एडवर्ड मॉर्गन फार्स्टर

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एडवर्ड मॉर्गन फार्स्टर

एडवर्ड मॉर्गन फार्स्टर (Edward Morgan Forster ; १८७९ - १९७०) - अंग्रेजी उपन्यासकार और आलोचक थे।

परिचय[संपादित करें]

इनका जन्म लंदन में हुआ। शिक्षा कैंब्रिज विश्वविद्यालय में हुई। कैंब्रिज में अपने ट्यूटर, नथेनियल वेड, के प्रभाववश प्राचीन ग्रीक और रोमन साहित्य और स्वयं ग्रीस में उसकी रुचि जाग्रत हुई। इसी कारण साहित्यरचना का श्रीगणेश उसने पौराणिक कथाओं की शैली में लिखी हुई कहानियों द्वारा किया, जो बाद में 'दि सेलेशल ऑम्नीबस' (१९११) और 'दि इटर्नल मोमेंट' (१९२८) नामक संग्रहों में पुन: प्रकाशित हुई। जब १९०३ में उसके मित्र लोज डिकिंसन तथा वेड इत्यादि ने 'दि इंडिपेंडेंट व्यू' की स्थापना की तो वह इसमें स्थायी रूप से लिखने लगा।

इसके उपरांत एक वर्ष उसने इटली और ग्रीस में बिताया। उसका प्रथम उपन्यास 'व्हेयर ऐंजेल्स फियर टु ट्रेड' (१९०५) इटली में ही लिखा गया। इसके बाद 'दि लांगेस्ट जर्नी (१९०७) और 'ए रूम विद ए व्यू' (१९०८) प्रकाशित हुए। 'हावर्ड्स एंड' (१९१०) में उसकी प्रतिभा ने पूर्ण परिपक्वता प्राप्त की। अपने सभी उपन्यासों में वह परंपरा और रूढ़ि का आलोचक रहा है।

१९१२ और १९२२ में उसने भारत की यात्रा की। इसी के फलस्वरूप १९२४ में उसका सर्वप्रसिद्ध उपन्यास 'ए पैसज टु इंडिया' प्रकाशित हुआ। इससे उसकी ख्यात बहुत बढ़ी। राष्ट्रों, जातियों और व्यक्तियों के बीच जो कृत्रिम बाधाएँ खड़ी हो गई हैं उन्हें दूर करने के प्रयत्नों में जो सफलता हाथ लगती है उसी का चित्रण इस उपन्यास में अंग्रेजों और भारतीयों के माध्यम से किया गया है। सामान्य ब्रिटिश जनता को भारतीयों के असंतोष का ज्ञान करने में इस रचना में बड़ी सहायता की।

१९२७ में फार्स्टर कैंब्रज में 'फेलो' नियुक्त हुआ। इसी वर्ष उसने वहाँ 'ऐस्पेक्ट्स ऑव दि नॉबेल' पर भाषण दिए। उपन्यास कला के अध्ययन में इस पुस्तक का महत्वपूर्ण स्थान है।

उसकी कुछ अन्य पुस्तकें हैं- 'एबिंजर हार्वेस्ट' (१९३६), 'रीडिंग ऐज़ यूजुअल' (१९३९), 'नार्डिक' ट्वाइलाइट' (१९४०), टू चियर्स फॉर डेमोक्रेसी' (१९५१) जिसमें पहले अलग से प्रकाशित कई रचनाएँ संगृहीत हैं, तथा 'दि हिल ऑव देवी' (१९५३)।

1937 में 'रायल सोसायटी ऑव लिटरेचर' ने उसे 'बेंसन पदक' प्रदान किया, और १९५३ में 'कंपैनियन ऑव ऑनर' की उपाधि प्रदान की गई।