यात्मक लेखन के प्रति वैसा रुझान नहीं है, पर साठ के दशक में ही एलिस एक्का सधी हुई कहानियां लिख रही थीं। उन्होंने समाज और परिवेश को अपनी छोटी कहानियों में समेटने का कठिन कार्य किया है। उनकी कहानियों में आदिवासी समाज के सुख-दुख, उल्लास-आनंद और भविष्य के प्रति आशावादिता नजर आती है। डॉ. माया प्रसाद मानती हैं एलिस एक्का ने अपने समाज को कहानियों के द्वारा लोगों तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया था। वहीं फादर पीटर पॉल कहते हैं, ‘एलिस एक्का की आपबीती, अनुभवों से निकली कहानियां हैं जो दिल को सुकून देती हैं।’[5]

आदिवासी दर्शन और कहन परंपरा में एलिस एक्का की कहानियां[संपादित करें]

साहित्य के पाठक और आलोचक मानते हैं कि एलिस एक्का का लेखन हिंदी साहित्य में आदिवासी कहन परंपरा की एक अद्भुत बानगी है। जो उन्हें हिंदी कथा साहित्य में उनके आदिवासीपन के कारण विशिष्ट बनाती है। एलिस की कहानियां आदिवासी जीवनदर्शन के अनुरूप इंसान और प्रकृति के आत्मीय रिश्तों को रेखांकित करती हैं और इस रिश्ते में आ रही टूटन से हमें सचेत भी करती हैं।

वरिष्ठ आदिवासी पत्रकार और साहित्यकार शिशिर टुडू का मत है, 'इस पुस्तक से आदिवासी दर्शन के बारे में पता चलता है। यह मुख्यधारा से इतर है। आदिवासी दर्शन से ही दुनिया बचेगी। आज जो गलाकाट प्रतियोगिता और विकास की अंधी हवा बह रही है, वह सृष्टि के लिए ही खतरा है। मुख्य धारा के दर्शन में मनुष्य श्रेष्ठ है जबकि आदिवासी दर्शन में वह एक इकाई है। जैसे पहाड़ है, झरना है, उसी प्रकार मनुष्य भी है। [6]

आदिवासी दर्शन और साहित्य की पैरोकार वंदना टेटे पुस्तक की भूमिका में लिखती हैं, ‘बेशक! एलिस बहुत ही ‘मामूली’ कथाकार है। जादूई यथार्थ और किसी भी चमत्कार के दावे से परे। उनकी कहानियों में प्रकृति है, समाज है, संगीत है, जीवन की लय है और बाहरी तथा भीतरी समाज के घात-प्रतिघात भी हैं। ...इस आदिवासी कहन परंपरा और सहजीवी आदिवासी दर्शन का एलिस अपनी कहानियों में बखूबी और पूरे कौशल के साथ निर्वाह करती है।’ [7]


इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. वंदना टेटे, एलिस एक्का की कहानियां, राधाकृष्ण, (राजकमल प्रकाशन), नई दिल्‍ली, 2015, पृष्‍ठ 9
  2. "'एलिस एक्का की कहानियां' और 'आदिवासी दर्शन और साहित्य' पुस्तकों का लोकार्पण". 3 जुलाई 2017. अभिगमन तिथि 3 जुलाई 2017.
  3. "पुस्तक समीक्षा: एलिस एक्का की कहानियां". 4 जुलाई 2017. अभिगमन तिथि 4 जुलाई 2017.
  4. डा. सावित्री बड़ाईक, हिंदी की आदिवासी कथा लेखिकाएं, आदिवासी साहित्य (त्रैमासिक), अंकः 4-5, अक्टूबर 2015-मार्च 2016, नई दिल्ली, पृष्‍ठ 41
  5. "आदिवासी साहित्य के लिए आदिवासी दर्शन जानना जरूरी". 4 जुलाई 2017. अभिगमन तिथि 4 जुलाई 2017.
  6. "आदिवासी दर्शन से ही बचेगी दुनिया". 4 जुलाई 2017. अभिगमन तिथि 4 जुलाई 2017.
  7. वंदना टेटे, एलिस एक्का की कहानियां, राधाकृष्ण, (राजकमल प्रकाशन), नई दिल्‍ली, 2015, पृष्‍ठ 33