उर्स

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दक्षिण एशिया में उर्स (अरबी: عرس, शाब्दिक "शादी"), आमतौर पर किसी सूफी संत की पुण्यतिथि पर उसकी दरगाह पर वार्षिक रूप से आयोजित किये जाने वाले उत्सव को कहते हैं। दक्षिण एशियाई सूफी संत मुख्य रूप से चिश्तिया कहे जाते हैं और उन्हें परमेश्वर का प्रेमी समझा जाता है। किसी सूफी संत की मृत्यु को विसाल कहा जाता है जिसका अर्थ प्रेमियों का मिलाप होता है और उनकी बरसी को शादी की सालगिरह के रूप में मनाया जाता है।

उर्स के अनुष्ठानों को अमूमन दरगाह के संरक्षकों द्वारा निभाया जाता है और इनमें आमतौर पर धार्मिक संगीत जैसे कि कव्वाली का गायन शामिल होता है। अजमेर में दरगाह शरीफ में मोइनुद्दीन चिश्ती के उर्स पर हर साल 400000 से अधिक श्रद्धालु शिरकत करते हैं।

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