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एम1 गारैंड

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एम1 गारैंड (M1 Garand)

प्रकार सेमी-ऑटोमैटिक राइफल
उत्पत्ति का मूल स्थान संयुक्त राज्य अमेरिका
सेवा इतिहास
युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध, कोरियाई युद्ध, वियतनाम युद्ध
उत्पादन इतिहास
डिज़ाइनर जॉन सी. गारैंड
निर्दिष्टीकरण
वजन 4.31 से 4.63 किग्रा (9.5 से 10.2 पाउंड)

एम1 गारैंड (अंग्रेज़ी: M1 Garand), जिसे आधिकारिक तौर पर यूनाइटेड स्टेट्स राइफल, कैलिबर .30, एम1 के रूप में जाना जाता है, द्वितीय विश्व युद्ध और कोरियाई युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका की मानक सर्विस राइफल थी। यह दुनिया की पहली ऐसी सेमी-ऑटोमैटिक राइफल थी जिसे किसी देश की सेना ने बड़े पैमाने पर अपनी पैदल सेना के लिए मुख्य हथियार के रूप में अपनाया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना के प्रसिद्ध कमांडर, जनरल जॉर्ज एस. पैटन ने इसे "अब तक का सबसे महान युद्ध उपकरण" कहकर इसकी प्रशंसा की थी।[1]

विकास और डिज़ाइन

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इस राइफल का डिज़ाइन कनाडाई-अमेरिकी हथियार डिजाइनर जॉन सी. गारैंड द्वारा स्प्रिंगफील्ड आर्मरी में तैयार किया गया था। कई वर्षों के परीक्षण के बाद, इसे 1936 में आधिकारिक तौर पर अमेरिकी सेना द्वारा अपनाया गया।[2]

एम1 गारैंड की सबसे बड़ी तकनीकी विशेषता इसकी गैस-ऑपरेटेड कार्यप्रणाली थी।

  • जब गोली चलाई जाती थी, तो बैरल के अंदर उत्पन्न उच्च दबाव वाली गैस का एक छोटा सा हिस्सा बैरल के सिरे के पास एक छोटे से छेद के माध्यम से एक सिलेंडर में भेजा जाता था।
  • यह गैस एक पिस्टन को पीछे की ओर धकेलती थी, जो बोल्ट को अनलॉक करता था और खाली कारतूस के खोल को बाहर निकाल देता था।
  • एक रिकॉइल स्प्रिंग फिर बोल्ट को वापस आगे धकेलता था, जो मैगज़ीन से एक नया कारतूस चेंबर में लोड कर देता था।

इस सेमी-ऑटोमैटिक प्रणाली का मतलब था कि सैनिक को हर शॉट के बाद मैन्युअल रूप से बोल्ट खींचने की आवश्यकता नहीं थी, वह केवल ट्रिगर दबाकर लगातार गोलियां चला सकता था।[3]

'एन-ब्लॉक क्लिप' और 'पिंग' की आवाज़

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एम1 गारैंड में आधुनिक राइफलों की तरह वियोज्य बॉक्स मैगज़ीन नहीं होती थी। इसके बजाय, यह एक अद्वितीय 8-राउंड एन-ब्लॉक क्लिप का उपयोग करती थी। सैनिक 8 गोलियों से भरी इस पूरी धातु की क्लिप को ऊपर से राइफल के आंतरिक मैगज़ीन में धकेलता था। इस डिज़ाइन की सबसे दिलचस्प विशेषता यह थी कि जैसे ही 8वीं (अंतिम) गोली चलाई जाती थी, राइफल का तंत्र स्वचालित रूप से खाली धातु की क्लिप को एक विशिष्ट और तेज़ "पिंग" की आवाज़ के साथ हवा में उछाल देता था।

यह 'पिंग' की आवाज़ एम1 गारैंड की पहचान बन गई। युद्ध के बाद एक लोकप्रिय मिथक फैल गया कि जर्मन या जापानी सैनिक इस 'पिंग' की आवाज़ को सुनकर जान जाते थे कि अमेरिकी सैनिक की राइफल खाली हो गई है और वे छिपने की जगह से बाहर आकर हमला कर देते थे। हालांकि, अधिकांश सैन्य इतिहासकारों का मानना है कि युद्ध के शोर, बमबारी और चीख-पुकार के बीच उस 'पिंग' को सुनकर प्रतिक्रिया देना दुश्मन के लिए लगभग असंभव था, और इसका युद्ध के मैदान पर कोई वास्तविक नकारात्मक प्रभाव नहीं था।[4]

द्वितीय विश्व युद्ध में, एम1 गारैंड ने अमेरिकी पैदल सेना को अपने दुश्मनों पर भारी सामरिक लाभ प्रदान किया। जहाँ जर्मन सैनिक मुख्य रूप से 'माउज़र Kar98k' और जापानी सैनिक 'अरिसाका टाइप 99' (जो दोनों बोल्ट-एक्शन राइफलें थीं) से लैस थे, वहीं अमेरिकी सैनिक एम1 गारैंड के कारण लगभग ढाई गुना तेजी से गोलियां दाग सकते थे। इस मारक क्षमता ने शहरी युद्ध और प्रशांत महासागर के घने जंगलों में अमेरिकी सेना की सफलता में निर्णायक भूमिका निभाई।[5]

सन्दर्भ

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  1. ↑ The M1903 Springfield Rifle
  2. ↑ "The M14 Rifle: John Garand's Final Legacy"
  3. ↑ Duff, Scott A. (1993). The M1 Garand: World War II. Scott A. Duff Publications. pp. 45–55. ISBN 978-1888722017.
  4. ↑ Canfield, Bruce N. (2013). The M1 Garand Rifle. Mowbray Publishers. pp. 210–218. ISBN 978-1931464567.
  5. ↑ Rose, Alexander (2008). American Rifle: A Biography. Bantam Dell. pp. 230-245. ISBN 978-0553805178.

बाहरी कड़ियाँ

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